बॉम्बे हाई कोर्ट की औरंगाबाद बेंच ने अपने एक फैसले में कहा कि एक मां के पास अपने बच्चे को समझने के लिए दैवीय शक्तियां होती है, अगर बच्ची की मां ने इस बात की पुष्टि कर दी है कि उसकी बच्ची के साथ दुष्कर्म हुआ है तो वह कानून से ऊपर है। कोर्ट ने कहा कि अपराध के समय पीडि़ता करीब साढ़े चार साल की थी, इसलिए अपने साथ हुए जघन्य अपराध को बताने में असमर्थ थी। कोर्ट ने कहा कि मां का अपमानजनक बयान यह विश्वास दिलाने के लिए काफी है, उसकी बेटी के साथ बलात्कार हुआ था। कोर्ट ने आगे कहा कि इस अपराध के लिए अपराधी को दस साल की सजा मिलनी चाहिए थी लेकिन दोषी पहले से ही तीन साल की सजा काट चुका है, इसलिए उसको पांच साल की और सजा दी जाएगी। कोर्ट ने आगे कहा कि सजा सुनाने के समय अपराधी बालिग नहीं था और 21 साल का पूरा होने में कुछ समय बाकी था, इसलिए अदालत ने निर्देश दिया कि उसे कानून के विरोध में बच्चों के लिए एक विशेष घर में भेजा जाए और 21 साल की उम्र होने तक उसे शैक्षिक और कुशल विकास सेवाओं सहित सुधारकारी सेवाएं प्रदान की जाएं। विभा कंकणवादी की बेंच ने इस मामले की सुनवाई की। अपराधी के वकील आरवी गोरे ने कोर्ट में दोषी की सजा कम करने के लिए एक याचिका दायर की थी, जिसमें वकील ने कहा था कि अपराध के समय वह बालिग नहीं था और एक व्यस्क के तौर पर उसे दोषी ठहराया गया। इसलिए कोर्ट से अपील है कि अपराधी की सजा को कम किया जाए। 11 अगस्त 2017 को अपराधी ने ये जघन्य अपराध किया था। दोषी चॉकलेट के बहाने दो नाबालिगों को अपने घर ले गया, जिसमें अपराधी के एक नाबालिग के साथ दुष्कर्म किया। मां को जैसे छोटी बेटी के रोने की आवाज आई, वो मौके पर पहुंची और दरवाजे को खटखटाने लगी। अपराधी ने दरवाजा खोला और वहां से चला गया। इसके बाद मां अपनी दोनों बेटियों को घर ले आई और अपनी बड़ी बेटी के प्राइवेट पार्ट और जांघ पर उसे चिपचिपा पदार्थ मिला। बच्ची अपनी मां को यह बताने में असमर्थ रही कि उसके साथ क्या हुआ है लेकिन उसकी मां ने समझ लिया कि बच्ची के साथ दुष्कर्म किया गया है। नाबालिग बच्चियों के माता-पिता ने पुलिस में शिकायत दर्ज की और दोषी का गिरफ्तार कर लिया गया।

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