केंद्रीय बैंक को अब महंगाई को नियंत्रण में रखने के साथ-साथ विकास की गति को थमने से बचाना होगा। वैश्विक संकट के समय निजी निवेश में सुस्ती आना स्वाभाविक है। ऐसे में आर्थिक गतिविधियों को सहारा देने के लिए सरकार को अपने पूंजीगत व्यय को लक्ष्य के अनुरूप तेजी से कारगर बनाना होगा। बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को प्राथमिकता मिले…

हाल ही में 5 अगस्त को भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने मौद्रिक नीति समिति की बैठक के बाद देश में महंगाई, आर्थिक स्थिति और सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि से जुड़ी तस्वीर पेश करते हुए कहा कि वैश्विक आर्थिक उथल-पुथल और कमजोर मानसून की चुनौतियों के बीच भी भारतीय अर्थव्यवस्था मजबूती के साथ दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था बनी हुई है। रिजर्व बैंक ने चालू वित्त वर्ष के लिए उपभोक्ता मूल्य सूचकांक पर आधारित महंगाई का अनुमान 5.0 प्रतिशत कर दिया है। जहां खाद्य वस्तुओं के क्षेत्र में महंगाई में कुछ वृद्धि के संकेत हैं, वहीं अन्य क्षेत्रों में महंगाई बढऩे के संकेत नहीं हैं। सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि का अनुमान 6.7 प्रतिशत कर दिया गया है। खास तौर से रेपो रेट (वह ब्याज दर जिस पर बैंक रिजर्व बैंक से कर्ज लेते हैं) को लगातार चौथी बार 5.25 प्रतिशत के स्तर पर यथावत रखा गया है। इससे होम, ऑटो और अन्य फ्लोटिंग रेट वाले लोन की ईएमआई (इक्वेटेड मंथली इंस्टॉलमेंट) नहीं बढ़ेगी। रिजर्व बैंक ने यह भी कहा है कि आने वाले दिनों में मानसून, अल नीनो और पश्चिम एशिया के संघर्ष की वजह से खाने-पीने की वस्तुएं और ईंधन महंगे हो सकते हैं। नि:संदेह इस समय पश्चिम एशिया संकट और अमरीकी प्रशासन की आर्थिक नीतियों का भारतीय अर्थव्यवस्था पर चौतरफा दबाव देखने को मिल रहा है। हालिया रिपोर्टों के अनुसार, भारत को कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों, माल ढुलाई संकट और व्यापारिक बाधाओं जैसी गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।

हाल ही में प्रस्तुत ब्लूमबर्ग रिपोर्ट के मुताबिक पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और व्यापारिक अनिश्चितता के चलते जुलाई 2026 में भारत की आर्थिक गतिविधियां पिछले चार वर्षों के सबसे निचले स्तर पर आ गई हैं। भारतीय रिजर्व बैंक की राज्य अर्थव्यवस्था रिपोर्ट के अनुसार, यद्यपि भारत की आंतरिक आर्थिक बुनियाद मजबूत है, लेकिन युद्ध के कारण उत्पन्न वैश्विक जोखिम और कच्चे तेल की मुद्रास्फीति अर्थव्यवस्था की रफ्तार को प्रभावित कर सकती हैं। इसी तरह अंतरराष्ट्रीय खाद्य नीति अनुसंधान संस्थान की रिपोर्ट के अनुसार ईरान युद्ध के चलते आपूर्ति श्रृंखला बाधित हुई है, जिससे उर्वरक और कृषि से जुड़ी वस्तुओं के आयात में लागत बढ़ी है। इससे ग्रामीण आय और कृषि विकास दर पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है। साथ ही ऊर्जा गलियारों में जारी गतिरोध के कारण माल ढुलाई (फ्रेट) और बीमा लागत में भारी वृद्धि हुई है, जिससे भारत का व्यापार घाटा बढ़ रहा है और रुपए पर दबाव बना हुआ है। उल्लेखनीय है कि इस समय अमरीका से भी भारत के लिए तीन परिदृश्य नई चुनौतियों के रूप में दिखाई दे रहे हैं। एक, 25 जुलाई को अमरीकी सीनेट में एच-1बी वीजा पर 3 साल तक रोक लगाने संबंधी एक नया और बेहद सख्त विधेयक पेश किया गया है। दो, 24 जुलाई से धारा 301 के तहत अमरीका में भारतीय आयातों पर 10 प्रतिशत टैरिफ लागू किया गया है।

