सफलता की कुंजी कहती है कि जीवन में सफलता उसी को मिलती है जो शिक्षा को ग्रहण करने के लिए सदैव तैयार रहता है. शिक्षा प्राप्त करने की कोई उम्र नहीं होती है. शिक्षा प्राप्त करने के लिए मन में आत्मविश्वास होना चाहिए. जब व्यक्ति पूरी तरह से ठान लेता है तो उसे कुछ सीखने से कोई नहीं रोक सकता है.

संस्कार और संगत का महत्व
शिक्षा का महत्व भी तभी है जब संस्कार और संगत अच्छे हों. संस्कार से ही शिक्षा का उपयोग कैसे करना है, इसकी प्रेरणा मिलती है. संगत से सफलता की राह आसान हो जाती है. चाणक्य की चाणक्य नीति कहती कि शिक्षित होना ही सफलता नहीं है. सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि शिक्षा से दूसरों का कितना कल्याण हुआ. लोगों के कल्याण की भावना को ध्यान में रखकर किया गया कार्य सार्थक होता है. इससे राष्ट्र को मजबूती मिलती है.

अच्छे कार्यों का परिणाम अच्छा ही होता है
गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं व्यक्ति को परिश्रम करने के लिए सदैव तैयार रहना चाहिए. फल की चिंता नहीं करनी चाहिए. कार्य यदि श्रेष्ठ है तो उसका परिणाम भी श्रेष्ठ होगा. मानव कल्याण को लेकर सदैव गंभीर रहना चाहिए, जो भी कार्य करें उससे दूसरों का कितना हित होगा, इसपर सदैव चिंतन करना चाहिए.

गलत संगत से दूर रहें
विद्वानों कहना है कि व्यक्ति को अपनी संगत को लेकर सदैव सावधान रहना चाहिए. बुरी संगत के कारण प्रतिभाशाली व्यक्ति भी अपनी प्रतिभा का पूर्ण लाभ दूसरों को नहीं दे पाता है. इसलिए बुरी संगत का सदैव त्याग करना चाहिए. बुरी संगत प्रतिभा को नष्ट करती है. व्यक्ति को लक्ष्य से भटकाती है. बुरी संगत को ज्ञान से ही दूर किया जा सकता है. माना जाता है कि बुरी चीजे व्यक्ति को बहुत जल्दी आकर्षित करती हैं. इससे तभी बच सकते हैं जब आपको सही और बुरे का ज्ञान होगा. जो व्यक्ति विद्वान और संतों की संगत करते हैं, वे सदैव बुरे कार्यों से दूर रहते हैं.

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