दक्षिण कन्नड़ के डिप्टी कमिश्नर शशिकांत सेंथिल ने अपनी नौकरी से इस्तीफा देने के बाद लिखा था- मौजूदा दौर में जब हमारे विविधतापूर्ण लोकतंत्र के सभी संस्थान अभूतपूर्व तरीके से समझौता कर रहे हैं, ऐसे में उनका काम जारी रखना अनैतिक होगा। सेंथिल ने आगे लिखा है कि आने वाला वक्त हमारे देश के मूल स्वभाव के लिए और भी चुनौतीपूर्ण होने वाला है। इसलिए ये बेहतर होगा कि वो प्रशासनिक सेवा से बाहर होकर लोगों के जीवन में भलाई लाने वाला काम करें। कुछ सवाल हैं- क्या अफसरों का मौजूदा सरकारों के साथ काम करना मुश्किल हो गया है? क्या सरकारें अफसरों के साथ ज्यादा सख्ती दिखा रही हैं? या सरकार पर संवैधानिक संस्थाओं को नुकसान पहुंचाने के जो आरोप लगते हैं वो सही हैं…

यूपी की मशहूर आईएएस ऑफिसर दिव्या मित्तल के इस्तीफे पर चर्चा गरमाई हुई है। 13 साल की सेवा के बाद अचानक लिए गए इस निर्णय के पीछे की वजह को तलाशा जा रहा है। इसको लेकर राजनीतिक दलों की ओर से भी तरह-तरह के आरोप लगाए जा रहे हैं। हालांकि इस्तीफे के पीछे की वजह अभी तक साफ नहीं हो सकी है। आईएएस ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट में लिखा कि मैं कुछ देने की सोचकर प्रशासनिक सेवा में आई थी, लेकिन यहां से झोली भरकर लोगों का प्यार और आशीर्वाद लेकर जा रही हूं। दरअसल आईएएस के पद को देश में काफी प्रतिष्ठित माना जाता है और इस प्रतिष्ठित नौकरी को हासिल करना काफी मुश्किल है। लेकिन अगर हम आपसे यह कहें कि यह नौकरी पाना जितना मुश्किल है, उससे अधिक मुश्किल इस नौकरी को छोडऩा है, तो शायद आपको इस बात पर यकीन न हो। उत्तर प्रदेश कैडर में ही पिछले कुछ वर्षों में लगभग एक दर्जन से अधिक आईएएस अधिकारियों ने या तो अपने पद से इस्तीफा दिया है या फिर स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ली है। दिव्या ने इस्तीफे को व्यक्तिगत प्राथमिकताओं और अपने सपनों को नया आयाम देने के लिए उठाया गया कदम बताया। लेकिन यह बात जल्दी गले नहीं उतरती है। दिव्या मित्तल ने पूरे देश के लोगों का ध्यान उस समय अपनी ओर खींचा था जब वो मिर्जापुर के जिलाधिकारी के पद पर कार्यरत थीं। उन्होंने हलिया ब्लॉक स्थित लहुरियादह गांव में स्वतंत्रता के 75 साल बाद लगभग साढ़े सात दशकों से अधिक समय से पानी से वंचित लोगों के लिए पहली बार नल से जल पहुंचाया था।

अगस्त 2023 में तत्कालीन जिला अधिकारी दिव्या मित्तल ने जल जीवन मिशन के तहत कठिन पहाड़ी भूगोल को मात देकर इस गांव के 125 से अधिक घरों में पाइपलाइन से पानी पहुंचाया। इस खबर ने सबका ध्यान अपनी ओर खींचा था। इस दौरान वहां की ग्रामीण जनता ने उनका स्वागत फूलमालाएं पहना कर किया, जिससे लखनऊ में बैठे बड़े अफसर उनसे नाराज हो गए। इस उद्घाटन समारोह और कार्यक्रम के दौरान भी प्रोटोकॉल को लेकर स्थानीय राजनीतिक हलकों में विवाद उत्पन्न हो गया, जिसके बाद उन्हें मिर्जापुर से स्थानांतरित कर दिया गया था। दिव्या को कई महीने तक पोस्टिंग नहीं दी गई। कई महीनों के बाद उन्हें देवरिया का डीएम बनाया गया, जहां से कुछ महीनों के बाद उन्हें वहां से भी हटा दिया गया। दिव्या ने हमेशा बुराई से लडऩे का काम किया। शायद यही कारण है कि नेताओं को वो कभी काम के लिए मुफीद नहीं लगी। दिव्या की खासियत थी कि आप उन पर दबाव डालकर कोई गलत काम नहीं करवा सकते थे। यह बात किसी भी राजनेता को इस देश में रास नहीं आती है। दिव्या ने सोशल मीडिया पर पोस्ट साझा करते हुए अपने इस सफर और देश सेवा के अपने अनुभवों का जिक्र किया, जो इनके किए गए काम और भारत के लिए इनकी खुली आंखों से देखे गए सपने का विस्तार है। रींकू सिंह राही, अनामिका सिंह, आमोद कुमार, अभिषेक सिंह, विकास गोठवाल, विद्या भूषण, मोहम्मद मुस्तफा, रेणुका कुमार और जुथिका पाटनकर, रिग्जिन सैम्पफेल, राजीव अग्रवाल और जी. श्रीनिवासुलु इत्यादि अनेक ऑफिसर नौकरी छोड़ चुके है। क्यों छोड़ रहे हैं आईएएस अफसर नौकरी, यह एक सामाजिक चिंता का विषय है। ये सच है कि हर किसी को अपने सपने को जीने का हक है। कुछ तो कॉरपोरेट जगत, पब्लिक पॉलिसी या अन्य क्षेत्रों में नए अवसर तलाशना चाहते थे। तो कुछ कई बार राज्य और केंद्र के बीच एनओसी या प्रतिनियुक्ति के मामलों में गतिरोध और मनमुताबिक पोस्टिंग न मिलने के कारण भी इस स्थिति को पहुंच गए। कई अधिकारियों ने अपने इस्तीफे में पारिवारिक जिम्मेदारियों या स्वास्थ्य समस्याओं का हवाला दिया है। यहां पर सवाल यह उठता है कि आईएएस बनने के सपने को पूरा करने के लिए इन सभी लोगों ने दिन-रात एक कर दिया होगा। कई रातें जागकर बिताई होंगी। सालों अपने परिवार से दूर रहने का काम किया होगा। न जाने कितनी इच्छाओं को दमन कर दिया होगा।

