भारत के चुनाव आयोग के भीतर की ‘असहमतियां’ सामान्य नहीं हैं। वे राजनीतिक भी नहीं हैं। राहुल गांधी और अखिलेश यादव सरीखे विपक्षी नेताओं के आरोप भी नहीं हैं। याद रखना चाहिए कि चुनाव आयोग कोई एक व्यक्ति नहीं, बहुसदस्यीय संवैधानिक संस्था है। यह व्यवस्था और दर्जा संसद में पारित किया गया है। 1995 में तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव की सरकार ने चुनाव आयोग को तीन सदस्यीय कर उसे ‘अधिनायकवाद’ से बचाया था। तब की कांग्रेस सरकार तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) टीएन शेषन से बहुत दुखी और परेशान थी, नतीजतन आयोग में तीन आयुक्तों की व्यवस्था की गई। सीईसी और दो अन्य आयुक्तों की संवैधानिक शक्तियां एक समान तय की गईं। अलबत्ता सीईसी बैठकों की अध्यक्षता जरूर कर सकते हैं, यह भी तय किया गया। कोई भी फैसला, आदेश, निर्देश चुनाव आयोग का तब मान्य और स्वीकार्य होगा, जब आयुक्त सर्वसम्मति या बहुमत से निर्णय लेंगे। ‘इंडियन एक्सप्रेस’ की खोजी खबर और विश्लेषण के बाद चुनाव आयोग का भीतरी यथार्थ और विरोधाभास सार्वजनिक हुए हैं कि 10 महीने में 14 आपत्तियां दो चुनाव आयुक्तों-सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी-ने जताई हैं। उनमें से कुछ सीईसी को भी भेजी गई हैं। ये सामान्य आपत्तियां नहीं हैं। संवैधानिक शख्स की आवाज हैं। वैचारिक मतभेद और बहुसदस्यीय आयोग होने के कारण अथवा किसी भी विविध मंच पर ऐसी असहमतियां जताना बुनियादी तौर पर ‘लोकतांत्रिक’ है। सवाल है कि चुनाव आयोग का भीतरी मामला कैबिनेट सचिव तक पहुंचने की नौबत क्यों आई? दोनों असहमत आयुक्तों ने कैबिनेट सचिव को चि_ियां लिख कर शिकायत क्यों दर्ज कराई? चुनाव आयोग भारत सरकार के तहत काम नहीं करता, बल्कि राष्ट्रपति के प्रति जवाबदेह है। राष्ट्रपति ही सीईसी सहित तीनों चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति करते हैं, बेशक भारत सरकार की सलाह पर ही नियुक्तियां की जाती हैं। असहमत आयुक्तों को सीधा राष्ट्रपति को पत्र लिख कर शिकायत करनी चाहिए थी। क्या ऐसे संदर्भ के बावजूद आयोग दावा कर सकता है कि सभी फैसले सर्वसम्मति से लिए जाते हैं? दूसरा मामला फॉर्म 6 का चुनाव आयुक्तों ने उठाया है।
यह संविधान और सरकारी कार्यप्रणाली का घोर उल्लंघन भी है, यदि फॉर्म में बदलाव किए गए हैं! दोनों असहमत चुनाव आयुक्तों ने फॉर्म 6 में कथित बदलाव को ‘अवैध’ और ‘अनधिकृत’ करार दिया है। आयोग को ऐसे संशोधन या परिवर्तन करने का कोई संवैधानिक अधिकार नहीं है। बदलाव का विशेषाधिकार सरकार और संसद को है। कानून मंत्रालय का विधायी विभाग अपेक्षित बदलाव के बाद गजट में अधिसूचना जारी करता है। उसके बाद ही चुनाव आयोग किसी बदलाव को लागू और प्रभावी कर सकता है। इसके अलावा, दोनों असहमत चुनाव आयुक्तों ने विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर), काटे गए करीब 13.37 करोड़ मतदाताओं के नाम, मतदाता सूचियों के ‘केंद्रीकरण’, आईटी विभाग की डीजी सीमा खन्ना, मतदाता पंजीकरण अधिकारी (ईआरओ) की संबद्ध विभाग तक पहुंच न होने, संपूर्ण आयोग के फैसले या निर्देश के बिना ही आधिकारिक बयान जारी करने और अधिकारियों की विदेश यात्रा, बैठकों के एजेंडे और मिनट्स उपलब्ध न कराए जाने पर भी आपत्तियां दर्ज कराई गई हैं। इसके साफ मायने हैं कि आयोग में सीईसी का ‘अधिनायकवाद’ और एकाधिकार जारी रहा है। फैसले सीईसी ज्ञानेश कुमार गुप्ता के स्तर पर ही लिए जाते रहे हैं। मतदाता सूचियों के केंद्रीकरण का मतलब यह है कि आयोग के स्तर पर किसी भी मतदाता का नाम जोड़ा या काटा जा सकता है। बंगाल, बिहार, महाराष्ट्र, हरियाणा में हम ऐसा महसूस कर चुके हैं। बंगाल में ट्रिब्यूनल काम कर रहे हैं और अभी तक 91 फीसदी से अधिक मतदाताओं को बहाल किया जा चुका है। उनके नाम सूची में शामिल करने के विरोध की भी अपील की गई है। उसमें भी चुनाव आयोग की भूमिका सामने आई है, क्योंकि असहमत आयुक्तों ने सवाल उठाए हैं। बहरहाल आश्चर्य यह है कि अखबार की सांगोपांग खबर को न तो तीनों आयुक्तों में से किसी ने भी खारिज किया है और न ही तीनों ने एक साथ सार्वजनिक मंच पर आकर स्पष्टीकरण दिया है। आयोग के उपनिदेशक की सफाई सरकारी किस्म की, बेमानी है। विपक्ष और देश के निशाने पर सीईसी हैं। सवाल किए जा रहे हैं कि क्या चुनाव आयोग ज्ञानेश कुमार का ही है? विपक्ष उनके खिलाफ केस दर्ज करने और उनकी गिरफ्तारी तक की मांग कर रहा है। देश के युवा भी कई सवाल कर रहे हैं।

