25 साल पहले अमेरिका को एक बड़ा सबक मिला था। अब फिर वही गलती अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप दोहरा रहे हैं। ऐसे में भारत को अमेरिकी दबाव में झुकने के बजाय अपने हितों को प्राथमिकता देना जारी रखना चाहिए। हालांकि, भारत को अमेरिका के साथ रचनात्मक बातचीत भी जारी रखनी चाहिए। 2001 का अनुभव बताता है कि गंभीर मतभेदों के दौर के बाद भी लगातार बातचीत से रिश्तों को फिर से बनाने और टकराव से बाहर निकलने का रास्ता बनाने में मदद मिल सकती है।
तारीख: 22 सितंबर, 2001 और आज 25 साल बाद फिर वही तारीख 22 सितंबर, 2026। 25 साल पहले अमेरिका की तरफ से लगाई गई पाबंदियों का सामना करने के बाद नई दिल्ली ने जीत हासिल की थी। यह कहानी 1990 के दशक के आखिर की है, जब भारत तेज़ी से बदलाव के दौर से गुजर रहा था। देश अपनी लंबे समय से रुकी हुई अर्थव्यवस्था को तेजी से उदार बना रहा था और दुनिया के लिए अपने दरवाज़े खोल रहा था। मजबूत विदेशी निवेश और IT व सर्विस सेक्टर की ग्रोथ की वजह से आर्थिक विकास तेजी से हो रहा था।
ग्लोबल स्तर पर, नई दिल्ली का कभी पक्का दोस्त रहा USSR यानी पूर्व सोवियत संघ इतिहास बन चुका था और भारत पश्चिम, खासकर अमेरिका के साथ रिश्ते सुधारने की कोशिश कर रहा था। आज 25 साल बाद अमेरिका फिर वही गलती दोहराने की कोशिश कर रहा है, जो कभी अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने की थी। मौजूदा अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ‘लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शंस बिल’ (प्रतिबंध विधेयक) पर हस्ताक्षर करके उसे कानून बना दिया है।
इससे उन्हें रूस के साथ व्यापार करने वाले देशों पर 100% तक टैरिफ लगाने का अधिकार मिल गया है। इस कदम से भारत के सामने अपने सबसे बड़े एक्सपोर्ट मार्केट में व्यापार से जुड़ी गंभीर रुकावटों का खतरा पैदा हो गया है, क्योंकि भारत अपने कच्चे तेल के आयात का आधे से ज्यादा हिस्सा रूस से ही मंगाता है। हालांकि, ट्रंप को अपने पूर्ववर्ती राष्ट्रपति जॉज डब्ल्यू बुश से सबक लेना चाहिए। ट्यूजडे ट्रीविया में जानते हैं वो दिलचस्प कहानी।
वाजपेयी का ऐलान और अमेरिका को लग गई ‘आग’
- 11 मई 1998 को दोपहर 3:45 बजे राजस्थान के पोखरण में भारतीय सेना की फायरिंग रेंज में ‘ऑपरेशन शक्ति’ के तहत तीन भूमिगत परमाणु परीक्षण किए गए। इसके कुछ ही समय बाद, तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने घोषणा की कि भारत अब पूरी तरह से परमाणु शक्ति संपन्न देश बन गया है। ‘ऑपरेशन शक्ति’ को ‘ऑपरेशन पोखरण-II’ भी कहा जाता है।
- लेकिन इन परीक्षणों की खबर से भले ही ‘बुद्ध मुस्कुराए’ हों, मगर वॉशिंगटन डीसी में ऐसा नहीं हुआ। भारत के परमाणु क्लब में शामिल होने की खबर से अमेरिका पूरी तरह हैरान रह गया और उसकी प्रतिक्रिया अविश्वास और गुस्से वाली थी। अमेरिकी विदेश विभाग के रिकॉर्ड के अनुसार, तत्कालीन राष्ट्रपति क्लिंटन ने कहा था कि वे ‘परमाणु परीक्षणों से बहुत परेशान’ हैं और ये परीक्षण ‘एक सुरक्षित 21वीं सदी बनाने’ के लक्ष्य के खिलाफ हैं।
भारत का यह कदम न केवल इस क्षेत्र की स्थिरता के लिए खतरा है, बल्कि यह बड़े पैमाने पर तबाही मचाने वाले हथियारों के प्रसार को रोकने की मजबूत अंतरराष्ट्रीय सहमति को भी सीधे तौर पर चुनौती देता है।
बिल क्लिंटन, 1998 में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति
13 मई, 1998 को क्लिंटन ने भारत पर लगा दी पाबंदी
