नेपाल में एक बार फिर जलजला, जल-प्रलय आया है, जिसके कारण बिहार के 6 जिलों और उप्र के भी कुछ जिलों को ‘अलर्ट’ पर रखा गया है। वहां एनडीआरएफ की टीमें भी तैनात हैं। यह प्रलय महाविनाशकारी, महात्रासद् और दायरे में आने वाले तमाम इलाकों, इनसानों, परियोजनाओं को तहस-नहस करने वाला साबित हुआ है। करीब 22 पक्के पुल तबाह हो गए, करीब 12 पनबिजली परियोजनाएं तबाह या क्षतिग्रस्त हो गईं, 431 मेगावाट बिजली की परियोजनाएं भी ध्वस्त हो गईं, राजमार्ग टुकड़े-टुकड़े हो गए, इमारतें, होटल, रेस्तरां, रेस्ट हाउस और गांव के गांव मिट्टी-मलबा होकर प्रलय के प्रवाह में बह गए। करीब 60 घर जमींदोज होकर बह गए, 12 अस्पताल भी ‘समतल’ हो गए और करीब 1000 टन का पुल भी ध्वस्त हो गया। नेपाल में चीन के ‘इमिग्रेशन दफ्तर’ की खूबसूरत इमारत का भी नामोनिशान शेष नहीं रहा। यह प्रलय कुदरत का गुस्सा है अथवा खुद इनसान अपना ‘महाविनाश’ तैयार कर रहा है? ऐसी त्रासदियों के बाद भी इस सवाल का जवाब अनसुलझा है, क्योंकि पहाड़ काट-छांट कर खोखले किए जा रहे हैं और विशेषज्ञ उन्हें ‘अति संवेदनशील’ करार दे रहे हैं, लेकिन सडक़ें, सुरंगें, पुल, बांध, पनबिजली परियोजनाएं और अन्य निर्माण लगातार जारी हैं। विनाश से भी खौफ नहीं! चीन इस इलाके में पहाड़ काट कर रेलमार्ग बनाने की योजना पर काम कर रहा है। ऐसा है, तो कुदरत के प्रलय बार-बार आएंगे और एहसास दिलाते रहेंगे कि इनसान बहुत ‘बौना’ प्राणी है। बहरहाल बुधवार देर रात और गुरुवार सुबह तक कुल 844 लोग लापता बताए जा रहे हैं। उनमें 37 एनआरआई और 300 से अधिक भारतीय भी हैं। करीब 225 कर्मचारी और मजदूर भी संपर्क से बाहर बताए गए हैं।
कैलाश मानसरोवर के तीर्थ-यात्रियों में 77 ईशा फाउंडेशन के सदस्य भी हैं, जो लापता बताए गए हैं। नेपाल से सटे तिब्बत में 4.4 तीव्रता का भूकंप आया। उसके 3 मिनट बाद ही ‘बर्फीला हिमस्खलन’ शुरू हो गया। सैटेलाइट तस्वीरों से साफ हुआ है कि ग्लेशियर से 2000 फीट चौड़ा बर्फ का टुकड़ा टूट कर करीब 17,000 फीट की ऊंचाई से गिरा। जहां वह गिरा, वहां बम-विस्फोट जैसा गड्ढा हो गया और ल्हेंदे नदी में पानी जमा होकर एक ‘अस्थायी झील’ बन गई। दबाव में वह झील टूटी और पानी, बर्फ और मलबे का प्रलयंकारी सैलाब नीचे आया। यह नेपाल-तिब्बत की सीमा पर स्थित भोटेकोशी नदी की ओर बढ़ गया। सैटेलाइट से एक दिन पहले बर्फ की परत तेजी से गायब होती दिखाई दी थी। तापमान बढऩे से ग्लेशियर पिघलने या ‘हिमस्खलन’ का कारण हो सकता था। बहरहाल जो भी यथार्थ सामने आया, वह महाविनाशकारी है, बेहद खौफजदा है। हम ऐसा ही विनाश, विध्वंस, तबाही केदारनाथ और उत्तरकाशी के प्रलयों में देख-महसूस कर चुके हैं। गुरुवार सुबह तक 175 से अधिक मौतों की पुष्टि हो चुकी थी, लेकिन विशेषज्ञों की आशंकाएं हैं कि यह आंकड़ा 1000 तक पहुंच सकता है! सुखद खबर यह है कि बचाव ऑपरेशन में 3318 जिंदगियों को बचा लिया गया है। महातबाही, प्रलय की स्थितियों में यह आंकड़ा बेहद मूल्यवान है। हालांकि प्रलय का प्रकोप शांत हो चुका है, लेकिन कीचड़ है, सडक़ें टूट चुकी हैं, मौसम अब भी खराब था, लिहाजा सडक़-मार्ग से ऑपरेशन असंभव-सा था। सैनिकों ने हेलीकॉप्टरों से लोगों की जान बचाई। भारत के ट्रांसपोर्ट विमानों ने 50 टन से अधिक राहत-सामग्री पहुंचा दी है। फंसे लोगों तक उस सामग्री को भेजा जा रहा है। भारत के प्रधानमंत्री मोदी ने नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह से फोन पर बातचीत की और हरसंभव मदद का भरोसा दिलाया। बहरहाल बिहार के पूर्वी-पश्चिमी चंपारण, मुजफ्फरपुर, गोपालगंज, सारण, वैशाली और उप्र के महाराजगंज, कुशीनगर, गोरखपुर, बलरामपुर, सिद्धार्थनगर आदि जिलों में ‘अति अलर्ट’ कर दिया गया है। बिहार में नारायणी नदी गुरुवार सुबह ‘खतरनाक संकेत’ से ऊपर चली गई थी, लेकिन गंडक नदी का जलस्तर संतोषजनक था। बैराज के सभी 36 गेट खोल दिए गए थे और 1.36 लाख क्यूसेक पानी छोड़ा गया था। फिलहाल आपदा के हालात नहीं हैं, लेकिन बुनियादी समस्या तो यह है कि नेपाल-तिब्बत में हजारों ग्लेशियर झीलें हैं। हिमालयी क्षेत्र शेष दुनिया की तुलना में दोगुनी तेजी से ‘गरम’ हो रहा है। उसके बावजूद तिब्बत में सडक़ों का निर्माण सवालिया है।

