रायपुर, पश्चिम एशिया, विशेषकर ईरान में पिछले एक माह से जारी संघर्ष के मद्देनज़र पेट्रोलियम उत्पादों तथा उर्वरक निर्माण में प्रयुक्त आवश्यक कच्चे माल के आयात में व्यवधान की आशंका उत्पन्न हो गई है। इस स्थिति के कारण निकट भविष्य में रासायनिक उर्वरकों की उपलब्धता प्रभावित होने की संभावना है। इस उभरती चुनौती को ध्यान में रखते हुए छत्तीसगढ़ शासन की कृषि उत्पादन आयुक्त श्रीमती शहला निगार की परिकल्पना के तहत “हरित खाद, नीली-हरी शैवाल एवं जैव उर्वकों” पर एक दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन कृषि महाविद्यालय, रायपुर के सभागार में सफलतापूर्वक किया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य आगामी खरीफ मौसम की तैयारी के लिए सतत कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देना तथा रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता को कम करना था। प्रशिक्षण का शुभारंभ मुख्य अतिथि श्रीमती शहला निगार तथा डॉ. गिरिश चंदेल, कुलपति, इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय की अध्यक्षता में हुआ।


अपने स्वागत उद्बोधन में डॉ. चंदेल ने मृदा स्वास्थ्य सुधार एवं दीर्घकालिक कृषि स्थिरता हेतु पर्यावरण अनुकूल पोषक तत्व प्रबंधन के महत्व पर प्रकाश डाला। प्रतिभागियों को संबोधित करते हुए श्रीमती शहला निगार ने रासायनिक उर्वरकों की संभावित कमी पर चिंता व्यक्त की तथा हरित खाद, नीली-हरी शैवाल एवं जैव उर्वकों जैसे वैकल्पिक पोषक स्रोतों को अपनाने पर बल दिया। उन्होंने बताया कि ये जैविक स्रोत फसलों की पोषक आवश्यकता का लगभग 50 प्रतिशत तक पूरा कर सकते हैं। साथ ही उन्होंने अधिकारियों को आगामी दो से तीन महीनों में इनके उत्पादन एवं उपयोग को बढ़ावा देने के निर्देश दिए तथा किसानों को पर्यावरण अनुकूल एवं टिकाऊ कृषि पद्धतियों को अपनाने के लिए प्रेरित किया। तकनीकी सत्रों में इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय, रायपुर के विशेषज्ञ वैज्ञानिकों द्वारा व्याख्यान प्रस्तुत किए गए। डॉ. तापस चौधरी, विभागाध्यक्ष, सूक्ष्मजीव विज्ञान विभाग ने कृषि में नीली-हरी शैवाल एवं जैव उर्वकों की उपयोगिता पर विस्तृत जानकारी दी तथा नाइट्रोजन स्थिरीकरण एवं मृदा उर्वरता वृद्धि में उनकी भूमिका स्पष्ट की। उन्होंने धान उत्पादन में इनकी विशेष उपयोगिता एवं रासायनिक उर्वरकों की आवश्यकता को 50 प्रतिशत तक कम करने की क्षमता पर प्रकाश डाला। डॉ. ललित श्रीवास्तव, विभागाध्यक्ष, मृदा विज्ञान विभाग ने खरीफ फसलों के लिए रासायनिक उर्वरकों के विकल्पों पर चर्चा करते हुए समन्वित पोषक तत्व प्रबंधन पर बल दिया। डॉ. आदिकांत प्रधान, मुख्य वैज्ञानिक, सस्य विज्ञान विभाग ने हरित खाद के उपयोग से मृदा संरचना एवं पोषक तत्व उपलब्धता में सुधार के लाभों की जानकारी दी। कार्यक्रम के दौरान एक संवादात्मक सत्र का आयोजन भी किया गया, जिसमें प्रतिभागियों ने अपने अनुभव साझा किए तथा विशेषज्ञों से मार्गदर्शन प्राप्त किया। इसके पश्चात डॉ. तापस चौधरी द्वारा नीली-हरी शैवाल उत्पादन तकनीक का व्यावहारिक प्रदर्शन किया गया, जिससे प्रतिभागियों को प्रत्यक्ष अनुभव प्राप्त हुआ। आगामी खरीफ मौसम हेतु हरित खाद, नीली-हरी शैवाल एवं जैव उर्वकों के उत्पादन एवं व्यापक उपयोग की रणनीति पर विचार-विमर्श किया गया। इस सत्र में किसानों के बीच इनके प्रसार एवं विस्तार गतिविधियों को सुदृढ़ करने पर विशेष ध्यान दिया गया।

कार्यक्रम का मार्गदर्शन एवं संचालन वरिष्ठ अधिकारियों जैसे डॉ. विवेक कुमार त्रिपाठी, निदेशक अनुसंधान सेवाएँ, डॉ. एस. एस. टूटेजा, निदेशक विस्तार सेवाएं, इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय, रायपुर, डॉ. आरती गुहे, अधिष्ठाता, कृषि महाविद्यालय, रायपुर, डॉ. कपिल देव दीपक, कुलसचिव, इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय, रायपुर, श्री सी.बी. लोंडेकर, अतिरिक्त संचालक, कृषि संचालनालय, छत्तीसगढ़ शासन, श्री विकास मिश्रा, उप सचिव तथा श्री अमित सिंह, अवर सचिव, कृषि विभाग द्वारा किया गया। इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में राज्य के विभिन्न जिलों से आए 150 से अधिक अधिकारियों, उप संचालकों, कृषि अधिकारियों, वैज्ञानिकों एवं कृषि विज्ञान केंद्र के अधिकारियों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। कार्यक्रम का समापन सकारात्मक वातावरण में हुआ, जिसमें राज्य में सतत एवं पर्यावरण अनुकूल कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देने का सामूहिक संकल्प लिया गया।

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