मां धारी देवी क्या नाराज हैं? उत्तराखंड के चार धाम की रक्षा करने वाली मां धारी देवी अगर नाराज हो गईं तो क्या होगा? उत्तराखंड के लोग क्यों डर रहे हैं? इस डर और दहशत की वजह है अलकनंदा. वही अलकनंदा नदी, जिन्होंने 2013 में तांडव मचा दिया था. अब एक बार फिर वो उफान पर हैं. 48 घंटों का मौसम विभाग ने भी अल्टीमेटम दे दिया है. हर कोई अनिष्ट की आशंका से डरा हुआ है.

दिन में तीन बार अपना रूप बदलती हैं

उत्तराखंड में बीते दिनों से जारी बारिश से अलकनंदा नदी अपने रौद्र रूप में हैं. नदी के किनारे के घाट डूब चुके हैं. गढ़वाल क्षेत्र में श्रीनगर और रुद्रप्रयाग के बीच अलकनंदा नदी के तट पर एक हिंदू मंदिर है. मंदिर में देवी धारी की मूर्ति का ऊपरी आधा भाग स्थित है, जबकि मूर्ति का निचला आधा हिस्सा कालीमठ में स्थित है, जहां उन्हें देवी काली के रूप में पूजा जाता है. वो दिन में तीन बार अपना रूप बदलती हैं. इन्हें उत्तराखंड की संरक्षक देवी माना जाता है और उन्हें चार धामों के रक्षक के रूप में माना जाता है. उनका मंदिर भारत में 108 शक्ति स्थलों में से एक है, जैसा कि श्रीमद देवी भागवत द्वारा गिना गया है.

मंत्री ने भी चेताया

उत्तराखंड के मंत्री धन सिंह रावत ने एक्स पर पोस्ट कर लिखा, “धारी देवी मंदिर से श्रीनगर तक अलकनंदा नदी का जलस्तर लगातार बढ़ रहा है, जिससे निचले इलाकों में बाढ़ का खतरा उत्पन्न हो गया है. स्थिति की गंभीरता को देखते हुए उप जिला अधिकारी ने संबंधित विभागों के अधिकारियों को तत्काल सतर्क रहने और आवश्यक सावधानी बरतने के निर्देश दिए हैं.”

2013 में क्या हुआ था

16 जून, 2013 को अलकनंदा हाइड्रो पावर द्वारा निर्मित 330 मेगावाट अलकनंदा हाइड्रो इलेक्ट्रिक बांध के निर्माण के लिए देवी के मूल मंदिर को हटा दिया गया और अलकनंदा नदी से लगभग 611 मीटर की ऊंचाई पर कंक्रीट के मंच पर स्थानांतरित कर दिया गया. मूर्ति को स्थानांतरित करने के घंटों बाद, इस क्षेत्र को 2004 की सूनामी के बाद से देश की सबसे खराब प्राकृतिक आपदाओं में से एक का सामना करना पड़ा. 2013 की उत्तर भारत की बाढ़ एक बहु-दिवसीय बादल फटने के कारण हुई थी. इसके चलते विनाशकारी बाढ़ और लैंडस्लाइड ने पूरे तीर्थ शहर को धो डाला और सैकड़ों लोगों की जान ले ली. स्थानीय लोगों और भक्तों का मानना है कि उत्तराखंड को देवी के क्रोध का सामना करना पड़ा, क्योंकि उन्हें उनके मूल स्थान से 330 मेगावाट की पनबिजली परियोजना के लिए स्थानांतरित किया गया था, जो बाढ़ के बाद खंडहर हो गई थी. 1882 में एक स्थानीय राजा ने भी इसी तरह का प्रयास किया था. तब भी एक लैंडस्लाइड हुआ था और केदारनाथ समतल हो गया था.

धारी देवी मंदिर के बारे में पौराणिक कथाओं में बताया गया है कि द्वापर युग की देवी की मूर्ति अलकनंदा नदी में बाढ़ के कारण बह गई थी और धारी गांव के पास एक चट्टान से टकराकर रुक गई थी. इसके बाद स्थानीय लोगों ने वहां मंदिर का निर्माण किया. 

हिंदू मान्यता के अनुसार धारी देवी के माता-पिता की मौत के बाद उनके सात भाइयों ने उनका पालन-पोषण किया था. धारी देवी भी अपने भाइयों से स्नेह करते हुए उनकी खूब सेवा करती थीं. 13 साल की उम्र होते-होते धारी देवी के पांच बड़े भाइयों की मौत हो गई. इसके बाद उनके भाइयों को इस बात की गलतफहमी हो गई कि उनकी बहन के ग्रह-नक्षत्र उनके लिए शुभ नहीं हैं. ऐसा सोचते हुए एक दिन उनके बचे हुए भाइयों ने एक रात उनका सिर धड़ से अलग करके गंगा में बहा दिया. जब उनका सिर अलकनंदा नदी में बहता हुआ धारी गांव पहुंचा तो वहां मौजूद एक आदमी को लगा कि एक बच्ची डूब रही है, लेकिन वह पानी की गहराई के कारण आगे न बढ़ सका. तब कन्या के सिर से आवाज आई कि डरो नहीं! मैं एक देवी हूं.तुम निर्भय होकर मुझे किसी पवित्र स्थान पर स्थापित करो. ऐसा करने पर मैं तुम्हारी रक्षा करूंगी. इसके बाद जब उस आदमी ने देवी के सिर स्थापित किया तो कन्या का सिर पत्थर की मूर्ति में तब्दील हो गई. 

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