डॉ. सुकांत मजूमदार

लेखक केंद्रीय शिक्षा और पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास राज्य मंत्री हैं

राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार केवल व्यक्तिगत उत्कृष्टता की पहचान नहीं हैं; ये हमारे देश के भविष्य को आकार देने वाले प्रमुख शिल्पकारों का सम्मान करते हैं। माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के विज़न के मार्गदर्शन में तथा ‘विकसित भारत 2047’ की दिशा में भारत की सामूहिक यात्रा में, नवाचार को अक्सर वैश्विक सूचकांक और वित्तीय खर्च जैसे तकनीकी नजरिए से देखा जाता है। फिर भी, नवाचार मूल रूप से एक मानवीय प्रयास है — यह छात्र की आँखों में जिज्ञासा की चमक और उस शिक्षक का अटूट समर्पण है, जो यह सुनिश्चित करता है कि कोई भी बच्चा पीछे न छूट जाए।
भारत में शिक्षा के मौजूदा विकास की सबसे खास बात यह है कि उच्च-स्तरीय प्रयोगशाला अनुसंधान और कक्षा की रोज़मर्रा की हकीकत के बीच सोच-समझकर एक पुल बनाया जा रहा है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 के तहत, नवाचार की परिकल्पना सामाजिक न्याय और आर्थिक सशक्तिकरण को बढ़ावा देने वाले एक उत्प्रेरक के तौर पर की गयी है। यह विज़न इस बात पर ज़ोर देता है कि देश की वास्तविक प्रगति तभी हो सकती है, जब हमारे सबसे बेहतरीन शोध का फ़ायदा आखिरी कतार में बैठे आखिरी बच्चे तक पहुँचे।
इस बड़े बदलाव के पैमाने को समझने के लिए, सबसे पहले भारत के राष्ट्रीय अनुसंधान इकोसिस्टम में व्यापक स्तर पर हो रहे महत्वपूर्ण बदलावों को देखना होगा।
व्यापक नवाचार क्रांति: वैश्विक ऊँचाइयों को छूना
इक्कीसवीं सदी में अपनी संप्रभुता और आर्थिक नेतृत्व को मज़बूत करने की कोशिश कर रहे देश के लिए, एक मज़बूत अनुसंधान और विकास (आर एंड डी) इकोसिस्टम बहुत जरूरी है। भारत में एक मौलिक बदलाव आया है; देश अब मुख्य रूप से वैश्विक तकनीक को अपनाने के बजाय, वैश्विक चुनौतियों के लिए समाधान विकसित करने की ओर तेज़ी से बढ़ रहा है। यह बदलाव वैश्विक नवाचार सूचकांक में भारत की बढ़ती रैंकिंग में प्रतिबिंबित होता है, जहाँ देश 2014 के 76वें स्थान से ऊपर उठकर 2025 में 38वें स्थान पर पहुँच गया है।
हालाँकि, असली कहानी भारत की कार्यक्षमता में छिपी है। नवाचार इनपुट के 52वें स्थान की तुलना में, भारत नवाचार आउटपुट में अब दुनिया भर में 32वें स्थान पर है। यह दिखाता है कि देश में नवाचार इनपुट को बड़े प्रभाव वाले नतीजों में बदलने की क्षमता, कई दूसरे देशों के मुक़ाबले ज़्यादा बेहतर है। इस संस्कृति को 6,000 से ज़्यादा उच्च शिक्षा संस्थानों (एचईआई) में आर एंड डी प्रकोष्ठ बनाकर और 59,300 अनुसंधान सहयोग स्थापित करके संस्थागत रूप दिया गया है।
प्रधानमंत्री अनुसंधान फेलोशिप (पीएमआरएफ) द्वारा समर्थित भारत का प्रतिभा समूह भी अनुसंधान इकोसिस्टम के एक महत्वपूर्ण स्तंभ के रूप में उभरा है। पीएमआरएफ ने 3,688 विद्वानों का समर्थन किया है, जिसके परिणामस्वरूप 10,300 शैक्षिक पत्रिका प्रकाशन, 7,966 सम्मेलन पत्र, 834 पेटेंट दाखिले और 221 पेटेंट स्वीकृत हुए हैं। पीएमआरएफ 2.0 10,000 फ़ेलोशिप का समर्थन करने के लिए तैयार है, और प्रधानमंत्री अनुसंधान प्रभाग (पीएमआरसी) को पहले ही 3,600 से अधिक फ़ेलोशिप आवेदन प्राप्त हो चुके हैं, इस प्रकार भारत की बौद्धिक अवसंरचना का विस्तार जारी है। इसे उच्च शिक्षा वित्तपोषण एजेंसी (एचईएफए) ने और बढ़ावा दिया है, जिसने 111 संस्थानों में 281 परियोजनाओं के लिए ₹47,000 करोड़ से अधिक की मंजूरी दी है।
