भारतीय राज्य पेंशनर्स महासंघ के राष्ट्रीय महामंत्री एवं छत्तीसगढ़ प्रदेश प्रांताध्यक्ष श्री वीरेन्द्र नामदेव ने निर्वाचन ड्यूटी, पोलियो अभियान और अन्य सरकारी दायित्वों के दौरान कर्मचारियों को दी जा रही मानसिक एवं शारीरिक प्रताड़ना पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए निर्वाचन आयोग एवं प्रशासन से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है।श्री नामदेव ने कहा कि देश के कर्मचारी लोकतंत्र को मजबूत बनाने वाले मौन-सैनिक हैं। कठिन पहाड़ों, जंगलों, दूरस्थ गांवों, कड़ाके की ठंड, भीषण गर्मी—हर परिस्थिति में ये कर्मचारी राष्ट्रहित के कार्य पूरी निष्ठा, समर्पण और ईमानदारी से करते हैं। इसके बावजूद इन पर अनियंत्रित कार्यभार और अनावश्यक दबाव डालना अन्यायपूर्ण और अमानवीय है।

अतिरिक्त कार्यभार और धमकी संस्कृति कर्मचारी मानसिक स्वास्थ्य को नष्ट कर रही है : निर्वाचन और सरकारी दायित्वों के दौरान कर्मचारियों को न विश्राम मिलता है, न उचित भोजन, न सुरक्षा व्यवस्था। स्थानीय अधिकारियों द्वारा बार-बार रिपोर्टिंग, देर रात तक नए आदेश, समय-सीमा का अत्यधिक दबाव और छोटी-सी चूक पर निलंबन जैसी धमकियाँ कर्मचारियों को मानसिक रूप से तोड़ रही हैं। यह शैली अमानवीय और अत्याचारपूर्ण है।

”महासंघ ने बताया कि इस प्रकार की कार्यप्रणाली के चलते अनेक कर्मचारी उच्च रक्तचाप, लो बीपी, अवसाद जैसी समस्याओं के शिकार हुए हैं। कुछ मामलों में कर्मचारियों ने आत्महत्या जैसे चरम कदम तक उठाए हैं, जो अत्यंत चिंताजनक स्थिति है।छत्तीसगढ़ राज्य कर्मचारी संघ के पूर्व प्रांताध्यक्ष नामदेव ने कहा कि—एसआईआर कार्य में महिला कर्मचारियों को देर रात निर्देश देना,असुरक्षित क्षेत्रों में भेजना,यात्रा एवं विश्राम की उचित व्यवस्था न होना,यह सब प्रशासन की संवेदनशीलता पर प्रश्नचिह्न लगाता है।महासंघ की की ओर से निर्वाचन आयोग एवं राज्य सरकार से निम्न सुधारों की तत्काल मांग की है—

1. कर्मचारियों पर अत्यधिक और असंगत कार्यभार रोकें—कार्य का न्यायसंगत विभाजन हो।

2. महिला कर्मचारियों के लिए सुरक्षित, सम्मानजनक और विशेष सुविधाओं वाली व्यवस्था बने।

3. ड्यूटी के दौरान भोजन, पानी, विश्राम और सुरक्षा की अनिवार्य व्यवस्था की जाए।

4. देर रात आदेश, धमकी और अनावश्यक रिपोर्टिंग की संस्कृति समाप्त की जाए।

5. तनाव-ग्रस्त कर्मचारियों के लिए हेल्पलाइन और मानसिक स्वास्थ्य सहायता उपलब्ध कराई जाए।

6. निर्वाचन/अभियान कार्यों में मानवता-आधारित प्रशासनिक संस्कृति विकसित की जाए।

कर्मचारी नेता ने कहा है कि “कर्मचारी कोई पशु नहीं, वे भी परिवार, भावनाओं और स्वास्थ्य वाले मनुष्य हैं। अधिकारियों की चारदीवारी में बैठकर किए जा रहे निर्णयों का सबसे अधिक दुष्प्रभाव इन्हीं कर्मचारियों पर पड़ता है। इसलिए आवश्यक है कि उनकी व्यथा को समझकर संवेदनशील और मानवतापूर्ण प्रशासनिक व्यवस्था लागू की जाए।”उन्होंने चेतावनी दी कि यदि सरकार और आयोग इस दिशा में सुधार नहीं करते तो कर्मचारियों में असंतोष बढ़ेगा, जो लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है।

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