युवा भारत जो सशक्त हो रहा है, उसकी जड़ें भारतीय संतों की परंपरा में हैं। वक्त-वक्त पर आपस में प्रेम और सौहार्द बनाए रखना लोगों को संतों ने सिखाया। संत रविदास जी इसके अभिन्न अंग हैं। उनके काम और उनके काम के परिणामों को देखकर ही समकालीन संतों ने उन्हें संत शिरोमणि की उपाधि दी थी। संत रविदास जी एक भारतीय रहस्यवादी, कवि, समाज सुधारक और आध्यात्मिक गुरु थे, जिन्होंने भक्ति गीतों, कविताओं और आध्यात्मिक शिक्षाओं के माध्यम से भक्ति आंदोलन में महत्वपूर्ण योगदान दिया। संत रविदास जी का जुनून सत्य की खोज था। उनका कहना था कि ज्येष्ठ-कनिष्ठ का विचार सरासर गलत है। सत्य, करुणा, आंतरिक पवित्रता और निरंतर कड़ी मेहनत रविदास जी का उपदेश था।
संत रविदास जी का जन्म वाराणसी के सीर गोवर्धनपुर में माघ पूॢणमा संवत 1433 या 15वीं शताब्दी को माता कलसां देवी और पिता संतोख दास के घर हुआ। उन्होंने अपने जूते बनाने के पैतृक व्यवसाय को जारी रखा और इसे ही ईश्वर सेवा माना लेकिन जल्द ही वे अपना अधिकांश समय गंगा नदी के किनारे आध्यात्मिक गतिविधियों में व्यतीत करने लगे। इसके बाद उन्होंने अपना अधिकांश समय तपस्वियों, साधुओं और सूफी-संतों के साथ बिताया। रविदास का विवाह कम उम्र में लोना देवी से हुआ था। उनके पुत्र विजय दास का जन्म हुआ। भक्ति आंदोलन के कई कवियों की सबसे पुरानी जीवनियों में से एक, अनंतदास परचाई, रविदास के जन्म का वर्णन करती है।
भक्तिमाल जैसे मध्यकालीन साहित्य के अनुसार, रविदास जी भक्ति संत रामानंद के शिष्य थे। उन्हें आमतौर पर कबीर का समकालीन माना जाता है। फिर भी, प्राचीन साहित्य रत्नावली का दावा है कि गुरु रविदास ने रामानंद से आध्यात्मिक शिक्षा प्राप्त की और वे रामानंदी संप्रदाय से संबंधित थे। उन्होंने व्यापक यात्रा की और गुजरात, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, राजस्थान और हिमालय में स्थित हिंदू तीर्थ स्थलों का दर्शन किया। उन्होंने सर्वोच्च सत्ता के सगुण (विशेषताओं सहित, चित्रमय) रूपों का त्याग कर निर्गुण (अमूर्त, गुणों रहित) रूप पर ध्यान केंद्रित किया। उनके क्षेत्रीय भाषाओं में रचित रचनात्मक भजनों से प्रेरित होकर, सभी पृष्ठभूमि के लोग उनसे शिक्षा और परामर्श लेने आते थे। आर.एस.एस. के सर कार्यवाह दत्तात्रेय होसबोले जी के शब्दों में, ‘‘एक साधारण परिवार से आने वाले संत श्री रविदास जी की महानता को काशी के विद्वानों सहित समाज के सभी वर्गों ने उनकी सर्वोच्च भक्ति, सेवाभाव और समाज के प्रति शुद्ध प्रेम के कारण स्वीकार किया। काशी के राजा, झाली रानी और मीराबाई जैसे राजपरिवार के सदस्य भी उन्हें अपना गुरु मानते थे।
‘संत रविदास और गुरू ग्रंथ साहिब’ : संत रविदास जी महाराज द्वारा रचित लगभग 41 शबद (भजन) गुरु ग्रंथ साहिब में ‘बानी भगतन की’ के अंतर्गत विभिन्न रागों (जैसे राग आसा, राग धनासरी, आदि) में सम्मिलित हैं। जाति-पाति का विरोध और ईश्वर की एकता जैसी उनकी शिक्षाएं गुरु ग्रंथ साहिब के सिद्धांतों के अनुरूप हैं। गुरु अर्जुन देव जी ने संत रविदास जी की रचनाओं को गुरु ग्रंथ साहिब में स्थान दिया, क्योंकि उनकी वाणी परमेश्वर के प्रति गहरे प्रेम और भक्ति को व्यक्त करती है।
उनके भजनों में जातिवाद और सामाजिक विभाजन को खत्म करने, ईश्वर की एकता और आत्म-प्राप्ति का संदेश है। संत रविदास जी की वाणी को गुरु ग्रंथ साहिब में सम्मिलित करना यह दर्शाता है कि सिख धर्म में उन्हें एक ऊंचे आध्यात्मिक संत के रूप में माना जाता है। आर.एस.एस. के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत के शब्दों में, ‘‘भारत में आज अपार संभावनाएं हैं। कुशल जनशक्ति हर क्षेत्र में उपलब्ध है। विश्वगुरु बनने के लिए पूर्ण अनुकूल स्थितियां हैं। संत शिरोमणि संत रविदास जी के समरसता के सिद्धांतों पर यदि सभी अमल करें तो भारत को विश्वगुरु बनने से कोई नहीं रोक पाएगा।’’
वर्तमान समय में, जब कई विभाजनकारी ताकतें वर्ग और जाति के आधार पर सामाजिक ताने-बाने को तोडऩे की कोशिश कर रही हैं, हम सभी को पूज्य संत रविदास जी की शिक्षाएं समाज और राष्ट्र की एकता और अखंडता को बनाए रखने हेतु अपनी आहुति डालने को प्रेरित करती हैं।-सुखदेव वशिष्ट



















