रिश्ते हैं तो उनसे उम्मीदें भी होंगी। उनसे कुछ उम्मीदें होना लाजिमी भी है। मां-बाप बच्चों से और बच्चे मां-बाप से उम्मीदें रखते हैं। पति, पत्नी, भाई, बहन, चाचा, मामा और अन्य रिश्तों में भी कुछ न कुछ उम्मीदें जरूर पलती रहती हैं। लेकिन जब ये उम्मीदें पूरी होती नहीं दिखती तो मन में घोर निराशा के साथ रिश्तों में दरार पडऩे लगती है। इसलिए उम्मीदें पालने से पहले थोड़ा सचेत रहें।
दूसरों की भी समझें परेशानियां
क्या आपने कभी सोचा है कि जिससे आपने उम्मीद पाल रखी है, वह आपकी उम्मीदों पर खरा क्यों नहीं उतर सका। आज जीवन और रिश्ते, दोनों में ही जटिलता आ गई है। कारोबार और दफ्तर से जुड़ी अनेक परेशानियों के चलते मानसिक तनाव आम हो चुका है। भागमभाग भरी जिंदगी में कई बार लोगों को ठीक से सोने, खाने और अपने बारे में सोचने तक का वक्त नहीं मिलता। ऐसे में जरूरी नहीं कि वह आपकी हर उम्मीद को भी पूरा कर पाए। इसलिए निराश होने से पहले दूसरों की परेशानी को भी समझें।
बात-बात को दिल पर लेना
रिश्तों में थोड़ी बहुत ऊंच-नीच होती रहती है। कभी-कभी वह सब कुछ पूरा नहीं हो पाता, जो हम सोचते हैं। ऐसे में निराश होकर अपनों के लिए मन में बैर पालना ठीक नहीं है। सच तो यह है कि संकट के समय हमारे अपने ही हमारे साथ खड़े होते हैं। मन की मैल अलगाव की भावना को जन्म देती है। इसलिए इस बात को भूल जाएं कि फलां व्यक्ति ने आपके लिए क्या-क्या नहीं किया। इस बात को याद रखें कि उन्होंने आपके लिए क्या-क्या किया।
लेन-देन की भावना या फिर स्नेह
ज्यादातर उम्मीदें हम अपनी खुशी या सुख के लिए पालते हैं और किसी के लिए कुछ करते हैं तो यह सोच कर कि वह भी हमारे लिए भी कुछ करेगा। ऐसी उम्मीदों को एक दिन टूटना ही होता है; क्योंकि हमारे रिश्ते-नाते व संबंध हमारी भावनाओं से बनते-पनपते हैं। जब भावनाओं में लेनदेन की उम्मीदें बंध जाती हैं, तो जहां थोड़ी बहुत कमी-बेशी हुई नहीं कि आशाएं टूट कर बिखर जाती हैं। अब यदि आपने अपनी कठिन को उसके जन्मदिन पर इस उम्मीद में स्मार्ट वाच दी है कि वह भी कोई महंगा तोहफा देगी तो पक्का मानिये आपकी उम्मीद को झटका लगने वाला है। क्योंकि तोहफे में प्यार देखा जाता है, कीमत नहीं।
भला करके भूलने का गुण
जब हम राह चलते किसी व्यक्ति की मदद करते हैं तो उस अजनबी से कोई उम्मीद नहीं पालते। फिर भी हमें मदद करके अच्छा लगता है। रिश्तों में भी हमें कुछ ऐसी सोच लानी चाहिए। पति अपनी पत्नी से ये उम्मीद न करे कि वह उसके सारे काम व्यवस्थित तरीके से व समय पर करके दे, मां अपने बाप बेटे से ये उम्मीद न रखें कि वह दिन भर काम करके आए, तो शाम को उन्हें मंदिर भी ले जाये। इसके बजाय हम दूसरों की उम्मीदें पूरी करने की कोशिश करें, उनसे कम से कम उम्मीद रखते हुए।
खुद से पालें उम्मीद
रिश्तों के बीच थोड़ा स्पेस बनाकर थोड़ा सी जगह खुद से रिश्ता गांठने के लिए बनाएं। खुद से एक उम्मीद पालें। खुद से पाली गई उम्मीदें खुद की बेहतरी की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। असल में जब हम खुद से उम्मीद पालते हैं तो हम अपने होने के अर्थ को समझते हैं। हम वो काम चुनते हैं जिसमें हमें मजा आता है। हम अपने मानसिक सुख के लिए प्रयास करते हैं। खुद के अनुभवों को सम्पन्न और परिष्कृत करते हैं। खुद से सवाल-जवाब कर सकते हैं-क्या मैं अपनी उम्मीदों पर खरी उतरी हूं। जवाब हां में हो या न में; हम खुद को इसके लिये समझा सकते हैं।
आजमा कर देखें। ये छोटी-छोटी सावधानियां आपको उम्मीदों से होने वाले तनाव, अवसाद से बचा सकती हैं। आपका रिश्ता मधुर और मजबूत बना रह सकता है। सरस्वती रमेश

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