किसी गीत में रखा ही क्या है? मधुर है, लयात्मक है और लोकप्रिय है। लेकिन यदि वह ‘वंदे मातरम्’ हो तो बात इतनी सरल नहीं रह जाती। यह गीत अब राष्ट्रीय गीत कम और भाजपा-विपक्ष की राजनीतिक नोकझोंक में एक राजनीतिक हथियार अधिक बन गया है। भाजपा कांग्रेस पर आरोप लगा रही है कि उसने इसके गायन को केवल पहले 2 अंतरों तक सीमित रखकर इसका अपमान किया है। साथ ही कांग्रेस को उसकी धुर-विरोधी, ‘राष्ट्र-विरोधी’, ‘नई मुस्लिम लीग’ और तुष्टीकरण की राजनीति का अनुयायी बताया जा रहा है।

कांग्रेस का कहना है कि उसका रुख इतिहास पर आधारित है। 1937 में सार्वजनिक समारोहों में केवल पहले 2 अंतरों के गायन का निर्णय लिया गया था। दोनों पक्षों का यह पूरा विवाद राजनीतिक रंगमंच का एक उत्कृष्ट उदाहरण बन गया है। इसकी शुरुआत बजट सत्र में संसद द्वारा राष्ट्रीय सम्मान अपमान निवारण (संशोधन) विधेयक, 2026 पारित किए जाने से हुई। इस विधेयक में ‘वंदे मातरम्’ के अपमान को 3 वर्ष तक के कारावास से दंडनीय बनाया गया है और इसे राष्ट्रीय गान के समान दर्जा दिया गया है। याद कीजिए, इसके पहले 2 अंतरे मातृभूमि की वंदना करते हैं और उनमें स्पष्ट रूप से कोई हिंदू धार्मिक संदर्भ नहीं है। लेकिन बाद के अंतरों में ङ्क्षहदू धार्मिक प्रतीक उभरते हैं। मातृभूमि को दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती जैसी देवियों से जोड़ा गया है। 1937 में नेहरू के नेतृत्व वाली कांग्रेस कार्यसमिति द्वारा एक प्रस्ताव पारित करके ‘वंदे मातरम्’ के केवल पहले 2 अंतरे गाने का निर्णय लिया गया। इसके पीछे मुस्लिम नेताओं की उन आपत्तियों को ध्यान में रखा गया था, जो बाद के अंतरों में मौजूद धार्मिक प्रतीकों को लेकर थीं। 

फिर इतना हंगामा क्यों? क्या भाजपा वर्तमान चुनौतियों से ध्यान भटकाने के लिए एक सांस्कृतिक प्रतीक को राजनीतिक हथियार बना रही है? क्या वह राष्ट्रीय प्रतीकों और विरासत पर अपना दावा स्थापित करना चाहती है? या कांग्रेस को ‘हिंदू-विरोधी’, ‘तुष्टीकरणवादी’ और देशभक्ति से रहित साबित करने की कोशिश कर रही है? हाल ही में नागपुर में भाजपा-नियंत्रित स्थानीय निकाय द्वारा भी केवल 2 अंतरे गाए जाने से उसकी नैतिक श्रेष्ठता का दावा कुछ कमजोर ही हुआ है। दूसरी ओर, क्या कांग्रेस समावेशी राष्ट्रवाद की अवधारणा का बचाव कर रही है या चुपचाप अपने मुस्लिम वोट-बैंक की रक्षा कर रही है? यदि उसका मानना है कि 1937 का समझौता आज भी प्रासंगिक है और बाद के अंतरे एक समावेशी आधुनिक धर्मनिरपेक्ष गणराज्य के लिए धार्मिक दृष्टि से अनुपयुक्त हैं, तो उसे यह स्पष्ट करना चाहिए कि ऐसा क्यों है। वह केवल इतिहास की आड़ लेकर यह नहीं कह सकती कि उसके उस निर्णय के स्पष्ट समकालीन चुनावी निहितार्थ नहीं हैं।

