किसानों को समसामयिक सलाह

रायपुर.

छत्तीसगढ़ राज्य में वर्षा की स्थिति सामान्य से थोड़ी अधिक है। 13 जुलाई तक राज्य में 344 मिमी औसत वर्षा के विरूद्ध अब तक 357 मिमी वर्षा हो चुकी है, जो सामान्य से अधिक है, परंतु वर्षा का वितरण विभिन्न जिलों में असामान्य है।

बस्तर के पठार क्षेत्र के 6 जिलों में से 2 जिलों (कोंडागांव एवं नारायणपुर) में सामान्य से अधिक वर्षा, 3 जिलों (बस्तर, सुकमा एवं दंतेवाड़ा) में सामान्य वर्षा तथा बीजापुर जिले  में सामान्य से अत्यधिक वर्षा हुई है, जबकि छत्तीसगढ़ के मैदानी भाग के 16 जिलों में से 7 जिलों (बालोद, धमतरी, कांकेर, राजनांदगांव, मुंगेली कबीरधाम एवं गरियाबंद) में सामान्य से अधिक वर्षा, 5 जिलों (जांजगीर, बिलासपुर, बलौदाबाजार, दुर्ग एवं महासमुंद) में सामान्य वर्षा व 4 जिलों (बेमेतरा, रायगढ़, कोरबा एवं रायपुर) में सामान्य से कम वर्षा हुई है। कम वर्षा वाले जिलों में कमी का प्रतिशत 23 से 38 है। इसी तरह उत्तर के पहाड़ी क्षेत्र के सभी 5 जिलों (सूरजपुर, कोरिया, बलरामपुर, सरगुजा एवं जशपुर) में सामान्य से कम वर्षा दर्ज की गई है। इनमें से 3 जिलों (बलरामपुर, सरगुजा एवं जशपुर) की वर्षा में सबसे अधिक कमी देखी गई है। जिसका सामान्य वर्षा की तुलना में 64 से 71 प्रतिशत की कमी है।

छत्तीसगढ़ के 10 जिलों जिनमें सामान्य से ज्यादा वर्षा हुई है तथा कृषकों के द्वारा बुवाई नहीं की गई है। उन क्षेत्रों के कृषक भाई लेही पद्धति से धान की बुवाई करें एवं बीज दर 30 से 35 किलोग्राम प्रति एकड़ की दर से बुवाई करें। जिन कृषकों ने रोपाई हेतु थरहा तैयार किया है। वे अपने खेतों (नर्सरी) से जल निकासी की उचित व्यवस्था करें एवं आने वाले दिनों में रोपाई हेतु खेत की मचाई करें। इस हेतु थरहा की अवधि 20 से 25 दिन उपयुक्त होगी।

इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के संचालक अनुसंधान डॉ. विवेक त्रिपाठी ने किसान भाईयों को सलाह दी है कि छत्तीसगढ़ के 9 जिलों जहां पर वर्षा सामान्य से कम हुई है एवं कृषकों ने धान की बुवाई नहीं की है, वे मध्यम एवं निचली भूमि में अविलम्ब शीघ्र से मध्यम अवधि की धान की उपयुक्त किस्में (एमटीयू 1010, दंतेश्वरी, इंदिरा बारानी धान 1, 2 आई आर 64, दुर्गेश्वरी इत्यादि) का चयन कर कतारों में बोवाई करें। कतार बोनी हेतु 30 से 35 किलोग्राम प्रति एकड़ बीज उपयोग करें। उच्च भूमियों में कृषक भाई धान की बोवाई के बदले दलहन (मंूग, उड़द) तिलहन (तिल) या लघुधान्य फसलें (कोदों, कुटकी, रागी इत्यादि) फसलों की बुवाई बीजोपचार के पश्चात् कतारो में करें।

जिन क्षेत्रों में समय पर रासायनिक खादो की उपलब्धता नहीं है या कम है उस जगह रासायनिक खादों की दक्षता को बढ़ाने हेतु केचुआ खाद एवं कम्पोस्ट को लाभदायक जीवाणु जैसे पीएसबी, एजोेस्पाईलम या एजोटोबेक्टर से संवर्धित कर बुवाई या रोपाई के समय 100 किलोग्राम प्रति एकड़ की दर से डाले। इसके प्रयोग से रासायनिक खादों की 25 प्रतिशत मात्रा कम की जा सकती है। इस हेतु निकटतम कृषि विज्ञान केन्द्र एवं ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारी से संपर्क कर सकते है।

सोयाबीन एवं अरहर बुवाई वाले क्षेत्रों में पिछले कुछ दिनों से लगातार वर्षा हो रही है। वहां जल निकासी की व्यवस्था कर लेवें। अत्यधिक वर्षा से अरहर एवं सोयाबीन में अंकुरण न होने की स्थिति में अन्य दलहन फसलें (मंूग, उड़द), तिल एवं लघु धान्य फसलों की बुवाई करें। सोयाबीन की फसल जहां पर 15 से 20 दिन की हो गई है। वहां पर वर्तमान में खरपतवार नियंत्रण की आवश्यकता है। खरपतवार नियंत्रण के लिए वरीयता के अनुसार हाथ से निंदाई या खड़ी फसल में रासायनिक खरपतवारनाशी जैसे इमेझेथापायर के व्यवसायिक उत्पाद जैसे परसुट, वीटग्रो आदि के 300 मिलीलीटर प्रति एकड़ की दर से 200 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें।

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