आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में तनाव एक आम समस्या बन गया है। काम का प्रैशर, पारिवारिक जिम्मेदारियां, आर्थिक चिंताएं और सोशल मीडिया का लगातार मचने वाला शोर, ये सब मिलकर मानसिक स्वास्थ्य पर भारी पड़ रहे हैं। ऐसे में लोग राहत की तलाश में पारंपरिक तरीकों की ओर लौट रहे हैं और इनमें सबसे प्रमुख है संगीत। संगीत न सिर्फ मनोरंजन का साधन है, बल्कि एक शक्तिशाली तनाव निवारक भी। हाल के वर्षों में यह ट्रैंड तेजी से बढ़ा है, खासकर युवाओं और महिलाओं में। वैज्ञानिक अध्ययनों से साबित होता है कि संगीत सुनना या गाना कोॢटसोल हॉर्मोन (स्ट्रैस हार्मोन) को कम करता है, ऑक्सीटोसिन (लव हार्मोन) बढ़ाता है और मूड सुधारता है। संयुक्त या एक साथ गायन में सामूहिकता का एहसास तनाव को और भी प्रभावी ढंग से कम करता है।

अध्ययन बताते हैं कि संगीत सांस लेने को नियंत्रित करता है, दिमाग को वर्तमान में लाता है और एंडोॢफन्स हॉर्मोन रिलीज करता है, जो प्राकृतिक दर्द निवारक और खुशी (फील गुड) हार्मोन हैं। योग, ध्यान या व्यायाम की तरह, नियमित संगीत गतिविधियां अवसाद और ङ्क्षचता को कम करती हैं। खासकर समूह गायन सामाजिक जुड़ाव बढ़ाता है, अकेलेपन को दूर करता है और भावनात्मक निष्कासन प्रदान करता है। मनोवैज्ञानिक इसे तनाव मुक्ति का सबसे आसान और उपयोगी साधन मानते हैं। पिछले कुछ वर्षों से भारत में युवाओं के बीच एक नए चलन की शुरुआत हुई है जिसे ‘भजन क्लबिंग’ कहा जाता है। युवाओं का यह नया ‘सोबर हाई’ सबसे चॢच त ट्रैंड बन गया है। पारंपरिक भजनों को क्लब-स्टाइल एनर्जी, आधुनिक संगीत, लाइटिंग और परफॉर्मैंस के साथ पेश किया जा रहा है। उल्लेखनीय है कि युवाओं को शराब या नशीले पदार्थों से दूर कर सकारात्मक ऊर्जा की बढ़ाने की इस पहल को काफी सराहा जा रहा है। गौरतलब है कि मुंबई, दिल्ली, बेंगलुरु, चेन्नई जैसे शहरों में ये आयोजन हाऊसफुल हो रहे हैं। इन कार्यक्रमों से प्रेरणा लेकर कई युवा अपना ग्रुप बनाने लगे हैं और ऐसे कार्यक्रम आयोजित करने लगे हैं।

देखा गया है कि इन कार्यक्रमों में युवा कॉलेज विद्यार्थी, प्रोफैशनल्स और मध्यम आयु वर्ग के लोग भाग लेते हैं, जिनकी औसत आयु 29-35 के आसपास होती है। वे कहते हैं कि ऐसे आयोजन तनाव और एंग्जायटी से राहत देते हैं। सामूहिक चैटिंग, डांसिंग और क्लैपिंग से ‘ब्लिस’ और ‘बिलॉङ्क्षन्गग’ का एहसास होता है। एक आयोजक के अनुसार, ‘‘लोग तनाव लेकर आते हैं और शांत होकर जाते हैं, हैंगओवर की बजाय शांति के साथ।’’युवाओं के बीच यह नया ट्रैंड ‘सोबर क्यूरियस’ मूवमैंट का हिस्सा है। आजकल का युवा नशीले पदार्थों से दूर हटकर अर्थपूर्ण अनुभवों की तलाश कर रहा है। सोशल मीडिया रील्स ने इसे वायरल बनाया है। प्रधानमंत्री मोदी ने भी ‘मन की बात’ में इसकी सराहना की। यह न सिर्फ मनोरंजन है, बल्कि आत्म-देखभाल और सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ाव है। वहीं ऐसे आयोजन पर टिकट और स्पॉन्सरशिप्स इसे मुख्यधारा का ईवैंट बना रहे हैं।

भारत की तरह ही पड़ोसी देश पाकिस्तान के कराची में भी महिलाओं द्वारा ‘सिंग-अलॉन्ग’ की पहल की गई है, जिसमें  हर उम्र की महिलाओं को ‘अपना समय’ (मी टाइम) मिलता है। यह एक अनोखी पहल है, जहां अलग-अलग उम्र की महिलाएं तनाव मुक्ति के लिए समूह में गाती हैं। गाने के दौरान वे हंसती-बोलती हैं, भावनाओं को शेयर करती हैं और एक-दूसरे का साथ देती हैं। यह नया ट्रैंड महिलाओं को सुरक्षित, सशक्त और जुड़ा महसूस कराता है। समान रूप से, दुनिया भर में महिलाओं के ग्रुप सिंङ्क्षगग कार्यक्रम ‘पोस्टनेटल डिप्रैशन’ (प्रसवोत्तर अवसाद) और एंग्जायटी में राहत देते पाए गए हैं।

संगीत के अलावा, ड्रम सर्कल, डांस, क्वायर और ग्रुप योग भी तनाव मुक्ति के अन्य साधन हैं। दुनिया भर के विभिन्न शहरों में ड्रम सर्कल युवाओं को ताल के जरिए तनाव रिलीज करने का मौका देता है। ऐसे सभी आयोजन डिप्रैशन और एंग्जायटी कम करने में ‘एंटीडिप्रैसैंट्स’ जितने प्रभावी पाए गए हैं। स्कूलों, कॉर्पोरेट कंपनियों और कम्युनिटी सैंटर्स में ऐसे कार्यक्रम को शामिल करने की जरूरत है। संगीत तनाव मुक्ति का प्राचीन लेकिन कालजयी तरीका है। छोटी-छोटी सामूहिक गतिविधियां बड़े बदलाव ला सकती हैं। व्यस्त जीवन में थोड़ा समय संगीत के लिए निकालें, यह न सिर्फ मन को शांत करेगा, बल्कि आत्मा को भी नई ऊर्जा देगा।-रजनीश कपूर 

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