13 मई 1998 को बिल क्लिंटन ने अमेरिकी कांग्रेस को यह जानकारी दी कि उन्होंने ‘आर्म्स एक्सपोर्ट कंट्रोल एक्ट’ (जिसे ‘ग्लेन अमेंडमेंट एक्ट’ भी कहा जाता है) की धारा 102 के तहत भारत पर प्रतिबंध लगा दिए हैं। विदेश विभाग के रिकॉर्ड के अनुसार, इन प्रतिबंधों का मकसद नई दिल्ली को अन्य बातों के अलावा, ‘मिसाइलों या परमाणु हथियारों को तैनात या उनका परीक्षण न करने’ और ‘परमाणु हथियारों के लिए विखंडनीय सामग्री (fissile material) का उत्पादन बंद करने’ के लिए मजबूर करना था।
13 मई 1998 को बिल क्लिंटन ने अमेरिकी कांग्रेस को यह जानकारी दी कि उन्होंने ‘आर्म्स एक्सपोर्ट कंट्रोल एक्ट’ (जिसे ‘ग्लेन अमेंडमेंट एक्ट’ भी कहा जाता है) की धारा 102 के तहत भारत पर प्रतिबंध लगा दिए हैं।

अमेरिका ने अपने यहां से भेजी गई सारी मदद रोक दी
- 1998 में अमेरिका द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों के कारण मानवीय और खाद्य सहायता को छोड़कर अमेरिका से मिलने वाली बाकी सभी विदेशी मदद बंद हो गई। अमेरिकी सरकार के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, इससे आर्थिक विकास के लिए मिलने वाली लगभग 21 मिलियन डॉलर की सहायता और ग्रीनहाउस गैसों को कम करने के कार्यक्रम के लिए तय 6 मिलियन डॉलर की राशि रुक गई।
- अमेरिका ने वर्ल्ड बैंक और IMF जैसे वैश्विक संस्थानों से मिलने वाले लोन का भी विरोध किया, जिससे भारत के इंफ्रास्ट्रक्चर और विकास प्रोजेक्ट्स के लिए 3-4 बिलियन डॉलर की फंडिंग रुक गई। वॉशिंगटन ने अमेरिकी बैंकों और सरकारी एजेंसियों को निर्देश दिया कि वे नई दिल्ली को कोई भी नया लोन या क्रेडिट लाइन न दें, सिवाय उन मामलों के जिनमें खाद्य और कृषि उत्पादों की खरीद होनी हो।
भारत के परमाणु परीक्षणों के चलते अमेरिका ने वर्ल्ड बैंक और IMF जैसे वैश्विक संस्थानों से मिलने वाले लोन का भी विरोध किया, जिससे भारत के इंफ्रास्ट्रक्चर और विकास प्रोजेक्ट्स के लिए 3-4 बिलियन डॉलर की फंडिंग रुक गई।
रिपोर्ट
तीन साल में ही जॉर्ज बुश ने सुधार ली थी अमेरिका की गलती
- 1998 में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन की सरकार ने नई दिल्ली पर पाबंदियों का एक पैकेज लागू किया। इसके तहत लगभग सभी तरह की विदेशी मदद, आर्थिक सहायता, सैन्य सहयोग और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर पर रोक लगा दी गई, ताकि भारत के परमाणु शक्ति बनने के इरादों को रोका जा सके। लेकिन अगर इन पाबंदियों का मकसद नई दिल्ली को वॉशिंगटन की बात मानने पर मजबूर करना था, तो वे नाकाम रहीं। 22 सितंबर 2001 को राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने अपने पूर्ववर्ती राष्ट्रपति द्वारा लगाई गई पाबंदियों को हटा दिया।
- प्रतिबंधों का भारत पर कोई खास असर नहीं पड़ा। बल्कि समय के साथ भारत और मजबूत हुआ। 1998 में, भारत बड़े पैमाने पर आर्थिक उदारीकरण के दौर से गुजर रहा था। सुधारों के जरिए अर्थव्यवस्था को ज्यादा विदेशी निवेश और अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए खोला जा रहा था। यह बदलाव 1991 के भुगतान संतुलन संकट (balance-of-payments crisis) के बाद शुरू हुआ था, जब भारत ने बड़े संरचनात्मक सुधार करते हुए IMF और विश्व बैंक जैसे संस्थानों से काफी फ़डिंग हासिल की थी।
