ग्वालियर के महाराज माधवराव सिंधिया का प्लेन क्रैश हो गया. जब मलबे से शवों को निकाला गया, तो सभी के शव बुरी तरह झुलस चुके थे. किसी का भी चेहरा पहचानने लायक नहीं बचा था. माधवराव सिंधिया के पार्थिव शरीर की पहचान दो खास चीजों से की जा सकी.
Madhavrao Scindia: यह बात आज से ठीक 25 साल पहले की है. 30 सितंबर 2001 को दिल्ली से उड़कर कानपुर की तरफ जा रहा एक प्राइवेट प्लेन हादसे का शिकार हो गया. तेज बारिश और खराब मौसम की वजह से प्लेन मैनपुरी जिले के एक गांव के खेतों में जा गिरा. इलाके में हल्ला मच गया. लोगों का हुजूम इकट्ठा हो गया. सूचना पर पुलिस और प्रशासन भी पहुंचा. जलकर टूट चुके प्लेन में 8 लोगों की बॉडी थी, जो झुलसी हुई थी. पहचान करना मुश्किल था. जब पता चला कि इस प्लेन में ग्वालियर राजघराने के महाराज माधवराज सिंधिया सवार थे, तो सबके हाथ पैर ठंडे पड़ गए. लेकिन इन 8 लोगों में महाराज कौन से थे, ये पता करना मुश्किल था. जब उनके परिजन और परिचित पहुंचे तो दो खास चीजों से बॉडी की शिनाख्त की गई.
मध्य प्रदेश का ग्वालियर राजघराना मतलब सिंधिया परिवार, देश की राजनीति और इतिहास में एक बड़ा रसूख रखता है. लेकिन अथाह संपत्ति और राजनीतिक ताकत के पीछे इस घराने में कई सालों तक एक ऐसी पारिवारिक और राजनीतिक तकरार चली, जिसने मां-बेटे के पवित्र रिश्ते में कभी ना भरने वाली खाई पैदा कर दी. एक तरफ थीं जनसंघ और बीजेपी की मजबूत स्तंभ राजमाता विजयाराजे सिंधिया, तो दूसरी तरफ कांग्रेस के कद्दावर नेता उनके बेटे माधवराव सिंधिया. दोनों की विचारधाराएं अलग थीं, रास्ते अलग थे और यह कड़वाहट राजमाता की मौत और वसीयत तक जारी रही.
रिश्तों में पड़ी खटास के बावजूद मां और बेटे का गर्भनाल संबंध ऐसा कि मां के निधन के कुछ महीनों के बाद ही माधवराव भी चल बसे. तारीख थी 30 सितंबर और साल 2001. हालांकि यह मौत बहुत दुखद, अजीबोगरीब और विवादित हो गई. वह एक प्लेन क्रैश में खत्म हो गए. उनकी बॉडी की पहचान का किस्सा भी काफी अहम है. सिंधिया परिवार की इस आंतरिक दुश्मनी और माधवराव सिंधिया के असमय निधन से जुड़ा हर एक किस्से पर गौर करते हैं.
साथ में शुरुआत, फिर राजनीतिक राहें क्यों जुदा?
ऑक्सफोर्ड से पढ़ाई पूरी कर लौटे माधवराव सिंधिया ने 1971 में अपनी मां राजमाता विजयाराजे सिंधिया के कहने पर जनसंघ के समर्थन से निर्दलीय चुनाव लड़ा और जीत दर्ज की. लेकिन वक्त के साथ माधवराव की सोच बदलने लगी. उन्हें लगने लगा कि जनसंघ की राजनीति उनके अनुकूल नहीं है. 1980 के दशक तक आते-आते माधवराव सिंधिया पूरी तरह कांग्रेस के पाले में चले गए.
जब राजमाता विजयाराजे सिंधिया कांग्रेस और इंदिरा गांधी की कट्टर विरोधी बनकर उभरीं, वहीं उनका इकलौता बेटा इंदिरा गांधी और राजीव गांधी का करीब बन चुका था. 1980 के लोकसभा चुनाव में जब राजमाता ने इंदिरा गांधी के खिलाफ रायबरेली से चुनाव लड़ा, तब माधवराव ने कांग्रेस के ही टिकट पर गुना से चुनाव जीता. यहीं से मां-बेटे की राजनीतिक राहें हमेशा के लिए अलग हो गईं.
दरार की असली वजह क्या?
इस रिश्ते में दरार की असली वजह इमरजेंसी के साथ ही सिपहसालार सरदार आंग्रे और संपत्ति भी रही. मां-बेटे के रिश्ते बिगड़ने के पीछे सिर्फ राजनीति नहीं, बल्कि कई अंदरूनी कारण भी थे.
- इमरजेंसी का वो वाकया: 1975 में जब इंदिरा गांधी ने आपातकाल लगाया, तब राजमाता को तिहाड़ जेल भेज दिया गया. इस दौरान माधवराव सिंधिया गिरफ्तारी से बचने के लिए नेपाल चले गए. राजमाता को जब पता चला तो इस बात का गहरा सदमा लगा कि मुश्किल वक्त में उनका बेटा उन्हें छोड़कर चला गया.
