राहुल गांधी और अमित शाह बुनियादी तौर पर दोनों लोकसभा सांसद हैं। चूंकि राहुल विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस के संसदीय दल के नेता हैं, लिहाजा उन्हें ‘नेता प्रतिपक्ष’ तय किया गया है। अमित शाह प्रधानमंत्री मोदी की कैबिनेट के सदस्य हैं और उन्हें ‘गृहमंत्री’ का दायित्व सौंपा गया है। दोनों ही नेता संसद से ‘सुप्रीम’ नहीं हैं और न ही लोकसभा उनकी बपौती है। दोनों ही संसद के प्रति जवाबदेह हैं और नियम-प्रक्रिया से बंधे हैं। दिल्ली में छात्र, युवा आंदोलन के बाद गृहमंत्री अमित शाह संसद में दिखाई नहीं दिए। संसद भवन के अपने चैंबर में उपस्थित रहना और सदन में मौजूदगी बिल्कुल विपरीत स्थितियां हैं। गृहमंत्री को दोनों सदनों में बयान देकर आंदोलन के दौरान, उसके बाद और प्रदर्शनकारियों पर बर्बर हमलों को लेकर पहले ही स्पष्टीकरण दे देना चाहिए था। यह उनका संवैधानिक दायित्व था। राहुल गांधी के नेतृत्व में विपक्ष यह मांग लगातार करता रहा कि गृहमंत्री सदन में आएं और बताएं कि पैलेट गन क्यों चलाई गई? कीलों वाली लाठियां क्यों भांजी गईं? किसने आदेश दिया था? गृहमंत्री के लिए ‘गायब, लापता, भगोड़े, भाग गए’ सरीखे शब्द विपक्ष ने इसीलिए इस्तेमाल किए, क्योंकि न तो गृहमंत्री सामने आए और न ही बयान दिया। इन अमर्यादित, असंसदीय शब्दों की नौबत नहीं आनी चाहिए थी। नतीजा यह हुआ कि संसद की कार्यवाही निरंतर स्थगित होती रही। मॉनसून सत्र 20 जुलाई को शुरू हुआ था और बुधवार, 12 अगस्त, तक 18 दिनों की बैठकें हुईं, लेकिन लोकसभा में कुल 17 घंटे भी काम नहीं किया जा सका। विपक्ष के हंगामे, शोर, नारेबाजी के बीच ही 59 मिनट में 9 बिल ध्वनि-मत से पारित करने पड़े। हरेक बिल पर औसतन 3-5 मिनट खर्च किए गए और किसी भी बिल पर कोई चर्चा नहीं की गई। राज्यसभा में भी करीब 31 फीसदी काम किया जा सका। इन 18 दिनों में देश के करदाताओं के 118 करोड़ रुपए से अधिक की राशि पर पानी फेर दिया गया, जबकि सांसदों के भत्ते ‘अलग खर्च’ हैं। क्या इसी तरह देश का पैसा फूंकने और बिना चर्चा के बिल पारित करने को ही संसद बनी है? यहां यह भी प्रासंगिक है कि हमारी संसद अब साल में औसतन 50-65 दिन ही जुटती है और उस दौरान भी हंगामा मचा रहता है।

अमरीका, ब्रिटेन, जापान जैसे देशों में संसद साल में 140-160 दिन काम करती है। यह तुलना हमारे अधिकतर ‘माननीय’ नहीं जानते होंगे! बहरहाल जब मॉनसून सत्र ‘साइनेडाई’ (अनिश्चित काल के लिए स्थगित) होने को आया, तो गृहमंत्री अमित शाह सामने आए और हर सवाल का जवाब देने की बात कही। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि जब सदन में हंगामा मच रहा था, कार्यवाही लगातार स्थगित करनी पड़ रही थी, तो वह सदन में आकर क्या करते? यहां हमारा सवाल भी है कि क्या गृहमंत्री हंगामे, नारेबाजी के बीच सदन में कभी भी नहीं गए? क्या शोर-शराबे में ही उन्होंने अपनी बात नहीं रखी? अनुच्छेद 370 खत्म किया जा रहा था, तो सदन में विपक्ष ने कितना शोर मचाया था? क्या गृहमंत्री ने अपना प्रस्ताव नहीं पढ़ा? बहरहाल जब गृहमंत्री विस्तृत और बिंदुवार बहस और जवाबदेही को तैयार हुए, तो नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने कहा-गृहमंत्री का लेक्चर सुनने में हमारी कोई दिलचस्पी नहीं। वह क्या बोलेंगे, वी डोंट केयर (हमें उसकी परवाह नहीं)। वह पैलेट गन और लाठीचार्ज पर सीधा जवाब दें। उसके बाद नेता प्रतिपक्ष ने गृहमंत्री के इस्तीफे का राग अलापना शुरू कर दिया। यदि पैलेट और लाठीचार्ज का आदेश गृहमंत्री ने दिया अथवा किसी और ने दिया और गृहमंत्री को उसकी जानकारी नहीं थी या बर्बर हमले का जिम्मेदार कोई भी हो, गृहमंत्री उसके लिए इस्तीफा दें। क्या संसद की कार्यवाही और प्रणाली यही है? गृहमंत्री के वक्तव्य का विरोध करना और बस एक जवाब ही सुनना, यह राहुल गांधी की जिद और अहंकार हो सकता है। सदन की प्रक्रिया तो स्पीकर तय करते हैं। उस संदर्भ में कार्य मंत्रणा समिति (बीएसी) में निर्णय लिया जाता है, जिसमें लगभग सभी प्रमुख दलों के प्रतिनिधि होते हैं। गृहमंत्री से भी अपेक्षा थी कि विपक्ष सुनता या गैर-हाजिर रहता अथवा हंगामा मचता रहता, उन्हें अपना वक्तव्य देना चाहिए था, ताकि वह संसद के रिकॉर्ड में दर्ज हो जाता। यही देशहित था। संसद में केवल हंगामेबाजी हो और जनहित के मसलों पर कोई चर्चा ही न हो, तो यह लोकतंत्र को मजबूत नहीं बनाएगा। हर सियासी दल के सांसदों को जनता के मसले संसद में उठाने चाहिएं तथा सरकार पर उनके समाधान के लिए दबाव बढ़ाना चाहिए। तभी लोकतंत्र मजबूत होगा।

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