“भारत में एआई निर्माण” के विज़न को आगे बढ़ाने के लिए, कृत्रिम बुद्धिमत्ता में चार समर्पित उत्कृष्टता केंद्र स्थापित किए गए हैं, जिनमें ₹1,490 करोड़ का संचयी निवेश किया जाएगा:

  • स्वास्थ्य सेवा: आईआईएससी बेंगलुरु
  • स्थायी शहर: आईआईटी कानपुर
  • कृषि: आईआईटी रोपड़
  • शिक्षा: आईआईटी मद्रास
    जहां यह अवसंरचना भारत की प्रगति का आधार प्रदान करती है, वहीं ज्ञान का लोकतंत्रीकरण इसे जीवंत बनाता है।
    ज्ञान को सबके लिए सुलभ बनाना: पहुँच और बौद्धिक संपदा
    यह सुनिश्चित करने के लिए कि दूर-दराज़ के गाँव का कोई महत्वाकांक्षी शोधार्थी भी बड़े शहर के शोधार्थी जितने ही मौकों का फ़ायदा उठा सके, भारत ने अतीत में ज्ञान तक सीमित पहुँच वाली व्यवस्थाओं को खत्म करने की कोशिश की है। ‘एक राष्ट्र, एक सदस्यता’ (ओएनओएस) पहल शैक्षिक समानता के लिए एक अहम साधन है, जो 1.8 करोड़ छात्रों और संकाय सदस्यों को 13,000 अंतर्राष्ट्रीय अकादमिक पत्रिकाओं तक पहुँच प्रदान करती है।
    इसकी रफ़्तार भी उतनी ही अहम है। 2025 के 11.4 करोड़ संपूर्ण-पाठ डाउनलोड के बाद, 2026 के शुरुआती छह महीनों में ही 6.26 करोड़ लेखों तक पहुँचा गया है। यह ज्ञान के प्रति उत्सुक देश की नब्ज़ को दर्शाता है।
    ज्ञान तक पहुँच का यह विस्तार भारत के बौद्धिक संपदा इकोसिस्टम में आए बड़े बदलाव के साथ-साथ हुआ है। घरेलू पेटेंट दाखिला 2014–15 के 42,763 से बढ़कर 2024–25 में 1,10,375 हो गया है, जो 158% की भारी वृद्धि को रेखांकित करता है। महत्वपूर्ण बात यह है कि 2021–22 के बाद से इन दाखिलों में शिक्षा क्षेत्र की हिस्सेदारी तीन गुना बढ़ गई है, जो 11.15 प्रतिशत से बढ़कर 34.13 प्रतिशत हो गई है। कपिला कार्यक्रम जैसी पहल, जिसने 13,067 पेटेंट दाखिले में मदद की है, और 418 संस्थानों में आईडिया लैब नेटवर्क, आविष्कारकों की अगली पीढ़ी को प्रशिक्षित करने में मदद कर रहे हैं।
    यह भारत की बढ़ती बौद्धिक संप्रभुता का परिणाम है। उच्च शिक्षा संस्थान अब केवल सीखने की जगहें नहीं रह गए हैं; वे तेज़ी से नवाचार-आधारित भारतीय अर्थव्यवस्था के इंजन बन रहे हैं। भारत के लगभग 125 यूनिकॉर्न में से 86 उच्च शिक्षा संस्थानों से निकले हैं, जिनमें से 62 खास तौर पर आईएआईटी और आईएआईएससी से जुड़े हैं।
    फिर भी, समावेश के बिना नवाचार केवल तकनीकी प्रगति है; सहानुभूति के साथ नवाचार एक सभ्यतागत विजय है। इस विजय का सबसे महत्वपूर्ण स्थान समावेशी कक्षा है।
    प्रौद्योगिकी का मानवीय चेहरा: समावेश का ज़मीनी आधार
    एनईपी 2020 और सतत विकास लक्ष्य 4 के संयोजन में, प्रौद्योगिकी को शिक्षा में समानता लाने वाले एक अहम माध्यम के तौर पर देखा जा रहा है। इसका मकसद सीखने में आने वाली हर तरह की भौतिक और डिजिटल रुकावटों को दूर करके उन्हें अवसरों में बदलना है।
    प्रशस्त ऐप जैसे उपाय आरपीडब्लूडी अधिनियम, 2016 के तहत 21 तरह की दिव्यांगताओं की शुरुआती पहचान में मदद करते हैं, जिससे यह सुनिश्चित हो पाता है कि हर बच्चे की खास ज़रूरतों की स्कूल स्तर पर ही पहचाना की जा सके और उनका समाधान किया जा सके। सहानुभूति बढ़ाने के लिए, ‘प्रिया – एक्सेसिबल वॉरियर’ कॉमिक बुक जैसे संसाधन बच्चों को यह सिखाते हैं कि सभी के लिए सुलभता सुनिश्चित करना सबकी मिली-जुली ज़िम्मेदारी है।
