नई दिल्लीः तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी), आम आदमी पार्टी (AAP) और शिवसेना (UBT) के कई नेताओं ने पाला बदल लिया है। ऐसी अटकलें हैं कि सत्ताधारी बीजेपी संसद में परिसीमन के स्वरूप को फिर से बदलने के लिए संविधान संशोधन बिल लाने से पहले जरूरी संख्या जुटाने की कोशिश कर रही है।

एनडीए दो-तिहाई बहुमत के आंकड़े के करीब

हालांकि लोकसभा में विशेष बहुमत हासिल करना एक लंबी प्रक्रिया है, लेकिन एनडीए दो-तिहाई बहुमत के आंकड़े के करीब पहुंच गया है। लोकसभा में एनडीए की संख्या अब 314 हो गई है, जिसमें तृणमूल के 20 सांसद शामिल हुए हैं; अगर शिवसेना (UBT) के बागी नेता भी पाला बदल लेते हैं, तो यह संख्या 320 तक पहुंच सकती है। राज्यसभा में अगले हफ्ते तक एनडीए के पास 151-152 सीटें होंगी और पश्चिम बंगाल में तीन सीटों पर उपचुनाव होने के बाद यह संख्या 154-155 तक पहुंच जाएगी, जो दो-तिहाई बहुमत से सिर्फ 8-9 सीटें कम होगी।

नए भारत की नई राजनीति की झलक

असल में, संसद में दल-बदल से तैयार किए जा रहे ‘आंकड़े’ नए भारत की नई राजनीति की झलक दिखा रहे हैं। थोड़ा पीछे चलते हैं। 1967 में उत्तर प्रदेश में चरण सिंह का दल बदलना भारत में दल-बदल का पहला बड़ा मामला था। बाद के सालों में हुई राजनीतिक उठा-पटक शायद मुख्य रूप से साधारण बहुमत हासिल करने के लिए की गई थी। लेकिन अभी जो चल रहा है, उसके पीछे माना जा रहा है कि यह मोदी सरकार के उस प्रयास का नतीजा है जिसमें वह परिसीमन पर संविधान संशोधन बिल पास कराने के लिए दो-तिहाई बहुमत नहीं जुटा पाई थी।

हम जो देख रहे हैं, उसे राजनीतिक दल-बदल या आम तौर पर पार्टी बदलने के पारंपरिक नजरिए से नहीं समझा जा सकता। यह कहीं ज्यादा व्यवस्थित चला है। बड़े पैमाने पर हो रहे दल-बदल के पीछे चाहे जो भी मकसद हो, चाहे विधायी दबदबा बनाना हो, विवादित संवैधानिक बदलावों को आसान बनाना हो, या बस सत्ता को मजबूत करना हो, इस प्रक्रिया की एक बड़ी लोकतांत्रिक कीमत चुकानी पड़ती है।

मनोज झा, राजद सांसद

बीजेपी को हुआ फायदा, नुकसान में रही कांग्रेस

  • पिछले 12 वर्षों में बीजेपी को दल-बदल से फायदा हुआ है। 2016 में अरुणाचल प्रदेश में कांग्रेस के 44 में से 43 विधायक बीजेपी में शामिल हो गए, जिससे पार्टी सरकार बनाने में सफल रही।
  • मौजूदा विधानसभा में कांग्रेस का सिर्फ एक विधायक है, जबकि तीन अन्य ने पाला बदल लिया था। मणिपुर और गोवा में भी कांग्रेस से नेताओं के दल-बदल के बाद बीजेपी सरकार बनाने में कामयाब रही।

सरकार निरकुंश …, इसलिए किया था ये प्रावधान

हालांकि, एक्सपर्ट्स और राजनीतिक टिप्पणीकार नजरिए में बदलाव देख रहे हैं, क्योंकि अब दल-बदल का इस्तेमाल संसद में ‘स्पेशल मेजॉरिटी’ यानी विशेष बहुमत हासिल करने के लिए किया जा रहा है। संविधान बनाने वालों ने इस विशेष बहुमत का प्रावधान इसलिए किया था ताकि सरकार अपनी बहुमत का गलत इस्तेमाल करके संविधान में बदलाव न कर सके।

संविधान सभा में कुछ सदस्यों ने संविधान में संशोधन के लिए ‘सिंपल मेजॉरिटी’ यानी साधारण बहुमत की वकालत की थी, लेकिन ड्राफ्टिंग कमेटी के चेयरमैन बी.आर. अंबेडकर ने ‘चेक एंड बैलेंस’ के लिए दो-तिहाई बहुमत की जरूरत का समर्थन किया था।

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