सिलैक्टिव सेरोटोनिन रिअपटेक इनहिबिटर्स (SSRIs) भारत सहित दुनिया भर में सबसे व्यापक रूप से दी जाने वाली एंटीडिप्रैसैंट दवाओं में से एक बन रही हैं। हालाकि इस रुझान को मानसिक स्वास्थ्य के प्रति बदलते दृष्टिकोण, बेहतर निदान और देखभाल तक अधिक पहुंच के प्रतीक के रूप में देखा जाता है लेकिन मनोचिकित्सक चेतावनी देते हैं कि ये दवाएं रोजमर्रा के भावनात्मक तनाव या अस्थायी तनाव कारकों के लिए नहीं हैं। दिल्ली में मनोचिकित्सा की वरिष्ठ सलाहकार डा. मोनिका छिब्बर कहती हैं, ‘पिछले कुछ वर्षों में SSRI के नुस्खों में क्रमिक वृद्धि हुई है।’ वह इसका श्रेय मानसिक स्वास्थ्य के प्रति अधिक जागरूकता, मनोरोग देखभाल तक बेहतर पहुंच और प्राथमिक देखभाल स्थितियों में भी चिंता और अवसाद की बेहतर पहचान को देती हैं। भारत में एंटीडिप्रैसैंट दवाएं सुलभ और सस्ती भी हैं।
गुरुग्राम में मानसिक स्वास्थ्य के निदेशक डा. सौरभ मल्होत्रा कहते हैं कि महामारी ने तनाव, चिंता और अवसाद को काफी बढ़ा दिया है, जबकि टैलीकंसल्टेशन और प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल ने मनोरोग मूल्यांकन को अधिक सुलभ बना दिया है। इसके साथ ही, SSRI कई सामान्य मानसिक स्वास्थ्य स्थितियों के लिए पहली पसंद के इलाज के रूप में सुझाई जाती रही हैं। डा. मल्होत्रा बताते हैं कि इन्हें आमतौर पर मध्यम से गंभीर अवसाद, एंग्जायटी डिसऑर्डर, ओब्सेसिव-कंपल्सिव डिसऑर्डर, पैनिक डिसऑर्डर और कुछ मामलों में पोस्ट-ट्रॉमैटिक स्ट्रैस डिसऑर्डर के लिए लिखा जाता है। हालांकि, विशेषज्ञ सर्वसम्मति से इस बात पर जोर देते हैं कि दवा की सिफारिश केवल एक त्वरित परामर्श या स्व-निदान की बजाय गहन नैदानिक मूल्यांकन के बाद ही की जानी चाहिए।
बढ़ती चिंताएं : नुस्खों की बढ़ती संख्या ने अनिवार्य रूप से यह ङ्क्षचता पैदा कर दी है कि क्या एंटीडिप्रैसैंट बहुत आसानी से दिए जा रहे हैं? डा. छिब्बर का मानना है कि नुस्खों में वृद्धि से आवश्यक रूप से अत्यधिक दवा दिया जाना नहीं झलकता। बेहतर पहचान ने अधिक मरीजों को इलाज प्राप्त करने में सक्षम बनाया है। हालांकि, डा. मल्होत्रा बताते हैं कि ऐसी स्थितियां भी हैं, जहां अपेक्षाकृत हल्के लक्षणों के लिए दवा शुरू की जा सकती है जो केवल मनोचिकित्सा या परामर्श से ठीक हो सकते हैं। अहमदाबाद के डा. हेमांग देसाई कहते हैं, ‘आजकल, लगभग हर डॉक्टर स्स्क्रढ्ढ लिख रहा है।’ जिससे पता चलता है कि मामूली चिंता वाले मरीजों को कभी-कभी ऐसी दवा मिल सकती है, जो हमेशा आवश्यक नहीं हो सकती। न्यूरोसाइकोफार्माकोलॉजी में प्रकाशित एक 2023 के अमरीकी अध्ययन में शोधकत्र्ताओं ने पाया कि SSRI ने 18 वर्ष से कम उम्र के लोगों के लिए आत्महत्या के प्रयासों का जोखिम 3 गुना और 18-24 वर्ष की आयु के लोगों के लिए 2 गुना तक बढ़ा दिया।
सुरक्षित, लेकिन ध्यान रखें : डॉक्टरों का कहना है कि उचित उपयोग किए जाने पर SSRI उपलब्ध सबसे सुरक्षित मनोरोग दवाओं में से हैं। अधिकांश रोगियों को महत्वपूर्ण सुधार का अनुभव होता है, हालांकि दवाओं के पूर्ण लाभ दिखने से पहले आमतौर पर 2 से 6 सप्ताह की आवश्यकता होती है। दुष्प्रभावों में जी मिचलाना, सिरदर्द, पेट में जलन, नींद की गड़बड़ी, भूख में बदलाव और यौन रोग शामिल हैं, विशेष रूप से इलाज के शुरुआती हफ्तों के दौरान। अधिकांश हल्के होते हैं और शरीर के अभ्यस्त होने पर सुधर जाते हैं। डा. छिब्बर चेतावनी देती हैं, ‘सुरक्षित और उचित उपचार सुनिश्चित करने के लिए ली जा रही किसी भी अन्य दवा, गर्भावस्था की स्थिति, शराब के उपयोग, पिछले मनोरोग इतिहास या मौजूदा चिकित्सा स्थितियों के बारे में डॉक्टर को सूचित करना महत्वपूर्ण है। स्स्क्रढ्ढ को अचानक बंद नहीं किया जाना चाहिए।’
अंतत:, मनोचिकित्सकों का कहना है कि स्स्क्रढ्ढ के नुस्खों में वृद्धि प्रगति और जिम्मेदारी दोनों को दर्शाती है। अधिक जागरूकता ने लाखों लोगों को उन स्थितियों के लिए उपचार लेने में मदद की है, जिन्हें कभी पहचाना नहीं गया था लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि एंटीडिप्रैसैंट न तो त्वरित समाधान हैं और न ही जीवनशैली की दवाएं।-श्रेया देब

