आज गणेश चतुर्थी सिर्फ पूजा, पंडाल और विसर्जन का पर्व नहीं रह गई है। महाराष्ट्र से शुरू होकर देशभर में लोकप्रिय हुए सार्वजनिक गणेशोत्सव के पीछे एक ऐसी राजनीतिक कहानी छिपी है, जिसने धार्मिक आस्था को सामाजिक एकजुटता का माध्यम बना दिया। 1893 में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने घरों तक सीमित गणेश आराधना को सार्वजनिक मंच दिया। मकसद केवल उत्सव बढ़ाना नहीं था, बल्कि अंग्रेजी शासन के दौर में लोगों को एक साझा मंच पर लाना और राष्ट्रीय चेतना जगाना भी था।
एक पूजा से शुरू हुआ सार्वजनिक आंदोलन
19वीं सदी के अंतिम वर्षों में भारत अंग्रेजी हुकूमत के दबाव में था। राजनीतिक सभाओं और जनसमूहों पर निगरानी रहती थी। ऐसे माहौल में तिलक ने समझा कि धार्मिक उत्सव ऐसा रास्ता हो सकता है, जहां बड़ी संख्या में लोग बिना किसी सीधे राजनीतिक मंच के एकत्र हो सकें।
यहीं से गणेशोत्सव को नया रूप देने की योजना सामने आई। 1893 से गणेश पूजा को सार्वजनिक स्वरूप देने का अभियान तेज हुआ। पहले गणेश चतुर्थी मुख्यत घरों और सीमित सामाजिक दायरे में मनाई जाती थी। तिलक ने इसे सामूहिक आयोजन में बदलने के लिए मंडल, सार्वजनिक कार्यक्रम, भजन, गीत और भाषण जैसी गतिविधियों को जोड़ा।
इस बदलाव का सबसे बड़ा असर यह हुआ कि अलग-अलग सामाजिक पृष्ठभूमि के लोग एक ही आयोजन में शामिल होने लगे। धार्मिक आस्था के साथ सामाजिक मेलजोल और सार्वजनिक भागीदारी बढ़ी। यही वह बिंदु था जहां गणेशोत्सव धीरे-धीरे सांस्कृतिक आयोजन से आगे बढ़कर राष्ट्रवादी चेतना के मंच में बदलने लगा।
तिलक के लिए गणेश ही क्यों?
गणेश जी भारतीय समाज में सबसे ज्यादा पूजित देवता हैं। ऐसे प्रतीक के जरिए लोगों तक पहुंच बनाना अपेक्षाकृत आसान था। तिलक पत्रकारिता और सार्वजनिक भाषणों के जरिए पहले ही राजनीतिक चेतना फैलाने में सक्रिय थे। 1881 में उन्होंने ‘केसरी’ और ‘द मराठा’ जैसे समाचारपत्रों की शुरुआत की थी। उनका राजनीतिक लक्ष्य स्वशासन यानी स्वराज की मांग को मजबूत करना था।
बाद में 1896 में उन्होंने शिवाजी उत्सव को भी राष्ट्रीय चेतना से जोड़ा। यानी तिलक केवल धार्मिक आयोजनों का विस्तार नहीं कर रहे थे, बल्कि भारतीय इतिहास, संस्कृति और सामूहिक पहचान को राजनीतिक जागरूकता से जोड़ने की रणनीति पर काम कर रहे थे।
आज भी क्यों प्रासंगिक है तिलक का प्रयोग?
समय बदल गया, लेकिन सार्वजनिक गणेशोत्सव का सामाजिक प्रभाव कायम है। आज यह धार्मिक आयोजन होने के साथ सांस्कृतिक कार्यक्रमों, सामुदायिक सेवा, रक्तदान, सामाजिक अभियानों और स्थानीय कारोबार का बड़ा हिस्सा बन चुका है। 2026 में भी देश के अलग-अलग हिस्सों में गणेश चतुर्थी बड़े स्तर पर मनाई जा रही है। इस वर्ष गणेश चतुर्थी 14 सितंबर को है और अनंत चतुर्दशी पर 25 सितंबर को कई स्थानों पर विसर्जन होगा।
हालांकि तिलक की रणनीति को लेकर इतिहास में बहस भी रही है। आलोचकों ने उनके राजनीतिक राष्ट्रवाद और धार्मिक प्रतीकों के इस्तेमाल को लेकर सवाल उठाए। फिर भी इतिहास का एक तथ्य निर्विवाद है। तिलक ने यह दिखा दिया कि कोई पारंपरिक उत्सव केवल पूजा तक सीमित नहीं रहता, यदि उसे समाज की सामूहिक शक्ति से जोड़ दिया जाए।

