पौराणिक हिन्दू कथाओं के अनुसार प्रत्येक माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को कालाष्टमी पर्व के रूप में मनाया जाता है। कालाष्टमी के दिन भगवान शिव के रौद्र स्वरुप कालभैरव की उपासना की जाती है। महादेव को संहार का देवता माना गया है अर्थात संसार में जो कुछ भी है उसकी आदि से लेकर अनंत काल तक के लिए भोलेनाथ ही जिम्मेदार है। इस पर्व को भैरवाष्टमी के नाम से भी जाना जाता है। यह पर्व शिव के रूद्र अवतार कालभैरव की जन्म के उत्सव के रूप में मनाया जाता है। भैरव बाबा को तांत्रिकों का देवता भी कहा जाता है।
इनकी आराधना से भक्तों के आसाध्य कार्यों की पूर्ति है। बहुत समय से जिन मनोकानाओं की पूर्ति नहीं हो पा रही थी ,इनकी पूजा से वह समस्त इच्छाओं की भी पूर्ति होती है। कालभैरव का रूप भयावय है परन्तु अपने भक्तों के लिए वह दयालु एवं कल्याणकारी है। कालाष्टमी के दिन उनकी पूजा व उन्हें प्रसाद अवश्य अर्पण करना चाहिए तथा यदि यह पूजा दिल्ली के कालभैरव मंदिर में हो तो उसका विशेष महत्व रहता है। यह मंदिर कालभैरव के प्रसिद्ध मंदिरों में से एक है जिसकी महिमा की गाथाएं भारतवर्ष में प्रचलित है।
हमारी सेवाएं :-
अनुष्ठान से पहले हमारे युगान्तरित पंडित जी द्वारा फ़ोन पर आपको संकल्प करवाया जाएगा। श्री भैरवनाथ भगवान की पूरे विधिविधान से पूजा की जाती है । जिसमें उन्हें शराब का प्रसाद चढ़ाया जाता है ।अनुष्ठान संपन्न होने के बाद प्रसाद भी भिजवाया जाएगा ।
प्रसाद :
- सूखा मेवा
- एनर्जाइज्ड काला धागा (गले में 21 दिन पहनें उसके बाद इसे बहते पानी में बहा दें )

