एम.एल. जाट और एन.जी. पाटिल
भारत अभूतपूर्व और ऐतिहासिक गति से अपने डिजिटल, फिजि़कल (भौतिक) और फिजिटल (फिजिकल+डिजिटल) भविष्य का निर्माण कर रहा है।

एन.जी.पाटिल
देश हर वर्ष औसतन 4.5 लाख से अधिक रूट किलोमीटर ऑप्टिकल फाइबर केबल नेटवर्क का विस्तार कर रहा है, जबकि साथ ही लगभग 11,000 किलोमीटर राष्ट्रीय राजमार्गों का निर्माण और 6,500 किलोमीटर रेलवे ट्रैक का विद्युतीकरण किया जा रहा है और हर वर्ष लगभग 5,000 किलोमीटर रेलवे ट्रैक जोड़े जा रहे हैं। इस व्यापक विस्तार का अर्थ है कि देशभर में डिजिटल कनेक्टिविटी के 22.8 लाख किलोमीटर के आश्चर्यजनक विस्तार वाले बहुवर्षीय राष्ट्रीय विस्तार के साथ-साथ, देश प्रतिदिन लगभग 30 किलोमीटर राजमार्ग और 12 से 15 किलोमीटर नई रेल लाइनों का निर्माण कर रहा है। फिर भी, जैसे-जैसे ये विस्तृत परिवहन गलियारे, अल्ट्रा-मेगा सौर पार्क और विशाल डिजिटल नेटवर्क विस्तार पा रहे हैं, कृषि विज्ञान के नेतृत्व में एक शांत तकनीकी सहयोग भूमि की सतह के ठीक नीचे हो रहा है।
बड़े परियोजनाओं के लिए बोली लगाने वालों को अक्सर पहले से मिट्टी की खुदाई की लागत का अनुमान तैयार करना पड़ता है, भले ही पहले से कोई भूवैज्ञानिक जानकारी उपलब्ध न हो। चूंकि परियोजनाओं की निविदा प्रक्रिया की समय-सीमा बहुत कम होती है, इसलिए त्वरित और विश्वसनीय मृदा संबंधी आंकड़े इस जोखिम को काफी हद तक कम कर सकते हैं—विशेषकर तब, जब परियोजना भारत के बाहर स्थित हो और स्थानीय भू-भाग संबंधी आंकड़ों तक पहुंच कठिन हो। इसके अलावा, बोली जीतने के बाद, परियोजना क्रियान्वयन-कर्ताओं को बार-बार आने वाली करोड़ों रुपये की समस्या का सामना करना पड़ता है: नरम मिट्टी में आसानी से खुदाई करते हुए इंजीनियरिंग दल अचानक भूमिगत चट्टान की कठोर दीवार से टकरा जाता है, या भ्रामक काली कपास मिट्टी पर बनाई गई नई सड़क में दरारें पड़ने लगती हैं और वह उखड़ने लगती है। काम रुक जाता है, मशीनरी बेकार खड़ी रहती है और परियोजना की लागत आसमान छूने लगती है। इस महत्वपूर्ण सूचना अंतराल को पाटने के लिए, नागपुर स्थित आईसीएआर–राष्ट्रीय मृदा सर्वेक्षण एवं भूमि उपयोग नियोजन ब्यूरो (एनबीएसएस एवं एलयूपी) के वैज्ञानिकों ने एक क्रांतिकारी प्रतिमान विकसित किया है: मृदा आसूचना-आधारित पूर्वानुमानात्मक इंजीनियरिंग। दशकों से उपलब्ध मृदा विज्ञान संबंधी आंकड़ों को उन्नत मशीन लर्निंग के साथ जोड़कर, आईसीएआर बुनियादी ढांचा योजनाकारों को जमीन में पहली फावड़ी लगने से पहले ही पृथ्वी के बारे में “एक्स-रे दृष्टि” प्रदान कर रहा है—यह सिद्ध करते हुए कि कृषि अनुसंधान खेतों से कहीं आगे राष्ट्रीय विकास का एक आधारभूत चालक है।
गति और विस्तार की अनदेखी की गई चुनौतियां
