अंकारा रियाद और इस्लामाबाद के अधिकारी जब एक नई त्रिपक्षीय धुरी, मक्का संयुक्त रक्षा समझौते, के गुणों का बखान करते हैं, तो किसी को भी गहरा ‘डेजा वू’ (पूर्वानुभव) महसूस हो सकता है। यह समझौता पश्चिम एशिया में पाकिस्तान के रणनीतिक प्रयासों के एक लंबे और काफी हद तक विडंबनापूर्ण इतिहास का एक नया अध्याय है। यह शीत युद्ध की सबसे त्रुटिपूर्ण संरचनाओं की भयावह याद दिलाता है। इसका जन्म राष्ट्रीय हितों के किसी स्वाभाविक संगम से नहीं, बल्कि असुरक्षा की एक सांझा, हालांकि अलग-अलग तरह से महसूस की गई भावना से हुआ है।
सऊदी अरब, एक संशोधनवादी ईरान और बेचैन हूती विद्रोह के खिलाफ निवारण चाहते हैं। तुर्किए अपनी नव-ओटोमन महत्वाकांक्षाओं को पूरा करते हुए, खाड़ी में अपनी पैठ को गहरा करना चाहता है। पाकिस्तान, जो हमेशा नकदी की तंगी से जूझ रहा है और रणनीतिक रूप से अलग-थलग है, खाड़ी के पैट्रो-डॉलर और विश्व मंच पर प्रासंगिकता की नई भावना की तलाश में है। फिर भी, यही लेन-देन वाली नींव ठीक वही कारण है, जिसने पाकिस्तान के पहले के उपक्रमों को विफल कर दिया था। पाकिस्तान पश्चिम एशिया के प्रति अपने आकर्षण के बावजूद, क्षेत्र की मुख्य शक्ति गतिशीलता से मौलिक रूप से अलग है। इसने पारंपरिक रूप से एक शुद्ध सुरक्षा प्रदाता के रूप में नहीं, बल्कि पश्चिमी रणनीतिक परियोजनाओं के लिए एक लांचपैड के रूप में कार्य किया है।
फरवरी 1955 में, तुर्क-ईराकी बगदाद समझौते ने मध्य पूर्व संधि संगठन (METO) का निर्माण किया। इससे पहले 1954 में तुर्क-पाकिस्तान रक्षा समझौता हुआ था, जिस पर पाकिस्तान के विदेश मंत्री मुहम्मद जफरुल्ला खान और तुर्की के राजदूत सेलाहतिन रेफेट अर्बेल ने हस्ताक्षर किए थे। यह व्यवस्था, यू.के., यू.एस. और हाशिमियत ईराक के परस्पर हितों से निकलकर, तुर्की से पाकिस्तान तक फैले नियंत्रण की एक ‘उत्तरी परत’ को पूरा करने के लिए डिजाइन की गई थी। इसके बाद अप्रैल में यू.के., सितम्बर में पाकिस्तान और नवम्बर में ईरान METO में शामिल हो गए। ईरान के प्रवेश ने तुर्की-ईराक-ईरान-पाकिस्तान लाइन के साथ ‘उत्तरी बैल्ट’ को पूरा किया। 1958 में ईराक में जुलाई क्रांति के बाद, जब अब्द अल-करीम कासिम के नेतृत्व वाली सरकार ने समझौते से नाम वापस ले लिया, तो METO का नाम बदलकर सैंट्रल ट्रीटी ऑर्गनाइजेशन (CENTO) कर दिया गया।
वही रणनीतिक मृगतृष्णा दक्षिण पूर्व एशिया में भी दिखाई दी। 1954 में हिंद-चीन में फ्रांसीसी हार के बाद, वाशिंगटन क्षेत्र में साम्यवाद को रोकने और नियंत्रित करने के लिए उत्सुक था। सितम्बर 1954 में, पाकिस्तान सहित 8 सरकारों के प्रतिनिधियों ने मनीला में मुलाकात की और दक्षिण पूर्व एशिया संधि संगठन (SEATO) का गठन किया। दक्षिण पूर्व एशिया के साथ पाकिस्तान का कोई संबंध नहीं था, सिवाय इसके, कि वह अमरीका का शीत युद्ध का प्यादा था।
पाकिस्तान के लिए ये गठबंधन एक साधन मात्र थे, जिसका उद्देश्य नई दिल्ली के खिलाफ एक मजबूत हाथ हासिल करना था, जिससे उन पश्चिमी ताकतों के लिए उसके अस्तित्व का कारण ही खत्म हो गया, जिन्होंने उसे समर्थन दिया था। पाकिस्तान के अयूब खान, जो खुद यू.एस.-पाकिस्तान संबंधों के शुरुआती वास्तुकारों में से एक थे, ने जनवरी 1962 में लंदन में ‘द डेली टैलीग्राफ’ से कहा कि पाकिस्तान का CENTO और SEATO से विश्वास उठ रहा है। इन गठबंधनों ने 1965 और 1971 के युद्धों में किसी भी सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था का काम नहीं किया। अंतिम अपमान 1971 में पाकिस्तान का विभाजन और बांग्लादेश का जन्म था। पाकिस्तान ने 1973 में SEATO से नाम वापस ले लिया और 1979 में CENTO अपनी ही अप्रासंगिकता के बोझ तले ढह गया।
