सरकार के जीवन में 100 दिन बहुत लंबा समय नहीं होता। इतने कम समय में किसी राज्य की पूरी तस्वीर बदल भी नहीं सकती। लेकिन 100 दिन यह बताने के लिए पर्याप्त होते हैं कि सरकार की नीयत क्या है, नीति क्या है और दिशा क्या है। पश्चिम बंगाल की नई सरकार के पहले 100 दिन इसी कसौटी पर देखे जाने चाहिएं। इन 100 दिनों की सबसे बड़ी उपलब्धि केवल सरकारी फैसलों की लंबी सूची नहीं है। सबसे बड़ा परिवर्तन बंगाल के वातावरण में दिखाई देता है।
भय की दीवार टूटी : बंगाल लंबे समय तक राजनीतिक हिंसा, टकराव और भय की खबरों से पहचाना जाता रहा। गांव से शहर तक राजनीति जीवन के हर हिस्से में मौजूद थी। राजनीतिक पहचान कई बार व्यक्ति की सुरक्षा, अवसर और अधिकारों पर भी भारी पड़ती थी। नई सरकार के सामने पहली चुनौती इसी वातावरण को बदलने की थी। पहले 100 दिनों में सरकार ने स्पष्ट संदेश दिया कि कानून का शासन होगा। राजनीतिक संरक्षण कानून से बड़ा नहीं होगा। इस संदेश का मनोवैज्ञानिक असर बहुत गहरा है। लोकतंत्र का अर्थ है-बिना भय अपनी बात कहना। अपनी पसंद की राजनीति करना। प्रशासन के सामने शिकायत रखना। व्यापार करना। नौकरी करना। अपने परिवार के साथ सम्मान से जीना। जब नागरिक के मन से डर निकलता है, तभी लोकतंत्र मजबूत होता है।
बंगाल में इसकी शुरुआत दिखाई दे रही है। असली परिवर्तन तब होता है, जब शासन की कार्य संस्कृति बदलती है। इन 100 दिनों में सरकार ने प्रशासन को स्पष्ट संकेत दिया है कि अब जवाबदेही सर्वोपरि है। फैसले समय पर हों। जनता की शिकायतें सुनी जाएं। योजनाएं कागज से निकलकर जमीन तक पहुंचें। सरकारी कार्यालय में सामान्य नागरिक को सम्मान मिले। फैसले लेने होंगे। परिणाम देना होगा। फाइलों को चलना होगा। योजनाओं को धरातल पर उतरना होगा। शासन को जनता के दरवाजे तक पहुंचना होगा। सरकार ने शुरुआती 100 दिनों में स्वास्थ्य, रोजगार, महिला कल्याण, सीमा सुरक्षा और केंद्र-राज्य सहयोग जैसे क्षेत्रों में कई महत्वपूर्ण कदम उठाकर अपनी प्राथमिकताएं स्पष्ट कर दी हैं।
इलाज की चिंता से राहत : नई सरकार के महत्वपूर्ण निर्णयों में आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना को पश्चिम बंगाल में लागू करना प्रमुख है। इससे पात्र परिवारों के लिए सालाना 5 लाख रुपए तक के अस्पताल उपचार का रास्ता खुला है। इस योजना की बड़ी ताकत इसकी पोर्टेबिलिटी है। बंगाल का पात्र व्यक्ति देश के दूसरे हिस्से में भी सूचीबद्ध अस्पताल में इसका लाभ ले सकता है। इसलिए यह फैसला केवल एक योजना लागू करने का नहीं, यह आम परिवार को स्वास्थ्य सुरक्षा और मानसिक भरोसा देने का फैसला है।
सीमा सुरक्षा पर स्पष्ट नीति : पश्चिम बंगाल की बंगलादेश के साथ लंबी अंतर्राष्ट्रीय सीमा है। इसलिए सीमा सुरक्षा यहां केवल एक प्रशासनिक विषय नहीं है। इसका सीधा संबंध राष्ट्रीय सुरक्षा, घुसपैठ, तस्करी, कानून-व्यवस्था और सीमावर्ती नागरिकों की सुरक्षा से है। नई सरकार ने पहली कैबिनेट बैठक में सीमा पर बाड़ लगाने के लिए बी.एस.एफ. को आवश्यक लंबित भूमि उपलब्ध कराने की दिशा में निर्णय लिया। यह एक राजनीतिक और प्रशासनिक संदेश भी था-राष्ट्रीय सुरक्षा पर राजनीति नहीं होगी। केंद्र और राज्य मिलकर काम करेंगे। सुरक्षा एजैंसियों को सहयोग मिलेगा। सीमा सुरक्षित होगी तो गांव सुरक्षित होंगे। गांव सुरक्षित होंगे तो बंगाल सुरक्षित होगा।
