27 अगस्त के बाद भाद्र पक्ष की अमावस्या को यह त्यौहार मनाया जाता है। इस त्योहार में बैलों की पूजा की जाती है। सालों से यह परंपरा चली आ रही है। किसानों के लिए बैल खेती का प्रमुख साधन है। पैदावार में उसकी अहम भूमिका होती है। इसके चलते किसान प्रतिवर्ष पोला त्योहार मनाते हैं। बैलों को सजाया जाता है। विधि विधान से उसकी पूजा की जाती है। किसान परिवारों के अलावा लगभग सभी घरों में पोला के दिन बैलों की पूजा की जाती है।
सुबह नहा-धोकर पोरा-जाता बैला, मिट्टी की बैल-जोड़ी को सजाकर उनकी पूजा की जाती है घर की महिलाएं ठेठरी-खुर्मी बनाती हैं दोपहर के बाद बच्चे बैलों को लेकर गली में निकलते हैं। बच्चे इन बैलों के पैरों में चक्के लगाकर उन्हें रास्ते पर घुमाते हैं आपस में लड़ाते हैं बैलों के पैरों में चक्के लगाने के लिए बांस की कमचियों से उन्हें विशेष प्रकार से इस प्रकार बाँधा जाता है, कि चक्के आसानी से घूम सकें। गाँव में युवक-युवतियां व बच्चे अपने-अपने साथियों के साथ गांव के बाहर मैदान में पोरा पटकने जाते हैं। इस परंपरा में युवक युवतियां अपने-अपने घरों से एक-एक मिट्टी के खिलौना ले जाकर निर्धारित स्थान में फोड़ते हैं। पोला पर्व अत्यंत उत्साह व उमंग के साथ मनाया गया। जहां बड़ो ने पोरा जाता, नंदिया बैल का पूजा अर्चना किया उसके बाद छोटे छोटे बच्चो ने नंदिया बैल खुब दौड़ाये। इसी तरह राजीव नगर हटकेशर वार्ड में छोटे बच्चे लेखराज महिलांग, कु. वीरा राव अपने नंदिया बैल खुब मजे से दौड़ाये।

