सुप्रीम कोर्ट ने ग्रेटर नोएडा में एक छात्र को जारी किए गए नोटिस को लेकर सख्त नाराजगी जताई है। यह नोटिस छात्र प्रदर्शन से जुड़े मामले में जारी किया गया था। कोर्ट ने सवाल उठाया कि जब सुप्रीम कोर्ट पहले ही छात्रों के खिलाफ किसी भी तरह की दंडात्मक कार्रवाई पर रोक लगा चुका है तो कार्यकारी मजिस्ट्रेट ने नोटिस कैसे जारी कर दिया।
मजिस्ट्रेट ऐसा करने की हिम्मत कैसे कर सकता है?
यह मामला बुधवार को वरिष्ठ अधिवक्ता विश्वजीत भट्टाचार्य ने मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ के सामने उठाया। उन्होंने बताया कि गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय के दूसरे वर्ष के एक छात्र को ग्रेटर नोएडा के कार्यकारी मजिस्ट्रेट ने नोटिस भेजा था। नोटिस में छात्र से शांति बनाए रखने के लिए 5 लाख रुपये का निजी मुचलका भरने को कहा गया था। साथ ही 5-5 लाख रुपये की दो जमानतें देने का निर्देश दिया गया था।
इस पर CJI सूर्यकांत ने सख्त नाराजगी जताई। उन्होंने सवाल किया कि जब सुप्रीम कोर्ट ने छात्रों के खिलाफ किसी भी तरह की दंडात्मक कार्रवाई नहीं करने का स्पष्ट आदेश दिया था तो मजिस्ट्रेट ने नोटिस जारी कैसे कर दिया।
प्रदर्शन में शामिल होने के लिए उकसाने का आरोप
यह नोटिस छात्र अक्षत त्रिपाठी को जारी किया गया था। पुलिस रिपोर्ट के आधार पर कार्यकारी मजिस्ट्रेट ने BNSS की धारा 126 और 135 के तहत कार्रवाई शुरू की थी। पुलिस ने आरोप लगाया था कि अक्षत विश्वविद्यालय के छात्रों के बीच सरकार विरोधी और भ्रामक बातें फैला रहे थे। उन पर छात्रों को प्रस्तावित छात्र प्रदर्शन में शामिल होने के लिए प्रेरित करने का भी आरोप लगाया गया था।
पुलिस रिपोर्ट में दावा किया गया था कि उनकी गतिविधियों से तनाव की स्थिति बन रही थी। इससे झगड़े और शांति भंग होने की आशंका जताई गई थी।
कोर्ट ने अधिकारी से मांगा जवाब
वरिष्ठ वकील ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि नोटिस बाद में वापस ले लिया गया था। हालांकि, उन्होंने कहा कि इस तरह की कार्रवाई से छात्रों में डर का माहौल पैदा हो सकता है। CJI सूर्यकांत ने कहा कि नोटिस को रिकॉर्ड पर लाया जाए। कोर्ट इसके बाद संबंधित अधिकारी से इस कार्रवाई को लेकर स्पष्टीकरण मांगेगा।