यह गीत आधुनिक राजनीतिक घोषणापत्र के रूप में मुसलमानों के विरुद्ध नहीं लिखा गया था। फिर सवाल यह है कि क्या किसी राष्ट्रीय प्रतीक को उसके ऐतिहासिक समग्र रूप में देखा जाना चाहिए, या बाद के अंतरों में मौजूद धार्मिक प्रतीक उन्हें धार्मिक रूप से विविध भारत के लिए अनुपयुक्त बना देते हैं? और आखिर इसे देशभक्ति की परीक्षा का विषय क्यों बनाया जाए? भाजपा के लिए सभी 6 अंतरों का गायन राष्ट्रवादी प्रामाणिकता और राष्ट्रीय गौरव की कसौटी बन गया है। कांग्रेस के लिए 2 अंतरों तक सीमित रहना अपनी ऐतिहासिक विरासत को बनाए रखने और मुस्लिम भावनाओं से सीधे टकराव से बचने का माध्यम है। और यहीं असली त्रासदी छिपी है। जो गीत कभी भारतीयों को औपनिवेशिक शासन के खिलाफ एकजुट करता था, आज उसी का इस्तेमाल भारतीयों को एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा करने के लिए किया जा रहा है। 

नागरिकों के लिए ‘वंदे मातरम्’ के सभी 6 अंतरों को सीखने, समझने और यहां तक कि गाने में भी कोई बुराई नहीं है। इतिहास को केवल इसलिए साफ-सुथरा बनाकर पेश नहीं किया जाना चाहिए कि उसके कुछ हिस्से हमें असहज करते हैं। लेकिन राज्य को भी 19वीं सदी की धार्मिक प्रतीकों से युक्त रचना को देशभक्ति की अनिवार्य कसौटी नहीं बना देना चाहिए। देशभक्ति इस बात से नहीं मापी जा सकती कि कोई व्यक्ति कितनी ऊंची आवाज में गीत गाता है। इसी तरह धर्मनिरपेक्षता का अर्थ यह भी नहीं हो सकता कि हिंदू प्रतीकों से युक्त हर अभिव्यक्ति को राष्ट्रीय जीवन से हटा दिया जाए। भारत की विशेषता हमेशा से यही रही है कि वह इन दोनों को साथ लेकर चलने की क्षमता रखता है।

इसलिए ‘वंदे मातरम्’ के सभी 6 अंतरों को उनके ऐतिहासिक संदर्भ में पढ़ाया और सम्मानित किया जाना चाहिए। राजकीय समारोहों में सरकार द्वारा निर्धारित प्रोटोकॉल के अनुसार यह तय होना चाहिए कि कौन-सा संस्करण गाया जाए। लेकिन राजनीतिक दलों को अपने कार्यक्रमों में वे कौन-से अंतरे गाते हैं, इसे लेकर निष्ठा की परीक्षा देने के लिए बाध्य नहीं किया जाना चाहिए, जब तक कि संसद या कोई संवैधानिक प्राधिकरण इसके संबंध में कोई अन्य व्यवस्था न करे।

विडंबना बेहद असहज करने वाली है। जो गीत कभी अंग्रेजी शासन के विरुद्ध प्रतिरोध का प्रतीक था, उसे आज उसे हिंदू-मुस्लिम द्वंद्व में घसीट लिया गया है। दोनों दलों ने ‘वंदे मातरम्’ को सांप्रदायिकता बनाम धर्मनिरपेक्षता के मुद्दे में बदल दिया है। यह देशभक्ति गीत आज इतिहास, पहचान और समकालीन राजनीति के चौराहे पर खड़ा है। यह इस बात पर निर्भर करेगा कि हमारे नेता इसके साथ किस तरह संवाद करते हैं कि यह विविधतापूर्ण देश को एकजुट करने वाले राष्ट्रीय प्रतीकों पर विचार करने का अवसर बनता है या फिर दलगत राजनीतिक टकराव का एक और रणक्षेत्र।-पूनम आई. कौशिश

Advertisement Carousel
Share.

Comments are closed.

chhattisgarhrajya.com

ADDRESS : GAYTRI NAGAR, NEAR ASHIRWAD HOSPITAL, DANGANIYA, RAIPUR (CG)
 
MOBILE : +91-9826237000
EMAIL : info@chhattisgarhrajya.com
August 2026
M T W T F S S
 12
3456789
10111213141516
17181920212223
24252627282930
31