तमिलनाडु में लोकसभा सीटों के परिसीमन का मुद्दा अब केवल चुनावी गणित तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सियासी गठबंधनों और नेताओं की विश्वसनीयता की भी परीक्षा बन गया है। मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय के रुख में कथित बदलाव को लेकर डीएमके ने कांग्रेस और अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों पर सवालों की बौछार कर दी है। दक्षिणी क्षेत्रीय परिषद की बैठक के बाद डीएमके सांसद दयानिधि मारन ने पूछा कि आखिर कुछ दिन पहले परिसीमन का विरोध करने वाले मुख्यमंत्री अब ‘निष्पक्ष परिसीमन’ की बात क्यों कर रहे हैं।
एक हफ्ते में बदला रुख? मारन के सवालों ने बढ़ाई हलचल
चेन्नई में 20 अगस्त को हुई दक्षिणी क्षेत्रीय परिषद की बैठक के बाद तमिलनाडु की राजनीति में परिसीमन का मुद्दा फिर केंद्र में आ गया। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में हुई बैठक में दक्षिणी राज्यों से जुड़े कई अहम विषयों पर चर्चा हुई। इसी दौरान मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय ने केंद्र से ऐसी कानूनी गारंटी देने की मांग रखी कि जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन करने वाले किसी भी राज्य के संसद में प्रतिनिधित्व के हिस्से में कमी न आए।
यही बात डीएमके सांसद दयानिधि मारन को खटक गई। उनका सवाल है कि जब कुछ दिन पहले तमिलनाडु विधानसभा ने लोकसभा की मौजूदा 543 सीटों को स्थायी रूप से बनाए रखने की मांग की थी, तो अब मुख्यमंत्री का रुख निष्पक्ष परिसीमन तक कैसे पहुंच गया?
मारन ने इसी बदलाव को लेकर कांग्रेस और उसके शीर्ष नेतृत्व को भी कठघरे में खड़ा किया।
राहुल गांधी से सीधा सवाल- ‘गद्दार’ किसे कहा था?
दयानिधि मारन ने आरोप लगाया कि परिसीमन के समर्थन को लेकर तमिलनाडु में पहले तीखी राजनीतिक बयानबाजी हुई थी। उन्होंने राहुल गांधी से सवाल किया कि यदि परिसीमन का समर्थन करने वालों को तमिलनाडु के हितों के खिलाफ बताया गया था, तो अब मुख्यमंत्री के बदले हुए रुख पर कांग्रेस की स्थिति क्या है। मारन ने व्यंग्यात्मक अंदाज में पूछा कि आखिर राहुल गांधी ने जिस गद्दार की बात की थी, क्या उसमें विजय भी शामिल हैं? उनका यह बयान सीधे तौर पर कांग्रेस और तमिलनाडु की मौजूदा राजनीतिक समीकरणों पर निशाना माना जा रहा है।
पहले 543 सीटों पर रोक, अब फेयर डिलिमिटेशन की मांग
यह विवाद अचानक नहीं उठा है। 12 अगस्त को तमिलनाडु विधानसभा ने मुख्यमंत्री विजय की ओर से पेश प्रस्ताव को मंजूरी दी थी। इसमें लोकसभा की मौजूदा 543 सीटों को बरकरार रखने और महिला आरक्षण को परिसीमन से अलग लागू करने की मांग की गई थी। प्रस्ताव पर डीएमके ने सरकार का समर्थन किया था।
यानी उस समय संदेश स्पष्ट था तमिलनाडु मौजूदा सीटों के बंटवारे को बदलने के पक्ष में नहीं है।
लेकिन दक्षिणी क्षेत्रीय परिषद में विजय ने मांग का दायरा बदलते हुए कहा कि जनसंख्या स्थिरीकरण में सफल रहे राज्यों को प्रतिनिधित्व में नुकसान नहीं होना चाहिए। राजनीतिक विश्लेषकों के लिए यही बदलाव सबसे बड़ा सवाल बन गया है।
कांग्रेस पर भी मारन का निशाना
मारन ने कांग्रेस की भूमिका पर भी सवाल उठाए। उनका कहना था कि अलग-अलग राज्यों में परिसीमन को लेकर कांग्रेस का रुख एक जैसा नजर नहीं आ रहा। उन्होंने सवाल किया कि यदि दक्षिण के राज्यों के हितों की बात हो रही है तो कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु के संदर्भ में पार्टी की नीति स्पष्ट क्यों नहीं है?
यही विरोधाभास अब विपक्षी गठबंधन के भीतर बहस का कारण बन सकता है। क्योंकि परिसीमन केवल सीटों की संख्या बदलने का सवाल नहीं है। इसके साथ यह भी तय होगा कि भविष्य में किस राज्य को संसद में कितना राजनीतिक वजन मिलेगा।

