पटना: ‘जय निशांत, तय निशांत’ के नारों में बिहार की राजनीति को नई दिशा देने वाला जदयू क्या दो धड़े में बंट गया है? आखिर इस धड़ा में बंटते जदयू के आधार क्या हैं? जो जदयू बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को नीतीश की नीतियों पर चलने की बाध्यता बताने से चूक नहीं रहा है, उस खास घड़ी में जदयू का एक धड़ा निशांत कुमार की उस यात्रा से दवाब में क्यों है? और वह भी निशांत कुमार की उस यात्रा से जिसे नीतीश कुमार की नजरों से देखने चले हैं? चलिए जानते हैं कि निशांत की यात्रा से दवाब में कौन-कौन और कौन कौन से दल हैं।
निशांत को लेकर जदयू के भीतर चल क्या रहा है?
नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री का पद छोड़कर राज्यसभा जाने के निर्णय के बाद जदयू के दो धड़े में बंटने के संकेत मिले। इस दो धड़े में एक तरफ श्रवण कुमार, उमेश कुशवाहा और संजय गांधी तो दूसरी तरफ केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन उर्फ ललन सिंह, विजय चौधरी और संजय झा की। दोनों ग्रुप अलग-अलग रह कर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को साध कर अपनी अपनी बात मनवाते रहे हैं, पर निशांत कुमार की यात्रा के बाद जदयू के भीतर दवाब की नई राजनीति शुरू हो गई है।
निशांत की सद्भाव यात्रा
दरअसल नीतीश कुमार ने निशांत कुमार की यात्रा को लेकर 30 विधायकों की टीम बनाई। इस टीम में प्रमुख रूप से रूहेल रंजन, चेतन आनंद, विशाल, शुभानंद मुकेश, समृद्ध वर्मा, अतिरेक और नचिकेता शामिल हैं। इन विधायकों को यह जिम्मेदारी दी गई है कि नीतीश वर्जन-2 के रूप में निशांत कुमार को स्थापित किया जाए और वर्ष 2030 विधानसभा चुनाव इनके नेतृत्व में लड़ा जाए।
पर जदयू का एक धड़ा यह सवाल उठा रहा है कि नीतीश कुमार की देख रख में जब टीम निशांत साथ है, तब वहां श्रवण कुमार, संजय गांधी और उपेंद्र कुशवाहा क्यों हैं? और वे क्या कर रहे हैं? उनकी भूमिका को लेकर एक संशय की स्थिति बन गई है?
राजद का युवा नेतृत्व भी दबाव में
निशांत कुमार की सद्भाव यात्रा से राजद के भीतर भी भूचाल आ गया है। राजद और उसके नए बॉस तेजस्वी यह मान कर चल रहा है कि नीतीश कुमार के बाद जदयू टूट कर बिखर जाएगा और उसका बड़ा हिस्सा राजद में आ जाएगा और समाजवादी की राजनीति के अकेल झंडा बरदार राजद बन जाएगा। पर निशांत कुमार की सद्भाव यात्रा वर्ष 2030 विधानसभा चुनाव के नायक को स्थापित करने की यात्रा साबित हो रही है।



















