आज कमाना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी है कमाई को सही जगह लगाना। लेकिन समस्या यह है कि निवेश के विकल्प बहुत हैं। निवेश शुरू करने से पहले 3 चीजें जरूरी हैं-आपातकालीन फंड, पर्याप्त बीमा और कर्ज का नियंत्रण। कम से कम कुछ महीनों के आवश्यक घरेलू खर्च के बराबर राशि ऐसी जगह होनी चाहिए, जहां से जरूरत पडऩे पर पैसा आसानी से उपलब्ध हो सके। इसके बाद स्वास्थ्य और जीवन बीमा जैसी सुरक्षा व्यवस्था पर ध्यान देना चाहिए। अगर व्यक्ति के ऊपर बहुत महंगा कर्ज है, तो कई बार निवेश से पहले उस कर्ज को कम करना ज्यादा समझदारी होती है। निवेश की शुरुआत बची हुई रकम से नहीं, बल्कि नियमित बचत की आदत से होनी चाहिए।
शेयर बाजार ने लंबे समय में संपत्ति बनाने का अवसर दिया है लेकिन इसमें उतार-चढ़ाव भी होता है। किसी कंपनी का शेयर खरीदने का मतलब उस कंपनी में हिस्सेदारी लेना है। इसलिए केवल किसी दोस्त की सलाह, सोशल मीडिया पोस्ट या टी.वी. की खबर देखकर शेयर खरीदना उचित नहीं। नए निवेशकों के लिए सीधे शेयर चुनने की बजाय म्यूचुअल फंड के माध्यम से विविधीकरण करना एक विकल्प हो सकता है। नियमित निवेश के लिए एस.आई.पी. का इस्तेमाल भी किया जाता है। लेकिन यहां भी यह समझना जरूरी है कि म्यूचुअल फंड में बाजार जोखिम समाप्त नहीं होता। शेयर बाजार में सबसे बड़ी गलती अक्सर गलत शेयर चुनना नहीं, बल्कि बिना योजना के खरीदना और डरकर गलत समय पर बेच देना होती है।
भारत में प्रॉपर्टी को निवेश का सबसे भरोसेमंद माध्यम मानने की परंपरा रही है। जमीन या मकान का अपना उपयोग भी है और किराए से आय की संभावना भी। लेकिन प्रॉपर्टी में एक बड़ी समस्या है-इसमें बड़ी पूंजी फंसती है। इसे तुरंत बेचकर पैसा निकालना हमेशा आसान नहीं होता। इसके अलावा स्टांप ड्यूटी, रजिस्ट्रेशन, मैंटेनैंस, टैक्स, ब्याज और अन्य खर्च भी वास्तविक लागत का हिस्सा हैं। इसलिए केवल यह देखकर प्रॉपर्टी न खरीदें कि ‘इलाका आगे बहुत बढऩे वाला है।’ खरीदने से पहले कानूनी दस्तावेज, टाइटल, अप्रूवल, लोकेशन, किराए की संभावित आय और कुल लागत की जांच जरूरी है।
भारतीय परिवारों में सोने का महत्व सिर्फ निवेश तक सीमित नहीं है। यह सामाजिक और भावनात्मक संपत्ति भी है। निवेश के नजरिए से सोने का एक फायदा यह है कि यह पोर्टफोलियो में विविधीकरण ला सकता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि पूरी बचत सोने में लगा दी जाए। गहने खरीदते समय मेकिंग चार्ज, शुद्धता और पुनर्विक्रय मूल्य जैसी बातों को ध्यान में रखना चाहिए। गोल्ड ई.टी.एफ. या अन्य विनियमित विकल्प भी देखे जा सकते हैं। सोना आम तौर पर नियमित आय देने वाला साधन नहीं है, इसलिए इसे पोर्टफोलियो का एक हिस्सा समझना अधिक उचित है, पूरी रणनीति नहीं। पिछले कुछ वर्षों में चांदी भी निवेशकों की चर्चा में आई है। चांदी में औद्योगिक उपयोग भी काफी है, इसलिए इसकी कीमत पर केवल निवेश मांग ही नहीं, बल्कि औद्योगिक मांग और वैश्विक परिस्थितियों का भी प्रभाव पड़ता है।
वहीं क्रिप्टोकरेंसी की कीमतों में बहुत तेज उतार-चढ़ाव हो सकता है। एक छोटी अवधि में बड़ी तेजी और बड़ी गिरावट दोनों संभव हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात-जिस पैसे की जरूरत घर चलाने, बच्चों की पढ़ाई, घर खरीदने या किसी जरूरी लक्ष्य के लिए पड़ सकती है, उसे अत्यधिक जोखिम वाले निवेश में नहीं लगाना चाहिए। क्रिप्टो को निवेश पोर्टफोलियो का मुख्य आधार बनाने की बजाय, यदि कोई व्यक्ति जोखिम समझते हुए इसमें पैसा लगाता है तो उसे इसे उच्च जोखिम वाली परिसंपत्ति के रूप में देखना चाहिए। बैंक एफ.डी., पी.पी.एफ. और कुछ प्रकार के बॉन्ड ऐसे साधन हैं, जिन्हें निवेशक अपने लक्ष्य और जोखिम क्षमता के अनुसार देख सकता है। इनमें रिटर्न शेयर बाजार जैसा नहीं हो सकता लेकिन पोर्टफोलियो में स्थिरता का उद्देश्य अलग होता है।
असली खेल है एसेट एलोकेशन। मान लीजिए किसी व्यक्ति के पास 50 लाख रुपए हैं। उसका पूरा पैसा केवल शेयरों में, केवल प्रॉपर्टी में या केवल सोने में लगा देना जोखिम बढ़ा सकता है। इसीलिए एसेट एलोकेशन महत्वपूर्ण है-यानी अलग-अलग परिसंपत्तियों में पैसा किस अनुपात में रखा जाए। किसी व्यक्ति की उम्र, आय, नौकरी या व्यवसाय की स्थिरता, पारिवारिक जिम्मेदारियां, कर्ज, बच्चों की शिक्षा, रिटायरमैंट और जोखिम सहने की क्षमता को देखकर यह अनुपात अलग हो सकता है। अच्छा निवेश वह नहीं है, जिसमें हर साल सबसे ज्यादा रिटर्न मिले, जो आपके लक्ष्य तक पहुंचने की संभावना बढ़ाए, आपकी नींद न उड़ाए और आपके परिवार की आॢथक सुरक्षा को खतरे में न डाले।-राजेश अग्रवाल (सी.ए.)