टकराव नहीं, सहयोग : बंगाल ने लंबे समय तक केंद्र और राज्य के बीच राजनीतिक टकराव देखा है। इसका नुकसान अंतत: जनता को ही उठाना पड़ता है। नई सरकार ने इस रिश्ते की भाषा बदलने का प्रयास किया है। राजनीतिक मतभेद अपनी जगह हो सकते हैं लेकिन विकास के प्रश्न पर दिल्ली और कोलकाता प्रतिद्वंद्वी नहीं, सांझेदार होने चाहिएं। रेलवे हो, राष्ट्रीय राजमार्ग हों, बंदरगाह हों, जलमार्ग हों, औद्योगिक कॉरिडोर हों, सीमावर्ती क्षेत्रों का विकास हो या केंद्रीय कल्याणकारी योजनाएं, बंगाल की गति केंद्र और राज्य के सहयोग से कई गुना बढ़ सकती है।
उद्योग को संदेश-बंगाल आइए : एक समय बंगाल भारत की औद्योगिक शक्ति था। हुगली के किनारे कारखानों की कतार थी। जूट उद्योग था। इंजीनियरिंग थी। कोलकाता देश के व्यापारिक केंद्रों में अग्रणी था। दुर्गापुर और आसनसोल औद्योगिक पहचान रखते थे। हल्दिया का अपना महत्व था। फिर धीरे-धीरे उद्योगों का पलायन शुरू हुआ। उद्योग गया तो रोजगार गया। पूंजी गई। प्रतिभा बाहर गई। सबसे बड़ा नुकसान बंगाल के युवाओं का हुआ।
नई सरकार ने अपने शुरुआती दिनों में उद्योग जगत को एक स्पष्ट संदेश देने का प्रयास किया है-अब बंगाल उद्योग से संघर्ष नहीं करेगा। बंगाल उद्योग का स्वागत करेगा। निवेश केवल घोषणाओं से नहीं आता। निवेशक को भरोसा चाहिए। नीति में स्थिरता चाहिए। कानून-व्यवस्था चाहिए। जमीन और बिजली चाहिए। प्रशासनिक प्रक्रियाओं में सरलता चाहिए। सरकार के सामने अब चुनौती इस भरोसे को वास्तविक निवेश में बदलने की है। बंगाल के प्रत्येक जिले की अपनी ताकत है। कहीं चाय है। कहीं जूट। कहीं मत्स्य उत्पादन। कहीं हस्तशिल्प। कहीं पर्यटन। कहीं कृषि। कहीं उद्योग की पुरानी विरासत। हर जिले की पहचान को रोजगार से जोडऩा होगा।
बंगाल ने बीते वर्षों में महिलाओं के विरुद्ध अपराध की कई ऐसी घटनाएं देखीं, जिन्होंने पूरे देश को विचलित किया। नई सरकार ने महिला सुरक्षा को अपनी प्राथमिकताओं में रखा है। यह निरंतर चलने वाली जिम्मेदारी है। बंगाल की बेटी के मन से भय पूरी तरह मिटना चाहिए। वह रात में निर्भय होकर घर लौट सके। छात्रा निशिं्चत होकर कॉलेज जा सके। पीड़ित महिला थाने में बिना किसी दबाव के शिकायत दर्ज करा सके। यही सुशासन की असली परीक्षा होगी।
भरोसा सबसे बड़ी पूंजी : सरकार की सबसे बड़ी पूंजी उसका बजट नहीं होता, उसकी सबसे बड़ी पूंजी होती है भरोसा। जनता का सरकार पर भरोसा, उद्योग का व्यवस्था पर भरोसा, निवेशक का नीति पर भरोसा, युवा का अपने भविष्य पर भरोसा, महिला का कानून पर भरोसा। इन 100 दिनों में यदि कोई एक परिवर्तन सबसे अधिक महसूस किया जा रहा है तो वह इसी भरोसे की वापसी है। इसे हर बार आंकड़ों में नहीं मापा जा सकता। यह बाजार की बातचीत में दिखाई देता है। उद्योग जगत की उत्सुकता में दिखता है। नौजवान की उम्मीद में महसूस होता है। सरकारी तंत्र के बदले व्यवहार में नजर आता है। राज्य तभी आगे बढ़ता है, जब नागरिक को विश्वास हो कि उसका आने वाला कल आज से बेहतर होगा। सरकार के सामने अपेक्षाएं बहुत बड़ी हैं लेकिन अपेक्षाएं बड़ी इसलिए हैं क्योंकि बंगाल की क्षमता भी असाधारण है। इन 100 दिनों में बंगाल की पूरी तस्वीर नहीं बदली है। लेकिन तस्वीर बदलने का विश्वास जरूर पैदा हुआ है। भय से भरोसे तक की यह यात्रा ही नए बंगाल की शुरुआत है।-के.के. उपाध्याय



















