जंतर-मंतर पर चल रहे छात्र आंदोलन को लेकर बांग्लादेश की लेखिका तसलीमा नसरीन ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर अपनी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने लिखा कि जंतर-मंतर पर जुटे “कॉकरोच” आंदोलन के प्रदर्शनकारियों को देखकर उन्हें बांग्लादेश के जुलाई 2024 के छात्र आंदोलन की याद आ गई। उन्होंने कहा कि उस आंदोलन की शुरुआत आरक्षण और मेरिट के मुद्दे से हुई थी, लेकिन बाद में वह सरकार बदलने की मांग तक पहुंच गया।
तसलीमा नसरीन ने दावा किया कि बांग्लादेश आज भी उस आंदोलन के बाद की स्थिति की कीमत चुका रहा है। उनके मुताबिक, वहां कट्टरपंथी ताकतें मजबूत हुईं और देश में हिंसा, सांप्रदायिकता, धार्मिक कट्टरता, महिलाओं के खिलाफ अपराध, आतंकवाद और अराजकता बढ़ी। यह उनकी व्यक्तिगत राय है, जिसे उन्होंने अपने X पोस्ट में साझा किया।
जंतर-मंतर के आंदोलन पर जताई चिंता
तसलीमा नसरीन ने लिखा कि जंतर-मंतर पर “कॉकरोच” आंदोलन के प्रदर्शनकारियों को देखकर उन्हें जुलाई 2024 के बांग्लादेश आंदोलन की याद आ गई। उन्होंने दोनों घटनाओं के बीच अपनी आशंका का जिक्र करते हुए कहा कि छात्र आंदोलनों को अब वह पहले की तरह आसानी से भरोसे की नजर से नहीं देख पाती हैं।
बांग्लादेश के आंदोलन का किया जिक्र
उन्होंने कहा कि बांग्लादेश में छात्र आंदोलन की शुरुआत “कोटा या मेरिट, मेरिट- मेरिट” के नारे से हुई थी, लेकिन बाद में आंदोलन का लक्ष्य सरकार को हटाना बन गया था। नसरीन के अनुसार, उसके बाद देश की स्थिति बिगड़ गई और कई गंभीर समस्याएं सामने आईं।
‘हर छात्र आंदोलन लोकतंत्र के लिए नहीं होता’
तसलीमा नसरीन ने लिखा कि जुलाई 2024 की घटनाओं ने उन्हें यह सिखाया कि हर छात्र आंदोलन लोकतंत्र के लिए नहीं होता, हर सरकार विरोधी आंदोलन आजादी नहीं लाता और हर क्रांति वास्तव में क्रांति नहीं होती। उनके अनुसार, कुछ क्रांतियां पुरानी व्यवस्था को हटाकर उससे भी ज्यादा डरावनी स्थिति पैदा कर देती हैं। यह टिप्पणी उन्होंने भारत में चल रहे छात्र आंदोलन के संदर्भ में अपनी आशंका व्यक्त करते हुए की।



















