आधुनिक युग में स्मार्टफोन, सोशल मीडिया, ओ.टी.टी. और इंटरनैट आदि हमारी जिंदगी का अभिन्न अंग बन चुके हैं। सुबह उठते ही पहला काम स्क्रीन चैक करना, रात सोने से पहले आखिरी काम भी स्क्रीन देखना, एक सामान्य सी बात हो गई है। लेकिन इस डिजिटल निर्भरता ने हमारे मानसिक स्वास्थ्य, शारीरिक फिटनैस, पारिवारिक रिश्तों और सामाजिक जीवन को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। ऐसे में कई मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि ‘डिजिटल डिटॉक्स’ यानी डिजिटल उपकरणों से कुछ समय के लिए पूरी तरह दूर रहना, आज हर परिवार के लिए आवश्यकता बन गया है।

गौरतलब है कि डिजिटल माध्यमों की लत अब एक महामारी का रूप ले चुकी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन और विभिन्न अध्ययनों के अनुसार, औसत व्यक्ति दिन में 7-8 घंटे से अधिक स्क्रीन पर बिताता है। बच्चों और किशोरों में यह आंकड़ा और भी अधिक है। इस लत के कई खतरनाक प्रभाव हैं। सबसे अहम है मानसिक स्वास्थ्य पर असर। हर समय नोटिफिकेशन्स, लाइक्स और कमैंट्स आदि की तलाश में हमारा मस्तिष्क लगातार डोपामाइन की खोज में रहता है। इससे चिंता, अवसाद, नींद की समस्या और ध्यान केंद्रित करने की क्षमता में कमी आती है। ‘डिजिटल डिप्रैशन’ या ‘सोशल मीडिया एंग्जाइटी’ अब आम शब्द बन गए हैं। इसके साथ ही शारीरिक स्वास्थ्य भी बिगड़ रहा है। आंखों की थकान, गर्दन-पीठ दर्द, मोटापा, कमजोर इम्यूनिटी, ये सब भी अधिक स्क्रीन टाइम के सीधे परिणाम हैं। बच्चों में शारीरिक गतिविधियों की कमी से विकास प्रभावित हो रहा है। परिवारों में बातचीत कम हो गई है। खाने की मेज पर सभी अपना फोन देखते हैं, बच्चे मां-बाप से कम और यूट्यूब आदि से ज्यादा सीखते हैं। ऐसे में रिश्तों में गहराई कम हो रही है।

इतना ही नहीं, इस बुरी लत का सामाजिक स्तर पर भी नुकसान है। फेक न्यूज, साइबर बुलिंग, प्राइवेसी का हनन और समय की बर्बादी के आंकड़ों में भी बढ़ौतरी हो रही है। काम की उत्पादकता घट रही है क्योंकि मल्टी-टास्किंग के नाम पर हम एक काम पर भी ध्यान नहीं दे पाते। अध्ययनों से पता चलता है कि सोशल मीडिया यूजर्स की याद्दाश्त और गहरी सोचने की क्षमता कम हो रही है। सोशल मीडिया क्रांति (लगभग 2004-2006 के बाद फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम आदि) से पहले की दुनिया याद कीजिए। सूचना और मनोरंजन के साधन अलग थे लेकिन उनके लाभ आज के डिजिटल माध्यमों से कहीं अधिक गहरे थे। लोग किताबें पढ़ते थे। एक उपन्यास पढऩे में पूरा ध्यान लगता था। इससे शब्दावली बढ़ती थी, कल्पनाशक्ति विकसित होती थी और धैर्य आता था। सुबह चाय के साथ अखबार पढऩा, चर्चा करने से बौद्धिक विकास और पारिवारिक बंधन दोनों बढ़ते थे। आज की तुलना में उस समय जानकारी कम लेकिन गहरी और विश्वसनीय होती थी।

दादा-दादी से कहानियां सुनना, लोकगीत, सांस्कृतिक कार्यक्रमों में हिस्सा लेना, ये सब स्मृति और सांस्कृतिक जड़ों को मजबूत करते थे। जानकारीका प्रसार धीमा लेकिन प्रभावशाली होता था। लोग गहरी बातचीत करते थे, बहसें होती थीं और रिश्ते मजबूत होते थे। उस युग में ध्यान भटकाने वाले तत्व कम थे। परिणामस्वरूप, लोग ज्यादा रचनात्मक, धैर्यवान और खुश रहते थे। अध्ययनों से साबित होता है कि स्क्रीन-फ्री पीढ़ी की याददाश्त, समस्या-समाधान क्षमता और रचनात्मकता आज की पीढ़ी से बेहतर थी। परिवार समाज की मूल इकाई है। अगर परिवार डिजिटल लत से ग्रस्त है, तो पूरा समाज प्रभावित होता है। ऐसे में डिजिटल डिटॉक्स अपनाने के कई लाभ हैं। बिना फोन के डिनर, बाहर घूमना, बोर्ड गेम्स खेलना, ये छोटी-छोटी आदतें रिश्तों में गर्माहट लाती हैं। इससे बच्चे अपने बड़ों से ज्यादा जुड़ते हैं। स्क्रीन से दूर रहने से नींद बेहतर होती है, चिंता कम होती है और खुशी बढ़ती है, जिससे मस्तिष्क को आराम मिलता है। पढ़ाई, खेलकूद, कलात्मक गतिविधियों में वृद्धि होती है। स्क्रीन टाइम सीमित करने से एकाग्रता और रचनात्मकता बढ़ती है। ज्यादा चलना-फिरना, व्यायाम, स्वस्थ भोजन की आदतें पड़ती हैं।

जानकार मानते हैं कि डिजिटल डिटॉक्स एकदम से नहीं, धीरे-धीरे अपनाना चाहिए। इसके लिए हम अपने परिवार स्तर पर कुछ नियम बनाएं। घर में स्क्रीन-फ्री जोन बनाए जाएं, जैसे कि भोजन कक्ष, बैडरूम में फोन प्रतिबंधित हो। डिटॉक्स टाइम तय किया जाए। मिसाल के तौर पर हर दिन कम से कम 2 घंटे और वीकेंड पर पूरा दिन स्क्रीन-फ्री बनाने की कोशिश करें। पारिवारिक गतिविधियां बढ़ाएं। जैसे कि किताब पढऩा, पिकनिक पर जाना, खुले में खेलना, संगीत सुनना आदि। यह सत्य है कि डिजिटल तकनीक ने जीवन को आसान बनाया है लेकिन इसका दुरुपयोग हमारी खुशहाली छीन रहा है। डिजिटल डिटॉक्स पीछे लौटना नहीं, बल्कि संतुलित जीवन की ओर बढऩा है। हर परिवार को इसे अपनाना चाहिए, ताकि हम अपनी सांस्कृतिक जड़ों, पारिवारिक मूल्यों और व्यक्तिगत स्वास्थ्य को बचाकर रख सकें। पहले का युग हमें याद दिलाता है कि खुशी स्क्रीन्स में नहीं, बल्कि रिश्तों, प्रकृति और सृजनशीलता में है। हमें प्रयास  करना चाहिए कि डिजिटल डिटॉक्स की दिशा में छोटे-छोटे कदम उठाएं। फोन को थोड़ी देर दूर रखें, परिवार के साथ समय बिताएं और वास्तविक जीवन का आनंद लें। डिजिटल डिटॉक्स न सिर्फ व्यक्तिगत, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बन सकता है। स्वस्थ परिवार ही स्वस्थ राष्ट्र की नींव है।-विनीत नारायण 

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