समय से पहले भाग्य जानने का दुष्परिणाम भी होता है, मान लीजिए जिन लोगों को अपने भाग्य की बात गारंटी के साथ मालूम हो जाए, तो उन लोगों को कोई प्रयत्न, परिश्रम या उद्यम करने में रुचि नहीं होगी। वे लोग सोचेंगे कि, ‘तकदीर का लिखा होकर रहेगा, फिर किसी प्रकार के परिश्रम के झंझट में फंसने से क्या लाभ?’ निराशावाद एवं कर्म त्याग की भावना, संसार चक्र को चलने से रोक देगी। जो रोग-शोक, लाभ- हानि, यश-अपयश, उन्नति-अवनति, पाप-पुण्य, सुख-दुःख होने वाला होगा, वह हो ही जाएगा। यदि अपने जीवन की अवधि लोगों को मालूम हो जाए, यह पता चल जाए कि उनकी मृत्यु कब, किस दिन, कहां और किस प्रकार होगी तो उस मनुष्य का जीवन बड़ा ही विचित्र हो जाएगा।

अमुक दिन वह मरेगा, इस से पहले नहीं मर सकता, यह निश्चय हो जाने पर मनुष्य बड़ी से बड़ी घटना में शामिल होने के लिए, किसी से भी लड़ने के लिए तैयार हो जाएगा। मृत्यु के भय से लोग अपने जीवन के आगे-पीछे का सोचते हैं और अनावश्यक झंझटों में पड़ने से स्वयं को बचाते हैं। जिसे मालूम हो जाए कि उसकी मृत्यु में केवल इतनी समय अवधि ही शेष है तो वह सांसारिक कार्यों से उदास हो कर बैठ जाएगा। मृत्यु के शोक में व्यक्ति बहुत पहले से डूब जाएगा, किन्हीं बड़े कामों का आयोजन न करेगा, समाज में मित्रता और घनिष्ठता स्थापित नहीं करेगा।

अपने दीर्घ जीवन की आशा से लोग धन-वैभव एकत्रित करते हैं, वह उन के मरने पर उनके आश्रितों के काम आता है, जिसे मालूम हो जाए कि उसे सिर्फ छः महीने जीना है, तब वह धन संपत्ति संचय नहीं करेगा बल्कि जो धन होगा उसे भी दान-पुण्य अथवा ऐशो-आराम में खर्च कर देगा। ऐसी दशा में उस व्यक्ति पर आश्रित उसकी संतान आदि परिजन को उसके जाने के बाद जो पैतृक धन से सहायता मिलनी थी, वह नहीं मिलेगी। मृत्यु के भय को मनोविज्ञान की भाषा में ‘थैनैटोफोबिया’ कहा जाता है।

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