भारत में वर्तमान अवसंरचना विस्तार की अत्यधिक तीव्र गति के कारण पारंपरिक नियोजन स्वयं एक बाधा बन गया है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, भारत का कुल डिजिटल फुटप्रिंट लगभग 19.35 लाख रूट किलोमीटर से बढ़कर 42.36 लाख रूट किलोमीटर से अधिक हो गया है, जो कई वर्षों में हुए व्यापक विस्तार को दर्शाता है। इसी हालिया पांच-वर्षीय अवधि में, देश ने 57,125 किलोमीटर राष्ट्रीय राजमार्गों का निर्माण किया है। इसी दौरान, भारतीय रेलवे ने 33,000 से अधिक रूट किलोमीटर का विद्युतीकरण किया है, जो औसतन लगभग 6,600 किलोमीटर प्रतिवर्ष है और ब्रॉड गेज नेटवर्क के विद्युतीकरण को लगभग 99.6% तक पहुंचाता है, जिसकी दर प्रतिदिन 15 से अधिक रूट किलोमीटर के विद्युतीकरण की है। स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में, भारत ने अपनी प्रमुख सौर योजना के तहत 54 से 56 बड़े पैमाने के सौर पार्कों को मंजूरी दी है, जिनकी स्वीकृत क्षमता लगभग 39.5 गीगावाट है, जिससे 100 से अधिक सार्वजनिक और निजी पार्कों में कुल ग्राउंड-माउंटेड सौर क्षमता 122 गीगावाट से अधिक हो गई है।
इन विशाल कार्यों में शामिल कई सरकारी और निजी एजेंसियां—चाहे वे भूमिगत संचार लाइनों को बिछाने, विद्युत पारेषण टावर खड़े करने या विशाल सौर संरचनाओं को आधार प्रदान करने का काम कर रही हों—सटीक भूमिगत आंकड़ों पर अत्यधिक निर्भर रहती हैं। फिर भी, पारंपरिक प्रारंभिक भू-तकनीकी सर्वेक्षण में काफी समय और लागत लगती है। चूँकि, परियोजनाएं इतनी तेजी से आगे बढ़ रही हैं, ये महत्वपूर्ण मृदा जांच अक्सर छोड़ दी जाती हैं या सीमित कर दी जाती हैं। इसका परिणाम? अनिश्चित विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर), भ्रामक लागत अनुमान और बोलीदाताओं के लिए गंभीर वित्तीय जोखिम।
कृषि-अवसंरचना संबंध
आईसीएआर-एनबीएसएस एवं एलयूपी ने इस सूचना-अंतराल को एक प्रमाणित, समय-परीक्षित प्रौद्योगिकी के माध्यम से दूर किया है, जो पूरे भारत और कई अन्य देशों में काम करती है। उपग्रह रिमोट सेंसिंग और मशीन लर्निंग का उपयोग करके, आईसीएआर स्थल-विशिष्ट भू-तकनीकी मृदा गुणों, जैसे मृदा की गहराई, अंतिम वहन क्षमता (सिविल इंजीनियरिंग संरचना को सहारा देने में निर्णायक कारक), स्थू,ल घनत्व आदि का पूर्वानुमान लगाता है, जिसके लिए भूमि की धीमी, महंगी और विघटनकारी ड्रिलिंग की आवश्यकता नहीं होती।
