Mahashivratri 2026: महाशिवरात्रि हिंदू धर्म का एक विशेष पर्व है. हर साल इसे फाल्गुन मास की चतुर्दशी तिथि को मनाया जाता है. इस दिन देवों के देव महादेव और माता पार्वती की आराधना की जाती है. साल 2026 में महाशिवरात्रि 15 फरवरी को मनाई जाएगी. मान्यता है कि इस दिन जो भी भक्त पूरे विधि-विधान से भगवान शंकर और माता पार्वती की पूजा करता है और व्रत रखता है, उसके जीवन से दुख-दर्द और कष्ट दूर हो जाते हैं. विवाहित और कुंवारी महिलाएं इस व्रत को खासतौर पर भगवान शिव की कृपा प्राप्त करने के लिए करती हैं. आज हम एक पौराणिक कथा के माध्यम से जानेंगे कि महाशिवरात्रि की शुरुआत कैसे हुई.

महाशिवरात्रि की पौराणिक कथा

पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान शिव की पत्नी माता सती ने अग्निकुंड में कूदकर अपने शरीर का त्याग कर दिया था. माता सती के जाने के बाद भगवान शिव गहरे दुख में रहने लगे. वे सदा सती को याद करते रहते थे और तपस्या में लीन हो गए.

माता सती ने देह त्याग करते समय यह संकल्प लिया था कि वे हिमालयराज के घर जन्म लेकर पुनः भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करेंगी. अपने संकल्प के अनुसार सती ने राजा हिमालय की पत्नी मेनका के गर्भ से जन्म लिया और पार्वती कहलाईं.

माता पार्वती के बड़े होने पर उनके माता-पिता उनके लिए योग्य वर की तलाश करने लगे. तभी देवर्षि नारद मुनि राजा हिमालय के पास पहुंचे और उनसे कहा कि पार्वती कोई साधारण कन्या नहीं हैं, बल्कि वे स्वयं जगज्जननी हैं और उनके लिए भगवान शिव ही सर्वश्रेष्ठ वर हैं. यह सुनकर राजा और रानी अत्यंत प्रसन्न हुए.

उसी समय भगवान शिव तपस्या करते हुए उसी क्षेत्र में पहुंचे थे. माता पार्वती प्रतिदिन श्रद्धा और भक्ति से शिवजी की सेवा करने लगीं. वर्षों तक सेवा करने के बाद भी शिव समाधि में लीन रहे. तब पार्वती ने कठोर तपस्या करने का निश्चय किया. उन्होंने वर्षों तक फलाहार, पर्णाहार और अंत में निराहार रहकर भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए तप किया. इसी कारण उन्हें अपर्णा भी कहा गया.

माता पार्वती की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें पत्नी रूप में स्वीकार करने का वरदान दिया. देवताओं की उपस्थिति में माता पार्वती और भगवान शिव के विवाह का दिन निश्चित हुआ, जो फाल्गुन मास की चतुर्दशी तिथि थी.

शिव-पार्वती विवाह और दिव्य बारात

विवाह के दिन भगवान शिव बारात लेकर माता पार्वती के द्वार पहुंचे. भगवान शंकर की बारात अत्यंत अद्भुत और अलौकिक थी. इस बारात में नंदी, भैरव, वीरभद्र सहित अनेक गण, ऋषि-मुनि, देवता, गंधर्व और किन्नर शामिल हुए.

भूत-प्रेतों और गणों की विचित्र वेश-भूषा देखकर माता पार्वती की माता मैना पहले भयभीत होकर बेहोश हो गईं. इसके बाद भगवान शिव ने सौम्य और सुंदर रूप धारण कर उनके सामने दर्शन दिए. भगवान शिव का यह रूप इतना सुंदर था कि वे सुंदरेश्वर कहलाने लगे. माता मैना भगवान शिव को इस रूप में देखकर प्रसन्न हो गईं और उनका आदर-सम्मान के साथ स्वागत किया. शुभ मुहूर्त में शिव-पार्वती का विवाह संपन्न हुआ. भगवान विष्णु, ब्रह्मा और अन्य देवताओं की उपस्थिति में विवाह वैदिक विधि से कराया गया. इस दिव्य विवाह के साथ ही शिव-पार्वती का मिलन पूर्ण हुआ.

चूंकि फाल्गुन मास की चतुर्दशी तिथि के दिन ही दोनों का विवाह संपन्न हुआ था, इसलिए इस दिन का महत्व और भी बढ़ गया. इस दिन विशेष रूप से कुंवारी लड़कियां मनचाहा वर पाने के लिए और विवाहित महिलाएं वैवाहिक जीवन में सुख-समृद्धि के लिए भगवान शिव की आराधना करने लगीं. यह दिन भक्ति, तप, संयम और श्रद्धा का प्रतीक माना जाता है.

Advertisement Carousel
Share.

Comments are closed.

chhattisgarhrajya.com

ADDRESS : GAYTRI NAGAR, NEAR ASHIRWAD HOSPITAL, DANGANIYA, RAIPUR (CG)
 
MOBILE : +91-9826237000
EMAIL : info@chhattisgarhrajya.com
August 2026
M T W T F S S
 12
3456789
10111213141516
17181920212223
24252627282930
31