- सदर आंग्रे का दखल: राजमाता के सबसे करीबी रणनीतिकार सरदार संभाजीराव आंग्रे मां और बेटे के बीच विवाद का बड़ा कारण बने. माधवराव का मानना था कि आंग्रे उनकी मां पर गलत प्रभाव डालते हैं और महल के फैसलों में उनका गैर-जरूरी हस्तक्षेप है. माधवराव ने एक बार मां से कहा भी था कि आपको आंग्रे और मेरे बीच किसी एक को चुनना होगा. इस पर राजमाता खामोश हो गईं और फिर आंग्रे का साथ ही चुना.
- फैमिली और प्रॉपर्टी विवाद: राजमाता अपनी बहू यानी माधवराव की पत्नी माधवीराजे सिंधिया पर भी आपसी दूरियां बढ़ाने का आरोप लगाती थीं. वहीं ट्रस्ट की जायदाद, महलों के कमरों पर ताले और संपत्ति के अधिकार को लेकर मामले कोर्ट-कचहरी तक पहुंचने लगे.
वसीयत ने सबको चौंका डाला
मां-बेटे के बीच की कड़वाहट इस हद तक बढ़ गई थी कि 1985 में राजमाता विजयाराजे सिंधिया ने अपने हाथ से 12 पन्नों की एक वसीयत लिख डाली. 25 जनवरी 2001 को जब राजमाता का निधन हुआ, तो उनकी वसीयत सामने आई. इसमें उन्होंने अपनी संपत्ति का एक बड़ा हिस्सा ट्रस्टों और बेटियों को दिया और बेटे माधवराव सिंधिया को बेदखल कर दिया.
इसमें सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि राजमाता ने वसीयत में साफ लिखा कि मेरे बेटे माधवराव को मेरा अंतिम संस्कार करने का भी अधिकार नहीं होगा. हालांकि, परंपरा और पारिवारिक स्थिति को देखते हुए आखिरकार माधवराव सिंधिया ने ही अपनी मां को मुखाग्नि दी थी.
दर्दनाक प्लेन क्रैश और महाराज का अंत
मां के निधन के महज 8 महीने बाद 30 सितंबर 2001 को एक ऐसी दुखद घटना घटी जिसने पूरे देश को स्तब्ध कर दिया. माधवराव सिंधिया एक प्राइवेट प्लेन Cessna C-90 एयरक्राफ्ट से दिल्ली के सफदरजंग एयरपोर्ट से यूपी के कानपुर में एक रैली को संबोधित करने जा रहे थे. उनके साथ प्राइवेट सेक्रेटरी रूपिंदर सिंह, दो पायलट और साथ ही चार पत्रकार रंजन झा, गोपाल बिष्ट, अंजू शर्मा, संजीव सिन्हा भी सवार थे.
दोपहर करीब एक बजे उत्तर प्रदेश के मैनपुरी जिले के भैंसरोली गांव के पास खराब मौसम, तेज बारिश और आकाशीय बिजली के कारण विमान दुर्घटनाग्रस्त होकर गिर पड़ा. विमान में भीषण आग लग गई और उसमें सवार सभी 8 लोगों की मौके पर ही दर्दनाक मौत हो गई.
शव की शिनाख्त कैसे हुई?
हादसा इतना भयानक था कि प्लेन का आधा हिस्सा जमीन में धंस गया था और बाकी हिस्से में भीषण आग लग गई थी. बारिश के बावजूद मलबा धधक रहा था. जब स्थानीय प्रशासन और पुलिस मौके पर पहुंची और मलबे से शवों को निकाला गया, तो सभी के शव बुरी तरह झुलस चुके थे. किसी का भी चेहरा पहचानने लायक नहीं बचा था. माधवराव सिंधिया के पार्थिव शरीर की पहचान दो खास चीजों से हुई.
1. मां दुर्गा की सोने की लॉकेट: माधवराव सिंधिया हमेशा अपने गले में मां दुर्गा का एक सोने का लॉकेट पहनते थे, जो आग में पूरी तरह नष्ट नहीं हुआ था.
2. पैरों के जूते: उनके पैरों में मौजूद खास लिबर्टी ग्लाइडर ब्रांड के जूतों के जरिए उनके जानने वालों ने कन्फर्म किया कि यह बॉडी महाराज माधवराव सिंधिया का ही है.
सिंधिया फैमिली पॉलिटिक्स का अगला चैप्टर
माधवराव सिंधिया के अचानक निधन के बाद ग्वालियर राजघराने की राजनीतिक विरासत उनके बेटे ज्योतिरादित्य सिंधिया के कंधों पर आ गई. ज्योतिरादित्य ने अपने पिता के नक्शेकदम पर चलते हुए कांग्रेस से अपने राजनीतिक सफर की शुरुआत की और गुणा-ग्वालियर क्षेत्र में अपनी पकड़ मजबूत की. वह राहुल गांधी के खास सहयोगियों में रहे.