तीन, 1 अगस्त 2026 से अमरीका के द्वारा आयात की जाने वाली भारत की जेनेरिक दवाओं पर चरणबद्ध तरीके से 200 प्रतिशत तक टैरिफ का ऐलान किया गया है। यह चिंताजनक है कि अमरीकी सीनेट में 25 जुलाई को पेश किए गए एक नए विधेयक के तहत एच-1बी वीजा जारी करने पर तीन साल की रोक लगाने का प्रस्ताव रखा गया है। इस कदम से अमरीका जाने का सपना देख रहे भारतीय आईटी और तकनीकी क्षेत्र के पेशेवरों पर सीधा और बड़ा असर पड़ सकता है। वीजा के लिए नए प्रस्तावों में 100000 डॉलर (लगभग 85.95 लाख रुपए) तक का भारी-भरकम शुल्क और कठोर न्यूनतम वेतन मानदंड शामिल हैं। वीजा के लिए पारंपरिक रैंडम लॉटरी खत्म करके केवल उच्च वेतन और वरिष्ठ स्तर के कर्मचारियों को प्राथमिकता देने की तैयारी है। वीजा धारकों के आश्रितों और परिजनों पर भी कई तरह की पाबंदियां लगाने की चर्चा है। हालांकि, 1 लाख डॉलर की भारी फीस वाले प्रशासनिक आदेश पर अदालती रोक फिलहाल बरकरार है, फिर भी संसद में पेश इस नए विधेयक ने अनिश्चितता का माहौल बना दिया है। यदि यह कानून लागू होता है, तो भारतीय पेशेवरों और सूचना प्रौद्योगिकी कंपनियों के लिए चुनौतियां काफी बढ़ सकती हैं। गौरतलब है कि अमरीका द्वारा 24 जुलाई से भारत समेत 17 देशों से आने वाले सामानों पर 10 प्रतिशत का टैरिफ लगाया गया है। अमरीका ने व्यापार अधिनियम 1974 की धारा 301 के तहत यह सख्त कदम उठाया है। इस कार्रवाई का मुख्य कारण उन देशों को बताया गया है, जिनके उत्पादों के निर्माण में जबरन मजदूरी के इस्तेमाल की शिकायतें मिली थीं। शुरुआत में भारत पर 12.5 प्रतिशत शुल्क लगाने का प्रस्ताव था, जिसे घटाकर 10 प्रतिशत किया गया है। भारत द्वारा अपनी विदेश व्यापार नीति में सुधार कर जबरन मजदूरी से बने सामानों पर प्रतिबंध लगाने के कारण यह राहत मिली है। इसी परिप्रेक्ष्य में यह भी इन विभिन्न कारणों से एक बार फिर वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी प्रतिकूल असर बढऩे लगा है। एशियाई विकास बैंक (एडीबी) के द्वारा जारी हालिया रिपोर्ट में कहा गया है कि पश्चिम एशियाई संकट और लॉजिस्टिक कीमतों में बढ़ोतरी का भारत की विकास दर पर प्रतिकूल असर होगा।

ऐसे में एडीबी ने भारत के लिए इस वित्त वर्ष 2026-27 के लिए पूर्व में निर्धारित की गई 6.9 प्रतिशत विकास दर को घटाकर 6.6 प्रतिशत कर दिया है। इसी तरह अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने अपनी रिपोर्ट में वर्ष 2026-27 के लिए भारत की विकास दर का अनुमान घटाकर 6.4 प्रतिशत कर दिया है। आईएमएफ का मानना है कि ऊर्जा की ऊंची कीमतें भारत में आर्थिक चुनौतियां बढ़ा सकती हैं। हालांकि इस समय भारत आपूर्ति चुनौतियों से निपटने के लिए पहले से बेहतर स्थिति में है, फिर भी चालू वित्त वर्ष में देश की आर्थिक विकास दर को 7 प्रतिशत तक ले जाने के लिए रणनीतिपूर्वक नए आर्थिक उपायों के साथ आगे बढऩा होगा। पिछले वित्त वर्ष 2025-26 में भारत ने 7.7 प्रतिशत की शानदार दर से वृद्धि दर्ज की थी, जो कि 2024-25 की 7.1 प्रतिशत की दर से काफी बेहतर थी। नि:संदेह इस समय वैश्विक आर्थिक चुनौतियों और घरेलू आर्थिक मुश्किलों के बीच बीच अर्थव्यवस्था को गतिशील रखना और विकास दर बढ़ाना चुनौती है। इस चक्रव्यूह से निकलने के लिए सरकार को ‘सुधार, प्रदर्शन और परिवर्तन’ के मंत्र को और अधिक आक्रामक ढंग से उपयोग में लाना होगा।

वैश्विक झटके और तेल की बढ़ती कीमतों के बीच भारत को अपनी समष्टि-आर्थिक स्थिरता बनाए रखने के लिए अपनी रणनीतियों में बदलाव करना होगा। केंद्रीय बैंक को अब महंगाई को नियंत्रण में रखने के साथ-साथ विकास की गति को थमने से बचाना होगा। वैश्विक संकट के समय निजी निवेश में सुस्ती आना स्वाभाविक है। ऐसे में आर्थिक गतिविधियों को सहारा देने के लिए सरकार को अपने पूंजीगत व्यय को लक्ष्य के अनुरूप तेजी से कारगर बनाना होगा। बुनियादी ढांचा परियोजनाओं- जैसे रेलवे, राष्ट्रीय राजमार्ग, नए बंदरगाहों और लॉजिस्टिक्स नेटवर्क में निवेश को प्राथमिकता देनी होगी। बुनियादी ढांचे में सरकारी निवेश बढऩे से इस्पात, सीमेंट और निर्माण जैसे मुख्य क्षेत्रों में मांग बनी रहती है, जिससे ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर नए रोजगार पैदा होते हैं और अर्थव्यवस्था का चक्र घूमता रहता है।-डा. जयंती लाल भंडारी

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