यही पैटर्न इस्लामिक सहयोग संगठन (OIC) के साथ दोहराता हुआ प्रतीत होता है। पाकिस्तान इसके सैन्यीकरण का एक प्रमुख हिस्सा रहा है और उसने कई बार कश्मीर मुद्दे का अंतर्राष्ट्रीयकरण करने के लिए इसका इस्तेमाल किया है लेकिन OIC कभी भी एक व्यावहारिक रणनीतिक गठबंधन के लिए स्वाभाविक रूप से उपयुक्त नहीं रहा क्योंकि इस्लामी देशों के बीच कई आंतरिक असंतोष हैं।
इसी तरह, जुलाई 1964 में CENTO (ईरान, तुर्की और पाकिस्तान) के क्षेत्रीय सदस्यों द्वारा स्थापित क्षेत्रीय विकास सहयोग (RCD) का उद्देश्य सामाजिक-आर्थिक विकास को मजबूत करना था लेकिन वित्तीय, राजनीतिक और प्रशासनिक कठिनाइयों ने प्रगति को धीमा कर दिया। CENTO की गिरावट के बावजूद इसका राजनीतिक महत्व लगातार बढ़ता गया। यह पहचानते हुए कि RCD कोई प्रभावी सैन्य विकल्प प्रदान नहीं कर सकता, ईरान और तुर्की ने अभी भी CENTO को महत्व दिया। 12 असंतोषजनक वर्षों के बाद, तीन क्षेत्रीय राष्ट्राध्यक्षों ने अप्रैल 1976 में इजमिर में एक शिखर सम्मेलन आयोजित किया, जिसमें 1964 की घोषणा में संशोधन किया गया। 1977 में RCD के लिए कानूनी ढांचे के रूप में इजमिर संधि पर हस्ताक्षर किए गए। फिर भी RCD असफल रहा और 1985 में उसे इकोनॉमिक कोऑपरेशन ऑर्गेनाइजेशन के लिए रास्ता छोडऩा पड़ा।
CENTO और SEATO के भूतों को बाहर निकालने से 2025 का सऊदी-पाकिस्तान पारस्परिक रक्षा समझौता गहराई से शिक्षाप्रद बन जाता है। रियाद के लिए एक पाकिस्तानी परमाणु छत्र का विस्तार करने के रूप में प्रचारित, यह समझौता सऊदी धरती पर हूती मिसाइल हमलों को रोकने में विफल रहा। जब ईरानी मिसाइलों ने पिं्रस सुल्तान एयरबेस और रियाद हवाई अड्डे पर हमला किया और जब 2026 की शुरुआत में रास तानूरा में अरामको रिफाइनरी पर हमला हुआ, तो यह स्पष्ट रूप से नपुंसक था।
मक्का समझौता भी आंतरिक कलह से मुक्त नहीं है। अरब सिं्प्रग के दौरान शुरू में वे सीरिया में बशर अल-असद के खिलाफ एकजुट थे, दोनों देशों ने विभिन्न असद-विरोधी गुटों को वित्त पोषित किया। हालांकि, तुर्की ने मुस्लिम ब्रदरहुड के लिए भी समर्थन दिखाया, जिसका सऊदी अरब ने विरोध किया, जिससे रियाद में असहज भावना पैदा हुई। 2013 में, जब मिस्र में तख्तापलट हुआ और मोहम्मद मुर्सी, जो मुस्लिम ब्रदरहुड के सदस्य और मिस्र के तत्कालीन राष्ट्रपति थे, को प्रो-सऊदी अब्देल फतह अल-सिसी द्वारा जबरन हटा दिया गयाए तो तुर्की ने इस कदम की निंदा की।
पाकिस्तान अपनी ओर से, इस अस्थिर गतिशीलता में एक पुल के रूप में कार्य करने की उम्मीद में कदम रख चुका है। लेकिन इतिहास बताता है कि वह अधिक संभावना से एक ‘वेज’ (फूट डालने वाला) बनेगा। यह संरक्षकों की तलाश में लगा एक राष्ट्र है जो संबंध से संसाधनों-वित्तीय सहायता, निवेश और राजनयिक समर्थन-को निकालने की कोशिश करता है, जबकि वास्तविक, तैनात करने योग्य सुरक्षा के मामले में बहुत कम योगदान देता है।-मनीष तिवारी

