नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने संभल हिंसा मामले में मुल्ला अफरोज की हिरासत को नेशनल सिक्योरिटी एक्ट, 1980 के तहत रद कर दिया है और उत्तर प्रदेश सरकार पर 10 लाख रुपये का जुर्माना लगाया है।
मुल्ला अफरोज पर 2024 की संभल हिंसा का मास्टरमाइंड होने का आरोप लगा था। सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस फैसले को पलट दिया, जिसमें डिटेंशन ऑर्डर को सही ठहराया गया था।
उत्तर प्रदेश सरकार पर 10 लाख रुपये का जुर्माना
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की बेंच ने संभल हिंसा मामले में आज मंगलवार, 29 सितंबर को फैसला सुनाते हुए कहा कि प्रिवेंटिव डिटेंशन (एहतियाती हिरासत) के लिए सिर्फ ‘एक्स्ट्रा-जुडिशियल कन्फेशन’ (न्यायालय के बाहर किया गया कबूलनामा) ही एकमात्र आधार नहीं हो सकता।
कोर्ट ने गैर-कानूनी प्रिवेंटिव डिटेंशन ऑर्डर जारी करने के लिए सरकार पर 10 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया। कोर्ट ने कहा कि हिरासत में लेने वाले अधिकारी को अन्य संबंधित परिस्थितियों पर भी विचार करना चाहिए। कोर्ट ने पाया कि अफरोज के मामले में अधिकारियों ने ऐसा नहीं किया और अपनी शक्तियों का गलत इस्तेमाल किया।
क्या है मामला?
याचिकाकर्ता मुल्ला अफरोज संभल हिंसा मामले में आरोपी है। संभल में यह हिंसा शाही जामा मस्जिद के कोर्ट-ऑर्डर सर्वे के बाद हुई थी, जिसमें चार लोगों की मौत हो गई थी।
मुल्ला अफरोज को हिंसा के करीब 54 दिन बाद गिरफ्तार किया गया था। यह गिरफ्तारी पुलिस कस्टडी में दिए गए कबूलनामे के आधार पर हुई थी। हालांकि बाद में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उसे जमानत दे दी थी।
13 अक्टूबर 2025 को NSA के तहत मुल्ला अफरोज के खिलाफ डिटेंशन ऑर्डर जारी किया गया। हाई कोर्ट ने बाद में इस डिटेंशन ऑर्डर को सही ठहराया, जिसके बाद याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
सुप्रीम कोर्ट के सामने याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि हिंसा के दौरान पुलिस ने खुद गोली चलाई थी और इस पहलू की निष्पक्ष जांच नहीं हुई थी। उसने इस संबंध में प्रोटेस्ट पिटीशन (विरोध याचिका) दाखिल करने की अनुमति मांगी।
पुलिस कस्टडी में कही गई बात आधार नहीं
याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि मुल्ला अफरोज की गिरफ्तारी पुलिस कस्टडी में दिए गए कबूलनामे पर आधारित थी, जो कानून की नजर में मान्य नहीं है।
प्रिवेंटिव डिटेंशन (एहतियाती हिरासत) के मामले में, उन्होंने कहा कि मुल्ला अफरोज के नाम सिर्फ कई आपराधिक मामलों का होना ही हिरासत में लेने की बात को सही नहीं ठहरा सकता। इसके लिए पर्याप्त सबूतों का होना जरूरी है।
‘रेखा बनाम तमिलनाडु राज्य’ और ‘अमीना बेगम बनाम तेलंगाना राज्य’ के मामलों का हवाला देते हुए यह तर्क दिया गया कि अगर किसी ठोस सबूत के बिना सिर्फ इस बात की आशंका हो कि हिरासत में लिया गया व्यक्ति दोबारा अपराध में शामिल हो सकता है, तो यह प्रिवेंटिव डिटेंशन का सही आधार नहीं हो सकता।
हिरासत के आदेश का बचाव करते हुए, राज्य ने इस बात पर जोर दिया कि याचिकाकर्ता के हिंसा फैलाने या सार्वजनिक व्यवस्था को प्रभावित करने की आशंका है।

