भारत की आईटी इंडस्ट्री दशकों से देश की अर्थव्यवस्था का मजबूत स्तंभ रही है, लेकिन अब एक नए और खतरनाक दौर से गुजर रही है। खतरा कोई और नहीं, बल्कि आईटी कंपनियों द्वारा बनाया गया आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) ही है। जहां पहले सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट, टेस्टिंग और सर्विसेज जैसी सेवाओं पर निर्भर कंपनियां चमक रही थीं, उनके बुरे दिन शुरू हो चुके हैं। बुरे दिन इसलिए क्योंकि अब उन तमाम कार्यों को एआई ऑटोमेटेड करके सीधा उनके बिजनेस मॉडल को ही चुनौती दे रहा है। भारत के लिए यह स्थिति इसलिए भी चिंता का विषय है, क्योंकि देश को दुनिया का आउटसोर्सिंग हब माना जाता है। भारतीय अर्थव्यवस्था में आईटी सेक्टर, बीपीओ, कॉल सेंटर्स और बैक-ऑफिस सेवाओं में लाखों लोगों को रोजगार मिलता है…

देश की राजधानी नई दिल्ली में ग्लोबल आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस सम्मेलन गरमागरम चर्चा में है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) यानी कृत्रिम बुद्धिमत्ता, वह प्रौद्योगिकी है जो कंप्यूटर सिस्टम को ऐसे कार्य करने में सक्षम बनाती है जिनके लिए सामान्य रूप से मानव बुद्धि की आवश्यकता होती है, जैसे सीखना, तर्क करना, समस्या समाधान और निर्णय लेना। आज स्वास्थ्य, वित्त, कृषि से लेकर शासन तक हर क्षेत्र में एआई का प्रभाव बढ़ रहा है। जहां एक ओर यह तकनीक मानव जीवन को बेहतर बनाने की अपार क्षमता रखती है, वहीं दूसरी ओर यह कई गंभीर नैतिक, सामाजिक और कानूनी सवाल भी खड़े करती है जिन पर विचार करना अनिवार्य है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ने दुनियाभर में एक क्रांति लाने का काम किया है। इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी के अलावा हर क्षेत्र में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस मजबूती के साथ दाखिल हो चुका है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से किसी भी काम या प्रोसेस को बहुत आसानी से और बेहतर तरीके से किया जा सकता है। अगर हम शिक्षा क्षेत्र का ही उदाहरण लें तो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से कोई भी छात्र किसी भी विषय को आसानी और आधुनिक तरीके से सीख सकता है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से कंप्यूटर ऐसे काम करने में सक्षम है जिस काम को करने के लिए अमूमन मानवीय बुद्धिमत्ता की आवश्यकता होती है। लेकिन जिस तरह किसी टेक्नोलॉजी के फायदे होते हैं तो वहीं उसके नकारात्मक इस्तेमाल को भी नहीं नकारा जा सकता है। ठीक उसी तरह शिक्षा के क्षेत्र में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस अगर क्रांति लेकर आया है तो उसके दुष्प्रभाव से भी इनकार नहीं किया जा सकता है।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से सीखने की जरूरतों और अलग-अलग क्षमताओं वाले छात्रों के लिए पढ़ाई को और आसान बनाया जा सकता है। एक डेटा को अलग-अलग तरीके से और छात्रों के अनुरूप उसे प्रस्तुत करने में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद ली जा सकती है। साथ ही विकलांग, सीखने में अंतर या भाषा की बाधाओं जैसी दिक्कतों को भी इसकी मदद से दूर किया जा सकता है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का उपयोग पेपर ग्रेडिंग और पाठ योजनाएं बनाने जैसे कार्यों में भी किया जा सकता है, जिससे शिक्षकों का समय अधिक महत्वपूर्ण कार्यों पर ध्यान केंद्रित करने में लगेगा। इसके अलावा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद किसी एक जानकारी से और अधिक जानकारी निकालने में भी ली जा सकती है। एआई की मदद से नई जानकारियों को आसानी से बनाया जा सकता है। शिक्षा के क्षेत्र में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि यह छात्रों की मानसिक क्षमता और सीखने में बाधा उत्पन्न कर सकती है। छात्र आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से अपने सवालों के जवाब आसानी से ढूंढ सकते हैं। जिससे वो खुद से किसी सवाल के जवाब ढूंढने में पीछे रह सकते हैं। शिक्षा के क्षेत्र में एआई का उपयोग जवाबदेही, पारदर्शिता और निष्पक्षता से संबंधित कई और चुनौतियों को जन्म देता है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से कई और नुकसान भी हो सकते हैं, जैसे कि एआई चैटबॉट काफी कम समय में आपको किसी टॉपिक के बारे में लंबी-चौड़ी डिटेल बता देते हैं। इनसानों के मुकाबले इस काम में एआई की स्पीड बहुत तेज होती है। एआई का यह फीचर दुनियाभर में चल रही फेक न्यूज, गलत जानकारी जैसे मामलों में खतरनाक हो सकता है। हैकर्स इसका फायदा उठाकर गलत जानकारी फैला सकते हैं। इसका सबसे ज्यादा बुरा असर सोशल मीडिया प्लेटफॉम्र्स पर पड़ेगा। इसके अलावा कुछ एआई प्लेटफॉर्म फोटो और वीडियो भी जनरेट कर सकते हैं। फेक न्यूज फैलाने के लिए इनका काफी शातिर तरीके से इस्तेमाल हो सकता है। एआई की वजह से जो अगली समस्या आएगी, वो है बेरोजगारी। कई कंपनियों में स्मार्ट वर्क के लिए एआई का इस्तेमाल शुरू हो चुका है। इसके नतीजतन कंपनियां बड़े पैमाने पर छंटनियां कर सकती हैं। फिलहाल डेटा एंट्री, बुक-कीपर, ट्रांसलेटर, कस्टमर केयर, कॉपी राइटिंग और सोशल मीडिया मैनेजर्स की नौकरियों पर सबसे ज्यादा खतरा है। एक रिपोर्ट के मुताबिक एआई लगभग 300 मिलियन लोगों की नौकरी हड़प सकता है। साल 2020 की रिपोर्ट में साइबर सिक्योरिटी के लिए एआई से मदद लेने की बात कही गई थी। इसमें कहा गया कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस इनसानों के मुकाबले तेजी से बड़े खतरों का पता लगा सकता है।

