कर्नाटक की राजनीति में एक बार फिर आरएसएस की भूमिका को लेकर बहस छिड़ गई है। इस बार कांग्रेस नेता और कर्नाटक सरकार में मंत्री प्रियंक खरगे ने मोहन भागवत के ‘सत्ता परिवर्तन’ वाले बयान को लेकर सवाल उठाए हैं। उन्होंने सीधा सवाल किया कि चुनावी निष्पक्षता आखिर कहां है, और संघ चुनावों में इतना सक्रिय क्यों दिख रहा है। इसके साथ ही चुनाव आयोग की विश्वसनीयता से लेकर मतदाता सूची तक खरगे ने कई मुद्दे उठाए, जिससे राजनीतिक माहौल फिर गर्म हो गया।
चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर भी साधा निशाना
खरगे ने बेंगलुरु में पत्रकारों से बात करते हुए कहा कि आज के हालात में सत्ता बदलने की बातें करने से पहले लोकतांत्रिक व्यवस्था पर खुलकर चर्चा करनी चाहिए। उनका आरोप था कि निर्वाचन आयोग, मुख्य निर्वाचन आयुक्त और यहां तक कि मतदाता सूची की प्रक्रिया पर सरकार का दबाव बढ़ गया है। हालांकि, उन्होंने अपने आरोपों के समर्थन में कोई ठोस सबूत नहीं दिखाया।
प्रियंक ने फॉर्म-6 और फॉर्म-7 का भी जिक्र किया, जिन्हें वोटर लिस्ट में नाम जोड़ने या हटाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। उन्होंने पूछा कि जब विपक्ष लगातार चुनावी प्रक्रिया को लेकर चिंता जता रहा है, तो निष्पक्ष चुनाव का भरोसा जनता में कैसे जगेगा? उनके मुताबिक, मुख्य निर्वाचन आयुक्त को न्यायिक संरक्षण जरूरी है, ताकि उनकी निष्पक्षता पर संदेह न रहे।
RSS की भूमिका पर क्यों भड़के प्रियंक खरगे?
फिर उन्होंने मोहन भागवत से सीधे सवाल किए आखिर संघ को सिर्फ एक सांस्कृतिक संगठन समझा जाए या राजनीतिक संगठन भी माना जाए? खरगे का तर्क है कि आरएसएस के लोग सिर्फ संस्कृति पर ही नहीं, अर्थव्यवस्था, रक्षा नीति, विदेश नीति और यहां तक कि पाकिस्तान से रिश्तों तक पर सुविचारित राय पेश करते हैं। ऐसे में संघ को अपनी भूमिका खुलकर स्पष्ट करनी चाहिए। उन्होंने मांग कर दी कि अगर संघ राजनीति में इतनी सक्रियता रखना चाहता है, तो उसे खुद को राजनीतिक संगठन के तौर पर दर्ज कराना चाहिए, न कि सिर्फ सांस्कृतिक संस्था कहकर बचना चाहिए।
सत्ता परिवर्तन के बयान ने बढ़ाई राजनीतिक गर्मी
मोहन भागवत की टिप्पणी पर खरगे की प्रतिक्रिया ने सत्ता परिवर्तन, लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वतंत्रता और राजनीतिक संगठनों की जवाबदेही जैसे मुद्दों को फिर चर्चा में ला दिया है। हालांकि, RSS की संगठनात्मक पहचान और उसके राजनीतिक प्रभाव पर बहस नई नहीं है। भारतीय राजनीति में संघ की भूमिका को लेकर समर्थक और आलोचक लंबे समय से अलग-अलग दृष्टिकोण रखते आए हैं।
इस पूरे विवाद में सबसे अहम सवाल यही है कि चुनावी संस्थाओं पर भरोसा कैसे मजबूत किया जाए और राजनीतिक आरोपों की जांच तथ्यों के आधार पर किस तरह हो। फिलहाल, खरगे के बयान ने कर्नाटक से निकलकर राष्ट्रीय राजनीति तक बहस को हवा दे दी है।



