लेकिन कोई वर्षों से देखे सपने को एक पल में कैसे छोड़ सकता है, यह बहुत बड़ा सवाल है। दक्षिण कन्नड़ के डिप्टी कमिश्नर शशिकांत सेंथिल ने अपनी नौकरी से इस्तीफा देने के बाद लिखा था- मौजूदा दौर में जब हमारे विविधतापूर्ण लोकतंत्र के सभी संस्थान अभूतपूर्व तरीके से समझौता कर रहे हैं, ऐसे में उनका काम जारी रखना अनैतिक होगा। सेंथिल ने आगे लिखा है कि आने वाला वक्त हमारे देश के मूल स्वभाव के लिए और भी चुनौतीपूर्ण होने वाला है। इसलिए ये बेहतर होगा कि वो प्रशासनिक सेवा से बाहर होकर लोगों के जीवन में भलाई लाने वाला काम करें। कुछ सवाल हैं- क्या अफसरों का मौजूदा सरकारों के साथ काम करना मुश्किल हो गया है? क्या सरकारें अफसरों के साथ ज्यादा सख्ती दिखा रही हैं? या सरकार पर संवैधानिक संस्थाओं को नुकसान पहुंचाने के जो आरोप लगते हैं वो सही हैं। आईपीएस की नौकरी से इस्तीफा देने वाले एक ऑफिसर बताते है कि मैंने आईपीएस बनने के लिए बहुत कड़ी मेहनत की, लेकिन नौकरी हासिल करने के बाद उससे भी 100 गुना ज्यादा मेहनत करनी पड़ रही थी। इसलिए मैंने नौकरी छोड़ दी।

मैंने कई लाचार और बेबस आईएएस और आईपीएस अफसर देखे। वो योग्यता और क्षमता में स्तरहीन थे। सिस्टम काम नहीं करता है और आप इसको फिक्स नहीं कर सकते। सारे लोग लाचार और बेबस दिखते हैं। नकारे लोगों की पूरी लेयर होती है। एक के बाद एक नकारे लोग मिलते जाते हैं। सभी लोग आपको दबाने में लगे रहते हैं। नेता, आपके सीनियर, आपके जूनियर…सभी…लेकिन ये भी सच्चाई है कि जिन मजबूरियों और जिस हालात की चर्चा कर नौकरी छोड़ देते हैं, वो तकरीबन सभी नौकरियों में होते हैं। ऐसे अधिकारियों को भी नेताओं और मंत्रियों से दबकर काम करना पड़ता है। कई बार इसी का दबाव झेला नहीं जाता और अधिकारी नौकरी छोड़ देते हैं। आईएएस-आईपीएस सबसे बड़ी नौकरी है, तो बड़े पद को संभालना भी उतना ही जोखिमपूर्ण है। ऐसे अधिकारियों की भरमार है जो नौकरी में रहते हुए बेजा फायदा उठा रहे हैं। आईएएस जैसी सेवाओं में व्यक्ति का आत्मनिर्भर होना आवश्यक है। सरकारी नौकरियों में नवाचार के लिए कोई प्रोत्साहन नहीं मिलता और अक्सर अधिकारी औसत दर्जे के जाल में फंस जाते हैं। कुछ ऑफिसर अफसाने को अंजाम न देकर एक खूबसूरत मोड़ देकर छोड़ जाते हैं। चिंतन का विषय यह है कि इतनी बड़ी नौकरियां भी चुनौतीपूर्ण काम है।-डा. वरिंद्र भाटिया

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