नई दिल्ली। क्या आपने कभी गौर किया है कि, जब हम किसी बड़े मंदिर में प्रवेश करते हैं, तो प्रवेश द्वार पर ही शास्त्र (गदा और त्रिशूल) धारण किए दो विशाल मूर्तियां खड़ी होती हैं। आमतौर पर अधिकतर लोग इन्हें मंदिर की शानदार सजावट का ही हिस्सा मानते हैं, लेकिन असल सच्चाई इससे बिल्कुल अलग है। हिंदू धर्म में इन्हें मंदिर का खास रक्षक माना जाता है। इन्हें ‘द्वारपाल’ भी कहा जाता है।
अधिकतर मंदिरों में द्वारपाल सिर्फ मंदिर की चौखट ही नहीं संभालते, बल्कि नकारात्मक और बुरी एनर्जी को भी मंदिर में प्रवेश करने से रोकते हैं। पौराणिक कथाओं से लेकर वास्तु शास्त्र तक इन द्वारपालों का खास महत्व है।
द्वारपालक क्या हैं?
द्वार पालक का असल अर्थ है, ‘द्वार के रक्षक’ यानी मंदिर के प्रवेश द्वार पर स्थापित युग्म प्रतिमाएं जो मुख्य द्वार के दोनों ओर खड़ी होती है।
आमतौर पर द्वारपालक की मूर्तियां ऊंचे, बलिष्ठ शरीर, गदा या त्रिशूल जैसे शस्त्र धारण किए दिखाया जाता है। भारत के प्रत्येक मंदिर में सनातन परंपरा का अनुसरण करते हुए द्वारपालक की मूर्तियां स्थापित की जाती है।
भागवत पुराण के सातवें स्कंद में वर्णित द्वारपालों का संबंध भगवान विष्णु से जुड़ा माना जाता है। पौराणिक कथा के मुताबिक, एक बार 4 युवा ऋषि कुमार (सनक, सनंदन, सनातना और सनत्कुमार) वैकुंठ के द्वार पर भगवान श्रीविष्णु से मिलने के लिए पहुंचे थे।
लेकिन वैकुंठ के द्वार की रक्षा करने वाले जया और विजया ने उन बाल संतों को अंदर जाने से रोक दिया। इसे बात से गुस्से में आकर कुमारों ने द्वारपालों को श्राप दिया कि वे वैकुंठ से गिरकर भौतिक संसार में भगवान विष्णु के दुश्मन के रूप में जन्म लेंगे।
इसके बाद भगवा विष्णु उनके सामने प्रकट हुए और दोनों को दो विकल्प दिए कि, सात जन्म उनके भक्त के रूप में या तीन जन्म उनके शत्रुओं के रूप में, जया-विजया ने वैकुंठ जल्दी लौटने के लिए तीन जन्म शत्रु बनने का मार्ग चुना। इसके बाद उन्होंने हिरण्यकश्प और हिरण्याक्ष, रावण और कुंभकर्ण और शिशुपाल और दंतवक्र के रूप में जन्म लिया।
देवी-देवताओं के अलग-अलग द्वारपाल
भारत के मंदिरों में द्वारपालकों की पहचान अंदर विराजमान देवता को दर्शाती है। अधिकतर वैष्णव मंदिरों में द्वारपाल को जय और विजय का प्रतीक माना जाता है। वहीं शिव मंदिर में रक्षा करने वाली प्रतिमाएं अक्सर उनके उग्र सेवक या गणों के रूप में देखने को मिलती है।
इसके अलावा देवी मंदिरों में द्वारपाल की प्रतिमा में उग्र रक्षक या शास्त्रधारी देवियां देखने को मिल सकती है।
अग्नि पुराण में साफ-साफ कहा गया है कि, द्वारपालों में नंदिन और महाकाल का स्थान सबसे सर्वोपरि माना गया है। ये दोनों ही शिव के गण है। इसके अलावा वास्तु पुरुष और लक्ष्मी का स्थान भी प्रवेश द्वार के आसपास निर्धारित करना बेहद जरूरी माना गया है।
अग्नि पुराण के अनुसार, मंदिर में स्थापित द्वारपाल की प्रतिमाएं उन अदृश्य शक्तियों का प्रतिनिधित्व करती हैं, जो बुरी एनर्जी और नेगेटिविटी को मंदिर में प्रवेश करने से रोकती है।
इसके बाद भगवा विष्णु उनके सामने प्रकट हुए और दोनों को दो विकल्प दिए कि, सात जन्म उनके भक्त के रूप में या तीन जन्म उनके शत्रुओं के रूप में, जया-विजया ने वैकुंठ जल्दी लौटने के लिए तीन जन्म शत्रु बनने का मार्ग चुना। इसके बाद उन्होंने हिरण्यकश्प और हिरण्याक्ष, रावण और कुंभकर्ण और शिशुपाल और दंतवक्र के रूप में जन्म लिया।
देवी-देवताओं के अलग-अलग द्वारपाल
भारत के मंदिरों में द्वारपालकों की पहचान अंदर विराजमान देवता को दर्शाती है। अधिकतर वैष्णव मंदिरों में द्वारपाल को जय और विजय का प्रतीक माना जाता है। वहीं शिव मंदिर में रक्षा करने वाली प्रतिमाएं अक्सर उनके उग्र सेवक या गणों के रूप में देखने को मिलती है।
इसके अलावा देवी मंदिरों में द्वारपाल की प्रतिमा में उग्र रक्षक या शास्त्रधारी देवियां देखने को मिल सकती है।
अग्नि पुराण में साफ-साफ कहा गया है कि, द्वारपालों में नंदिन और महाकाल का स्थान सबसे सर्वोपरि माना गया है। ये दोनों ही शिव के गण है। इसके अलावा वास्तु पुरुष और लक्ष्मी का स्थान भी प्रवेश द्वार के आसपास निर्धारित करना बेहद जरूरी माना गया है।
अग्नि पुराण के अनुसार, मंदिर में स्थापित द्वारपाल की प्रतिमाएं उन अदृश्य शक्तियों का प्रतिनिधित्व करती हैं, जो बुरी एनर्जी और नेगेटिविटी को मंदिर में प्रवेश करने से रोकती है।

