कफ सिरप भारत में सबसे व्यापक रूप से निर्मित और उपभोग की जाने वाली दवाओं में से हैं, जिससे बाजार का मजबूत नियमन आवश्यक हो जाता है। फार्मा रिटेल ट्रैकर फार्माट्रैक के अनुसार, अकेले मई में, बिक्री कम से कम 8.47 लाख यूनिट तक पहुंच गई, जिसका मूल्य 6,670 करोड़ रुपए था। फिर भी यह क्षेत्र बार-बार जांच के दायरे में आया है, जब दूषित कफ सिरप भारत और विदेशों में बच्चों की मौत से जुड़े थे। स्वास्थ्य मंत्रालय ने तब से नियमों को कड़ा कर दिया है, बिक्री को लाइसैंस प्राप्त कैमिस्टों तक सीमित और डॉक्टरों की पर्ची को अनिवार्य कर दिया है।
देश भर में कफ सिरप बनाने वाले 2,000 से अधिक निर्माताओं के साथ, विशेषज्ञों का कहना है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य की रक्षा के लिए निरंतर नियामक सतर्कता, कठोर गुणवत्ता परीक्षण और सख्त प्रवर्तन महत्वपूर्ण हैं। एक उद्योग विशेषज्ञ ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, ‘कफ सिरप निर्माता हलवाई की तरह हैं, वे हर जगह हैं। यही कारण है कि उत्पादों की गुणवत्ता बनाए रखना बहुत मुश्किल है।’ यह चिंता का विषय है, यह देखते हुए कि पिछले साल मध्य प्रदेश में कम से कम 22 बच्चों की मौत में शामिल कफ सिरप वाली तमिलनाडु की कंपनी का शीर्ष दवा नियामक के पास कोई रिकॉर्ड नहीं था।
बिक्री और मात्रा के हिसाब से सबसे आम कफ सिरप उत्पाद बनाने वाली कंपनियों की विनिर्माण इकाइयां काफी हद तक महाराष्ट्र, हिमाचल प्रदेश, सिक्किम, गुजरात, मध्य प्रदेश और गोवा जैसे राज्यों में केंद्रित हैं। भारत में बेचे जाने वाले कफ सिरप के कुछ सबसे आम ब्रांडों में सिप्ला का कोरैक्स, ग्लेनमार्क का एस्कोरिल, सेंच्यूर का सिनारेस्ट, डा. रेड्डीज का जेडेक्स और जॉनसन एंड जॉनसन का बेनाड्रिल शामिल हैं।
प्रमुख नियामक चुनौतियां क्या हैं : सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यकत्र्ता दिनेश ठाकुर कहते हैं, ‘कफ सिरप के 2,000 निर्माता समस्या नहीं हैं, खंडित नियामक पारिस्थितिकी तंत्र समस्या है। आज भारत में प्रभावी रूप से 37 नियामक हैं, प्रत्येक राज्य/केंद्र शासित प्रदेश के लिए एक और राष्ट्रीय नियामक, सी.डी.एस.सी.ओ.। इन सभी 37 नियामकों से सटीक जानकारी वाला कोई समेकित डाटाबेस नहीं है, इसके बावजूद कि भारत व्यावहारिक उद्देश्यों के लिए दवाओं के लिए एक एकल बाजार है, जो किसी भी अन्य वस्तु की तरह आसानी से राज्य की सीमाओं को पार करने में सक्षम है।’
इसलिए, पश्चिम बंगाल में निर्मित दवा कर्नाटक में बेची जा सकती है लेकिन कर्नाटक का दवा नियंत्रक पश्चिम बंगाल में संयंत्र का निरीक्षण नहीं कर सकता या उसका विनिर्माण लाइसैंस रद्द नहीं कर सकता, यदि वह कर्नाटक में घटिया दवाएं बेचता है। ठाकुर कहते हैं, ‘ज्यादा से ज्यादा कर्नाटक दवा नियंत्रक एक आपराधिक मुकद्दमा शुरू कर सकता है और इसमें भारतीय अदालतों में बहुत समय लग सकता है। भले ही पर्याप्त सबूत हों, अदालतें बहुत उदार रुख अपनाती हैं। यह यही खंडित नियामक ढांचा है जो समस्या है।’
फार्मा आपूर्ति शृंखला में दूषित पदार्थ क्यों प्रवेश करते हैं : फार्मास्युटिकल कंपनियों द्वारा अपनी सामग्री, विशेष रूप से प्रोपलीन ग्लाइकोल, जिसका उपयोग वे कफ सिरप बनाने के लिए विलायक (सॉल्वैंट) के रूप में करते हैं, का परीक्षण नहीं करने की खबरें हैं। एक उद्योग विशेषज्ञ सहमति जताते हैं, ‘छोटी कंपनियों को खुले बाजार से प्रोपलीन ग्लाइकोल खरीदना पड़ता है। बड़ी कंपनियों के विपरीत, वे आपूर्तिकत्र्ताओं से भरे हुए, सीलबंद बैरल खरीदने का जोखिम नहीं उठा सकतीं। यह असामाजिक लोगों के लिए फार्मास्युटिकल ग्रेड के रूप में सस्ते औद्योगिक ग्रेड प्रोपलीन ग्लाइकोल को मिलाने का अवसर भी पैदा करता है।’ कफ सिरप की त्रासदियां तो केवल हिमशैल का सिरा (शुरुआत) हैं, वे इस बात का सबूत हैं कि कैसे एक नियामक चूक निर्माता की विश्वसनीयता को खतरे में डाल सकती है।-अनोन्ना दत्त



















