बंगाल और तमिलनाडु के जनादेश ‘मील-पत्थर’ हैं। बंगाल जीत कर आरएसएस का चिर-संचित एजेंडा भी पूरा हो गया है, तो तमिलों ने 64 साल पुरानी द्रविड़ राजनीति को खारिज कर नई विचारधारा, नए एजेंडे को चुना है। आरएसएस का पुराना एजेंडा था कि जम्मू-कश्मीर, असम, पूर्वोत्तर और बंगाल को जीत कर राष्ट्रवाद की सत्ता स्थापित करनी है। ‘जनसंघ’ की स्थापना के बाद डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने जम्मू-कश्मीर पर फोकस किया और ‘एक राष्ट्र, एक विधान, एक निशान, एक प्रधान’ की विचारधारा पर आंदोलन खड़ा किया। उन्होंने शहादत भी दी। बहरहाल वह दौर घोर अतीत और एक इतिहास हो चुका है, लेकिन आज भाजपा ने बंगाल का ऐतिहासिक, प्रचंड, अभूतपूर्व जनादेश हासिल कर संघ की वैचारिक सोच को संपूर्णता दी है। दरअसल बंगाल, असम, पूर्वोत्तर भाजपा की वैचारिक सफलताओं के प्रतीक हैं। जम्मू-कश्मीर में भी उपराज्यपाल के जरिए भाजपा ही सत्ता में है, क्योंकि वहां उपराज्यपाल ही ‘प्रशासनिक प्रमुख’ होते हैं। मुख्यमंत्री निर्वाचित हैं, लेकिन वह ‘प्रतीकात्मक’ हैं। बहरहाल अब देश के ‘अंग, बंग, कलिंग’ पर संघ परिवार का राजनीतिक वर्चस्व है। भाजपा-एनडीए देश के 21-22 राज्यों और करीब 70 फीसदी भू-भाग पर काबिज हैं। यह सफलता और विस्तार पुरानी कांग्रेस के दौर की पुनरावृत्ति भी लगती है। अब भाजपा के सामने एक देश, एक चुनाव, समान नागरिक संहिता का राष्ट्रीयकरण, बांग्लादेशी घुसपैठियों की पहचान और उन्हें देश के बाहर खदेडऩा, देश के नए परिसीमन और अंतत: नारी शक्ति वंदन अधिनियम को लागू करने के एजेंडीय काम शेष हैं। यकीनन वे राजनीतिक चुनौतियां भी हैं। तमिलनाडु का जनादेश भी वैचारिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है। 1960 के दशक में वहां द्रविड़ राजनीति का आंदोलन ऐसा खड़ा किया गया कि 1967 के बाद कांग्रेस तमिलनाडु की सत्ता में कभी लौट ही नहीं पाई। पेरियार (ईवी रामासामी नायकर) दक्षिण भारत के एक महान समाज सुधारक, तर्कवादी, नास्तिक, द्रविड़ आंदोलन के जनक थे।

उन्होंने तमिलनाडु में जाति-व्यवस्था, ब्राह्मणवाद, अंधविश्वास और महिला उत्पीडऩ के खिलाफ ‘आत्म-सम्मान आंदोलन’ चलाया। उनके सामाजिक न्याय योगदान के कारण उन्हें ‘पेरियार’ (महान व्यक्ति) कहा जाता है। द्रविड़ राजनीति का विभाजन हुआ और द्रमुक, अन्नाद्रमुक नामक राजनीतिक दल स्थापित हुए, लेकिन उनकी बुनियादी सोच एक ही थी। उन्हें वैकल्पिक तौर पर जनादेश भी मिलते रहे। मौजूदा संदर्भों तक द्रविड़ राजनीति देश में उत्तर बनाम दक्षिण, हिंदी-विरोधी, सनातन-विरोधी की पर्याय ही बनी रही। निवर्तमान मुख्यमंत्री स्टालिन के पुत्र उदय स्टालिन ने सनातन धर्म की तुलना ‘मच्छर, मलेरिया, डेंगू और कोरोना’ से की और उनके समूल नाश के आह्वान किए। अब विधानसभा चुनाव में तमिल जनता ने छह दशकों के लंबे कालखंड के बाद द्रविड़ राजनीति को खारिज किया है। यह बहुत बड़ा वैचारिक बदलाव है। हालांकि सुपरस्टार विजय की दो साल पुरानी पार्टी ‘टीवीके’ को बहुमती जनादेश नहीं मिला है, लेकिन वह सबसे बड़ी पार्टी और बहुमत के बेहद करीब है, लिहाजा सत्ता का आमंत्रण उन्हें ही मिलेगा। विजय ने व्यापक संदर्भों में भ्रष्टाचार के खिलाफ और शिक्षा-रोजगार जैसे क्षेत्रों में सुधारों का एजेंडा पेश किया है। बंगाल, तमिलनाडु, असम के संदर्भ में ‘मुफ्तखोरी की रेवडिय़ां’ जिस तरह परोसी गई हैं, वे अंतत: देशहित में नहीं हैं और देश पर कर्ज का बोझ ही बढ़ाएंगी। प्रधानमंत्री मोदी ‘रेवडिय़ों’ का सार्वजनिक विरोध करते रहे हैं, लेकिन फिर भी उनकी पार्टी रेवडिय़ों को ‘गारंटी’ के तौर पर परोसती है। तमिलनाडु पर करीब 10.42 लाख करोड़ रुपए और बंगाल पर 7.90 लाख करोड़ रुपए का कर्ज है। बंगाल में करीब 6688 कंपनियां और फैक्टरियां राज्य छोड़ कर कहीं और चली गई हैं। बंगाल के करीब 7.18 लाख लोग पलायन कर चुके हैं। तमिलनाडु की आर्थिक विकास दर बेहतर है, लेकिन कर्ज कैसे चुकता किया जाएगा? औसत चुनाव में किसानों के कर्ज माफ के आश्वासन दिए जाते हैं।

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