यह पद्धति पूरी तरह स्वचालित पाइपलाइन के अंतर्गत बहु-स्रोत भू-स्थानिक इनपुट पर मशीन-लर्निंग रिग्रेशन मॉडल का उपयोग करती है। उपग्रह चित्रों, डिजिटल एलिवेशन मॉडल, भू-भाग की ढलान संबंधी व्युत्पन्न आंकड़ों, लिथोलॉजी और भूजल स्तर को संसाधित करके, आईसीएआर का मृदा वर्गीकरण इंजन सटीक, स्थल-विशिष्ट पूर्वानुमान तैयार करता है। यह प्रणाली मृदा की गहराई (नरम, कठोर या मिश्रित परतों की गहराई) और अन्य मापदंडों का सटीक पूर्वानुमान लगाती है। इन मापदंडों का उपयोग इंजीनियरिंग एजेंसियों द्वारा प्रारंभिक भू-तकनीकी डिजाइन, विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) तैयार करने और बोली-पूर्व लागत अनुमान के लिए सीधे किया जाता है।
पारंपरिक क्षेत्र सर्वेक्षणों की तुलना में, यह डिजिटल समाधान लागत और समय दोनों में 75% की कमी करता है। तीन सदस्यों की एक छोटी टीम प्रतिदिन लगभग 1,000 किलोमीटर लंबे मार्ग को संसाधित कर सकती है, जिससे यह बड़े पैमाने पर, समयबद्ध राष्ट्रीय नियोजन के लिए विशेष रूप से उपयुक्त बन जाता है। भारतभर में 50,000 किलोमीटर से अधिक क्षेत्र में इस पूर्वानुमानात्मक दृष्टिकोण का सत्यापन करने के बाद, क्षेत्र में सत्यापित आंकड़ों के मुकाबले लगभग 80% की पूर्वानुमान सटीकता (R² मान लगातार 0.78 से अधिक) प्राप्त हुई है, यहां तक कि कम आंकड़ों वाले क्षेत्रों में भी। अब इन परिकलन विधियों (एल्गोरिदम) को मानकीकृत कर दिया गया है।
वैश्विक उपस्थिति और वाणिज्यिक विश्वसनीयता
इस प्रणाली का भारत के अत्यंत विविध भौगोलिक क्षेत्रों में कठोर क्षेत्र-परीक्षण किया गया है—उत्तराखंड और असम के हिमालयी पर्वतीय क्षेत्रों से लेकर राजस्थान के थार मरुस्थल तथा दक्कन के पठार और सिंधु-गंगा के मैदानों तक। क्षेत्रीय आंकड़ों के आधार पर मानकीकृत की गई यह प्रौद्योगिकी अब राष्ट्रीय सीमाओं से आगे बढ़ चुकी है। प्रमुख सार्वजनिक और निजी अवसंरचना कंपनियां भारत और अंतरराष्ट्रीय क्षेत्रों में 2,00,000 से अधिक रूट-किलोमीटर का मानचित्रण करने के लिए इस प्रणाली को अपना चुकी हैं, जिससे आईसीएआर के अनुसंधान पारितंत्र के लिए संसाधन जुटाने के साथ-साथ बहुमूल्य विदेशी मुद्रा की बचत भी हो रही है और भारतीय कंपनियों को आगे बढ़ने तथा वैश्विक कंपनियों के साथ प्रतिस्पर्धा करने में सक्षम बनाया जा रहा है।
अडानी ट्रांसमिशन लिमिटेड, स्टरलाइट टेक्नोलॉजीज़ लिमिटेड, टाटा प्रोजेक्ट्स लिमिटेड और केईसी इंटरनेशनल लिमिटेड सहित प्रमुख वैश्विक अवसंरचना कंपनियों ने इस समाधान को अपनाया है। केईसी इंटरनेशनल जैसी अंतरराष्ट्रीय कंपनी, जो 100 से अधिक देशों में पारेषण लाइनों को डिजाइन और इनका निर्माण करती है, के लिए मृदा संबंधी आंकड़े वित्तीय अस्तित्व के लिए एक महत्वपूर्ण निर्धारक हैं। नींव संबंधी गतिविधियां और परियोजना जोखिम पूरी तरह से मृदा के प्रकार पर निर्भर करते हैं। ऐसे उद्योग में जहां 6,000 करोड़ रुपये से अधिक के राजस्व आधार पर मार्जिन में मामूली 0.1% की कमी भी 6 करोड़ रुपये के वार्षिक नुकसान में बदल जाती है, सटीक मृदा आसूचना अत्यंत महत्वपूर्ण है।
संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, नाइजर, रूस, केन्या, मोरक्को, मोल्दोवा, मैक्सिको, मलेशिया, अबू धाबी, नेपाल, बांग्लादेश और ट्यूनीशिया जैसे भौगोलिक रूप से जटिल देशों में पारेषण लाइन परियोजनाओं के लिए बोली लगाते समय, मृदा संबंधी आंकड़ों की कमी या वास्तसविक स्थिति का निष्प क्ष/सही प्रतिनिधित्वद न करने वाले आंकड़े लाभप्रदता को प्रभावित कर सकते हैं। आईसीएआर की प्रौद्योगिकी विश्वसनीय तृतीय-पक्ष सत्यापन प्रदान करती है, जो ग्राहकों या परियोजना प्रबंधकों द्वारा मृदा की स्थिति के संबंध में किए गए दावों की जांच के लिए एक निष्पक्ष सत्यापनकर्ता के रूप में कार्य करती है, जिससे बोली लगाने में विश्वास बढ़ता है। छोटी लागत वाली निविदाओं के मामले में, जहां समय या वित्तीय सीमाओं के कारण भौतिक सर्वेक्षण संभव नहीं होते, यह पूर्वानुमानात्मक आंकड़ा इस कमी को पूरा करता है।
राष्ट्रीय प्रगति की प्रेरक
इस आंकड़े और विश्लेषण की सफलता ने अवसंरचना क्षेत्र की दिग्गज कंपनियों को आईसीएआर की प्रौद्योगिकी को विभिन्न व्यावसायिक इकाइयों में व्यापक रूप से लागू करने के लिए प्रेरित किया है, जिससे इसकी उपयोगिता विद्युत पारेषण लाइनों से आगे बढ़कर रेलवे, सौर ऊर्जा प्रतिष्ठानों और भूमिगत केबलिंग तक विस्तृत हो गई है।
उन्नत मृदा विज्ञान का उपयोग करके राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय निर्माण गलियारों के जोखिम को कम करते हुए, कृषि अनुसंधान ने स्वयं को भारत की व्यापक आर्थिक वृद्धि के एक अपरिहार्य चालक के रूप में सिद्ध कर दिया है। यह प्रौद्योगिकी दर्शाती है कि मृदा विज्ञान में निवेश केवल देश का पेट नहीं भरता, बल्कि उसके वैश्विक भविष्य की आधारशिला भी तैयार करता है। इस सफलता के आधार पर, आईसीएआर के वैज्ञानिक अब 90 मीटर रिजॉल्यूशन वाले मृदा गहराई मानचित्र और हाल ही में इसी रिजॉल्यूशन वाले मृदा बनावट मानचित्र जैसे पूर्वानुमानात्मक डिजिटल मृदा मानचित्र भी आत्मविश्वास के साथ तैयार कर रहे हैं। ये मानचित्र निकट भविष्य में भारत को डिजिटल कृषि की दिशा में मजबूती से आगे बढ़ाएंगे, विशेष रूप से भारत के किसानों को भूखंड-विशिष्ट समाधान उपलब्ध कराने में।
(लेखक एम.एल. जाट कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार के कृषि अनुसंधान और शिक्षा विभाग (डीएआरई) के सचिव और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के महानिदेशक हैं, एन.जी. पाटिल आईसीएआर-राष्ट्रीय मृदा सर्वेक्षण एवं भूमि उपयोग नियोजन ब्यूरो (एनबीएसएस एवं एलयूपी), नागपुर के निदेशक हैं)