- इस तरह, अमेरिकी प्रतिबंधों का कुछ असर तो हुआ। अगले साल कारगिल युद्ध के दौरान सैन्य उपकरणों की बिक्री और फंडिंग पर रोक का असर महसूस किया गया। साथ ही, विश्व बैंक और IMF के जरिए फंडिंग रुकने से कई बुनियादी ढांचे और यहां तक कि सैन्य प्रोजेक्ट्स (जैसे HAL तेजस प्रोजेक्ट) में भी देरी हुई। उस साल अमेरिका को होने वाले निर्यात में भी गिरावट आई।
अमेरिकी पाबंदियों के बावजूद भारत और मजबूत हुआ
- मार्केट में सुधारों की वजह से 1990 के दशक के बीच में GDP ग्रोथ औसतन 6.5% रही और जब पाबंदियां लगाई गईं, तब अर्थव्यवस्था लगभग 5.8% पर स्थिर थी। 2003 तक, यानी US की पाबंदियों के सिर्फ 5 साल बाद, भारत की GDP सालाना 7.8% की दर से बढ़ रही थी। दुनिया के साथ भारत के व्यापारिक संबंध मजबूत बने रहे।
- इस दौरान नई दिल्ली ने अपने व्यापारिक साझेदारों में भी विविधता लाई। US ने अरबों डॉलर के टेक्सटाइल और रत्न आयात करना जारी रखा। साथ ही मशीनरी का निर्यात भी किया। यूरोपियन यूनियन ने औद्योगिक उपकरण निर्यात करने के बदले टेक्सटाइल, चमड़ा और रसायन आयात किए। रूस ने रक्षा उपकरण सप्लाई किए और भारत से दवाएं और चाय खरीदीं। UAE और सऊदी अरब ने तेल का निर्यात किया, जबकि रत्न और चावल आयात किए। जापान और चीन भी सक्रिय साझेदार बने रहे और इलेक्ट्रॉनिक्स, टेक्सटाइल और रसायनों का व्यापार किया।
- असल में, तत्कालीन वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा ने बाद में 2001 में समाचार एजेंसी PTI से कहा था, ‘जहां तक खुद भारतीय अर्थव्यवस्था का सवाल है, तो कुछ रक्षा उपकरणों की सप्लाई को छोड़कर, इन पाबंदियों का कोई मतलब नहीं था।’
भारत ने अमेरिका के साथ बातचीत जारी रखी, संबंध सुधारे
- इससे भी अहम बात यह है कि प्रतिबंध लगने के बावजूद भारत ने अमेरिका के साथ बातचीत जारी रखी, जिससे दोनों देशों के रिश्तों में धीरे-धीरे सुधार हुआ। अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन, जिन्होंने सबसे पहले ये प्रतिबंध लगाए थे, 2000 में द्विपक्षीय दौरे पर भारत आए। 1978 के बाद किसी अमेरिकी राष्ट्रपति का भारत का यह पहला दौरा था।
- आखिरकार, 22 सितंबर 2001 को अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने प्रतिबंध हटा दिए, जिससे आर्थिक और सैन्य मदद का रास्ता खुल गया। 9/11 के बाद आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक लड़ाई में भारत के सहयोग से नई दिल्ली और वाशिंगटन डीसी के रिश्ते समय के साथ और मजबूत होते गए। अंत में, 2008 में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और राष्ट्रपति बुश के बीच भारत-अमेरिका परमाणु समझौते पर हस्ताक्षर हुए, जिसके बाद वाशिंगटन ने आखिरकार भारत को एक जिम्मेदार परमाणु शक्ति के रूप में मान्यता दी।
अमेरिका का बड़ा कारोबारी पार्टनर है भारत
- करीब 25 साल बाद भारत और अमेरिका पहले से कहीं ज्यादा एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। अमेरिका भारतीय निर्यात का सबसे बड़ा बाजार बना हुआ है। वित्त वर्ष 2025-26 में कुल निर्यात का 19.78% हिस्सा अमेरिका को गया, जबकि 2025 में दोनों देशों के बीच व्यापार का अनुमानित मूल्य 239.6 अरब डॉलर तक पहुंच गया।
- निर्यात का यही विशाल बाजार अब अमेरिकी प्रतिबंधों के खतरे में है। अगर 100% टैरिफ (आयात शुल्क) लगाया जाता है, तो अमेरिकी बाजार में भारतीय सामान पूरी तरह से प्रतिस्पर्धा से बाहर हो जाएगा। ऐसा इसलिए है क्योंकि नई दिल्ली अपने 1.4 अरब नागरिकों के लिए ऊर्जा सुरक्षा को प्राथमिकता देती है, भले ही इसके लिए रूस से कच्चा तेल खरीदना पड़े।



