    भारत का डिजिटल समावेशी इकोसिस्टम – जिसमें भारतीय सांकेतिक भाषा (आईएसएल) के लिए पीएम ई -विद्या चैनल 31 और सीआईईटी-एनसीईआरटी के रोज़ाना के समावेशी प्रसारण शामिल हैं – यह पक्का करने की कोशिश करता है कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा हर किसी का अधिकार बने।
    सबसे अहम बदलावों में से एक है ‘किताब एक, पढ़ें अनेक’ (केईपीए) पहल। ‘शिक्षा-प्राप्ति के लिए सार्वभौमिक डिज़ाइन’ (यूडीएल) पर आधारित इन भौतिक-सह-डिजिटल किताबों में छूकर महसूस किए जा सकने वाले डॉट्स, प्रिंट-से-ऑडियो तकनीक और आईएसएल वीडियो से जुड़े क्यूआर कोड होते हैं। जब इस्तेमाल में आसान, मज़बूत और रिचार्ज-योग्य उपकरण के साथ इनका उपयोग किया जाता है, तो ये किताबें ज्ञान तक पहुँचने का एक बहु संवेदी ज़रिया बन जाती हैं। इससे यह साबित होता है कि तकनीक तब अपने शिखर पर होती है, जब वह समाज के सबसे कमज़ोर तबके की मदद करती है।
    हमेशा नई सोच रखने वाले शिक्षक: पंचतंत्र से दीक्षा तक
    चाहे कितना भी आधुनिक भौतिक-सह-डिजिटल टूल क्यों न हो, उसे सही दिशा देने के लिए मानवीय मदद की ज़रूरत होती है। भारतीय परंपरा में, शिक्षक हमेशा से ही नई सोच और नवाचार के मुख्य स्रोत रहे हैं। समावेशी शिक्षा का सिद्धांत भारत की प्राचीन शिक्षण-पद्धति की समझ में भी प्रतिध्वनित होता है।
    पंचतंत्र का उदाहरण लें। जब आचार्य विष्णु शर्मा को राजा अमरशक्ति के उन पुत्रों को पढ़ाने की ज़िम्मेदारी सौंपी गई, जिन्हें पारंपरिक तरीकों से सीखने में मुश्किल होती थी, तो भी वे घबराए नहीं। उन्होंने नए तरीके अपनाए। उन्होंने कहानियों, बातचीत और व्यावहारिक उदाहरणों का इस्तेमाल करके उन्हें उनकी समझ के स्तर पर जाकर सिखाया। यह कालातीत विरासत हमें याद दिलाती है कि एक शिक्षक की असली काबिलियत इसी बात में है कि वह हर सीखने वाले की खास ज़रूरतों के हिसाब से अपने पढ़ाने के तरीके को अनुकूलित कर सके।
    आज, दीक्षा जैसे प्लेटफॉर्म के ज़रिए इस परंपरा को और मज़बूत किया जा रहा है; यह आधुनिक आचार्य के लिए एक डिजिटल साथी की तरह है। दिव्यांगता से जुड़े मुद्दों पर हर महीने होने वाले पाँच दिन के मुफ़्त उन्मुखीकरण कार्यक्रम के ज़रिए, शिक्षकों को ऐसी नई और समावेशी रणनीतियाँ सिखाई जा रही हैं जिनसे वे अपनी कक्षा को भविष्य के लिए तैयार कर सकें।
    भविष्य के निर्माता
    वैश्विक नवाचार सूचकांक में भारत की बेहतर होती रैंकिंग और कृत्रिम बुद्धिमत्ता उत्कृष्टता केंद्र से लेकर केईपीए की पाठ्यपुस्तकों के छूकर महसूस किये जाने वाले पन्नों तक का सफ़र एक ही मिशन को दिखाता है: भारतीय छात्र का सशक्तिकरण। भारत एक ऐसा देश बना रहा है, जहाँ अनुसंधान तो उच्च-स्तरीय हो, लेकिन उसका फ़ायदा ज़मीनी स्तर तक पहुँचे; जहाँ प्रौद्योगिकी तो सबसे आधुनिक हो, लेकिन उसका हृदयस्थल पूरी तरह मानवीय हो।
    शिक्षक इस नवाचार की कहानी के वास्तविक हृदयस्थल हैं। वे ही कागज़ पर बनी नीति को बच्चों के लिए संभावनाओं में बदलते हैं। वे ही ‘विकसित भारत’ के निर्माता हैं। जब भी कोई शिक्षक किसी संघर्ष कर रहे छात्र तक पहुँचने का नया तरीका ढूँढते हैं, तो वह काम न सिर्फ़ उस छात्र के भविष्य को बेहतर बनाता है, बल्कि देश की बौद्धिक शक्ति और नैतिक चरित्र को भी मज़बूत करता है। साथ मिलकर, भारत यह सुनिश्चित कर सकता है कि भविष्य के भारत में कोई भी सपना बहुत बड़ा न हो और कोई भी बच्चा उसे पूरा करने के अवसर से दूर न रहे।
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