इस बार मुद्दा हमारे खाने और सेहत से जुड़ा है। 140 साल से भी अधिक पुराने एक जाने-माने ब्रांड के खिलाफ हालिया कार्रवाई ने खाने-पीने की चीजों की शुद्धता को लेकर जनता की ङ्क्षचता और बढ़ा दी है। फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (एफ.एस.एस.ए.आई.) ने इस कंपनी के ‘100 फीसदी शुद्धता’ का दावा करने वाले कई खाद्य पदार्थों की बिक्री पर रोक लगाई है। ऐसी ही कार्रवाई 6 और कंपनियों पर भी हुई है, जिनमें से एक कंपनी पंजाब की भी है। देश में सुरक्षित खाना हर नागरिक का कानूनी हक जरूर है लेकिन अभी हकीकत में ऐसा है नहीं।
मिलावटी दूध या अनाज में कंकड़ के अलावा मसालों में नकली रंग, दूध में डिटर्जैंट, मिठाइयों में कैमिकल की समस्या आम है। भले ही कई मिलावटी चीजें तुरंत बीमार नहीं करतीं लेकिन बरसों बाद जिगर, गुर्दे की और कई अन्य बीमारियां देती हैं।
समस्या कानून की कमी नहीं, बल्कि कानून व उसके लागू होने के बीच की खाई है। बड़ी कंपनियों से उम्मीद की जाती है कि बाजार में प्रोडक्ट पहुंचने से पहले उसकी बेहतरीन जांच करें, पर जांच तब होती है, जब शिकायतें आती हैं और तब तक मिलावटी माल बाजार में पहुंच चुका होता है। सुरक्षित खाना उपभोक्ताओं के लिए केवल कागजी कानून साबित हो रहा है, जिसे लागू करना अभी भी एक चुनौती है।
स्टैंडर्डाइज्ड पैकेजिंग के बगैर बिक रहे मसाले, आटा, तेल में मिलावट का पता लगाना मुश्किल है। साल 2022 से 2025 के बीच देशभर में जांचे गए हर 6 में से एक नमूना एफ.एस.एस.ए.आई. के मानकों पर खरा नहीं उतरा। 1,100 से ज्यादा लाइसैंस रद्द व निलंबित हुए, फिर भी भरोसा नहीं कि हमारी थाली में खाना सुरक्षित है या नहीं। वर्ष 2006 में भारत ने फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड एक्ट बनाया व फूड चेन पर नजर रखने के लिए एफ.एस.एस.ए.आई. स्थापित किया, जो होटल, रेस्तरां, फूड कोर्ट्स और ढाबों की रसोई की स्वच्छता बारे 1 से 5 तक स्कोर रेटिंग भी करता है। अभी तक एफ.एस.एस.ए.आई. की यह स्कोर रेटिंग कराना अनिवार्य रूप से लागू नहीं है।
10 अगस्त को प्रकाशित ‘लोकल सॢकल्स’ संस्था की रेटिंग संबंधी सर्वेक्षण रिपोर्ट के मुताबिक, देश के 244 जिलों में हुए सर्वेक्षण में शामिल 91,000 लोगों में से 74 प्रतिशत ने होटल, रेस्तरां और ढाबों की रसोई की स्वच्छता रेटिंग सार्वजनिक करने के अलावा जोमैटो व स्विगी जैसी फूड डिलीवरी कंपनियों के एप पर भी अनिवार्य रूप से प्रदर्शित करने की मांग की है। हाल ही में महाराष्ट्र के फूड एंड ड्रग (एफ.डी.ए.) कमिश्नर तुकाराम मुंढे ने दिखाया कि इच्छाशक्ति हो तो सब कुछ संभव है। मुंढे ने मई से जुलाई के बीच अकेले मुंबई में 3,137 होटलों, रेस्तरां व ढाबों की जांच दौरान 165 के लाइसैंस सस्पैंड किए, 764 को सुधार नोटिस जारी किए। छापेमारी का असर यह हुआ कि मुंबई के करीब 4000 रेस्तरां ने जांच के डर से पहले ही अपनी रसोई की सूरत बदल डाली।
मिलावटी मसाले, अंतर्राष्ट्रीय साख दांव पर : भारत लगभग 180 देशों को 200 से अधिक किस्मों के मसाले एक्सपोर्ट करता है। सालाना 4 अरब डॉलर से ज्यादा के इस अंतर्राष्ट्रीय कारोबार में भरोसा कई बार टूटा है। अमरीका ने 2021 से भारतीय मसालों में करीब 14.5 प्रतिशत रिजैक्शन दर्ज की है। यूरोपीय यूनियन देशों के लाल मिर्च और काली मिर्च के नमूनों में कैंसरकारी पदार्थ पाए जाने के आरोप हैं। दशकों में बनी साख एक पल में खराब होती है, इसीलिए बहुत-से परिवार आज भी बाजार के मसालों पर भरोसा करने की बजाय घरों में मसाले पीसते हैं।
टैक्नोलॉजी को हथियार बनाएं : सुरक्षित खाना सुनिश्चित करने के लिए सिर्फ छापेमारी पर नहीं, डाटा और टैक्नोलॉजी को हथियार बनाना होगा। क्यू.आर. कोड ट्रेसेबिलिटी, डिजिटल बैच ट्रैकिंग और ए.आई.-आधारित जोखिम विश्लेषण समस्या बढऩे से पहले ही रोक सकते हैं। खाद्य पदार्थों में मिलावट की तेज जांच किट व मोबाइल प्रयोगशालाएं खासकर पंजाब जैसे खाद्यान्न उत्पादन वाले राज्यों में अनिवार्य हों।
भारत के अन्न कटोरे पंजाब की और भी अधिक जिम्मेदारी बनती है। फसलों में कीटनाशक अवशेष, बगैर ट्रेसेबिलिटी के बेची जाने वाली खुली दालें और मसाले और त्यौहारी मौसम में दूध-पनीर-मिठाइयों में मिलावट की ङ्क्षचता बनी रहती है। त्यौहारी सीजन में ही क्यों, खाद्य पदार्थों की बड़े पैमाने पर नियमित जांच के लिए जिला स्तर पर बेहतर लैब और टैक्नोलॉजी आधारित तेज निगरानी से पंजाब अपनी कृषि ताकत से विश्व स्तरीय सुरक्षित खाद्य पदार्थ के मॉडल के रूप में स्थापित हो सकता है। सेहत से खिलवाड़ करने वालों पर कार्रवाई के लिए फॉस्ट ट्रैक कोर्ट, लाइसैंस रद्द व स्थायी ब्लैक लिस्ट में शामिल करना कारगर उपाय हो सकता है।
आगे की राह : खेत से खाने की थाली तक सुरक्षित खाना सुनिश्चित हो। एफ.एस.एस.ए.आई. या फूड एंड ड्रग कमिश्नर अकेले सुरक्षित खाना सुनिश्चित नहीं कर सकते, यह सरकार, उद्योग, किसान, दुकानदार और जागरूक उपभोक्ताओं की सांझी जिम्मेदारी है। सुरक्षित खाना महंगे प्रीमियम ब्रांड तक ही सीमित न हो, बल्कि यह हर नागरिक का बुनियादी अधिकार है।
(लेखक कैबिनेट मंत्री रैंक में पंजाब इकोनॉमिक पॉलिसी एवं प्लानिंग बोर्ड के वाइस चेयरमैन भी हैं)-डा. अमृत सागर मित्तल