इस हिसाब से एआई इनसानों की सिक्योरिटी के बारे में खुद समझेगा और इसे कंट्रोल करने के तरीके भी खुद ही ढूंढेगा। एआई पर इस कदर निर्भर होना भी मुश्किलें ला सकता है। कुछ दिनों पहले आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की बग के कारण चैटजीपीटी की सर्च हिस्ट्री लीक हो गई थी। इस तरह का खतरा आगे भी बना रहेगा। कंपनियों के पास यूजर्स का ढेर सारा डेटा होता है। ऐसे में एआई यूजर्स के पैटर्न को कॉपी करने और विज्ञापनों के लिए डेटा का गलत इस्तेमाल करके उनका नकली प्रोफाइल भी बना सकता है। आज के समय में मिलिट्री में इस्तेमाल होने वाली कई मशीनें जैसे मिसाइलों, ड्रोन को एआई से कंट्रोल किया जाता है। फिलहाल एआई को दी जाने वाली कमांड फिक्स हैं, लेकिन आने वाले समय में इसकी क्षमताएं बढेंग़ी। नई टेक्नोलॉजी के साथ अगले कुछ सालों में इनसानों की कमांड के बिना ही एआई फैसले ले सकेगा। इससे दिक्कतें बढ़ सकती हैं।

भारत की आईटी इंडस्ट्री दशकों से देश की अर्थव्यवस्था का मजबूत स्तंभ रही है, लेकिन अब एक नए और खतरनाक दौर से गुजर रही है। खतरा कोई और नहीं, बल्कि आईटी कंपनियों द्वारा बनाया गया आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) ही है। जहां पहले सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट, टेस्टिंग और सर्विसेज जैसी सेवाओं पर निर्भर कंपनियां चमक रही थीं, उनके बुरे दिन शुरू हो चुके हैं। बुरे दिन इसलिए क्योंकि अब उन तमाम कार्यों को एआई ऑटोमेटेड करके सीधा उनके बिजनेस मॉडल को ही चुनौती दे रहा है। भारत के लिए यह स्थिति इसलिए भी चिंता का विषय है, क्योंकि देश को दुनिया का आउटसोर्सिंग हब माना जाता है। भारतीय अर्थव्यवस्था में आईटी सेक्टर, बीपीओ, कॉल सेंटर्स और बैक-ऑफिस सेवाओं में लाखों लोगों को रोजगार मिलता है। ऐसे में विशेषज्ञों का मानना है कि एआई आधारित ऑटोमेशन के आने से यह पूरा उद्योग नए स्वरूप में ढल सकता है। बावजूद इसके आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस भारत के आर्थिक विकास को महत्वपूर्ण रूप से बढ़ा सकता है।-डा. वरिंद्र भाटिया

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