भाद्रपद मास की शुक्ल चतुर्थी को गणेश चतुर्थी का पर्व मनाया जाता है. धार्मिक मान्यता है कि इस दिन चंद्रमा का दर्शन अशुभ माना जाता है. मान्यता है कि गणेश चतुर्थी की रात चंद्र दर्शन करने पर व्यक्ति पर चोरी अथवा झूठे आरोप का कलंक लग सकता है. इसलिए इस दिन को कलंक चतुर्थी भी कहा जाता है. यदि भूलवश कोई व्यक्ति चंद्रमा देख ले तो उसे “सिहः प्रसेनमवधीत…” मंत्र का जाप करना चाहिए और साथ ही स्यमन्तक मणि की कथा का श्रवण या पाठ करना चाहिए.

चतुर्थी के चंद्रमा और श्रीकृष्ण पर लगा कलंक

धार्मिक कथाओं के अनुसार, एक बार नंदकिशोर ने सनतकुमारों को बताया कि चतुर्थी के दिन चंद्र दर्शन करने के कारण स्वयं भगवान श्रीकृष्ण पर भी चोरी का आरोप लगा था. उस कलंक से मुक्ति पाने के लिए उन्होंने सिद्धिविनायक व्रत किया था.

द्वारिका में स्यमन्तक मणि की अद्भुत कथा

कहा जाता है कि श्रीकृष्ण जरासंध के भय से समुद्र के मध्य द्वारिका नगरी में बसने लगे. वहीं यादववंश के सत्राजित ने सूर्यदेव की तपस्या की. प्रसन्न होकर सूर्यनारायण ने उसे स्यमन्तक मणि प्रदान की, जो प्रतिदिन आठ भार सोना उत्पन्न करती थी.

सत्राजित ने यह मणि श्रीकृष्ण को न देकर अपने भाई प्रसेनजित को दे दी. एक दिन शिकार पर निकले प्रसेनजित को सिंह ने मार डाला और मणि लेकर चला गया. बाद में रीछराज जामवन्त ने सिंह को मारकर मणि अपनी गुफा में रख ली.

जब प्रसेनजित लौटा नहीं तो सत्राजित ने बिना जांच किए प्रचार कर दिया कि श्रीकृष्ण ने ही मणि हथियाने के लिए उसके भाई की हत्या की है. इस आरोप से मुक्त होने के लिए श्रीकृष्ण ने साक्ष्य ढूंढना शुरू किया और अंततः जामवन्त की गुफा तक पहुंचे.

वहाँ जामवन्त की पुत्री उस मणि से खेल रही थी. श्रीकृष्ण और जामवन्त के बीच 21 दिन तक भीषण युद्ध हुआ. अंततः जामवन्त ने उन्हें भगवान राम का अवतार पहचानकर अपनी पुत्री का विवाह श्रीकृष्ण से कर दिया और मणि भी सौंप दी.

कलंक और नारदजी का रहस्योद्घाटन

श्रीकृष्ण जब मणि लेकर द्वारिका लौटे तो लोग फिर भी उन पर आरोप लगाने लगे. तभी नारदजी ने आकर बताया कि यह सब भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के चंद्र दर्शन का फल है. नारदजी ने बताया कि एक बार चंद्रमा ने गणेशजी का उपहास किया था, जिस पर गणेशजी ने उसे शाप दिया कि चतुर्थी तिथि को जो भी तुम्हें देखेगा, उसे झूठे आरोपों का सामना करना पड़ेगा.

हालाँकि गणेशजी ने बाद में शाप का निवारण करते हुए कहा कि यदि कोई प्रतिदिन द्वितीया तिथि को चंद्र दर्शन करेगा और गणेश चतुर्थी को सिद्धिविनायक व्रत करेगा, तो वह मिथ्या दोष से बच जाएगा.

महाभारत और गणेश व्रत की महिमा

यही कारण है कि गणेश चतुर्थी पर चंद्र दर्शन वर्जित माना गया. मान्यता है कि युधिष्ठिर ने भी महाभारत युद्ध से पूर्व भगवान श्रीकृष्ण की सलाह पर गणेश चतुर्थी का व्रत कर विजय प्राप्त की थी.

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