रायपुर। वैदिक आध्यात्म परंपरा प्राणधार श्रध्ये मां भगवती के उपासक एवं भगवताचार्य और त्रिकालदर्शी (चाउर वाले बाबा) की उपाधि से नवाजे गये गुरुजी श्रीश्री पंडित नरेन्द्र नयन शास्त्री जी ने अपने शिष्यों को मौन अमावस्या की विशेषताएं एवं महत्व के बारे में विस्तारपूर्वक बताया। जानकारी देते हुए गुरुजी ने बताया कि मौनी अमावस्या के दिन सूर्य तथा चंद्रमा गोचरवश मकर राशि में आते हैं, इसलिए यह दिन एक संपूर्ण शक्ति से भरा हुआ और पावन अवसर बन जाता है। इस दिन मनु ऋषि का जन्म भी माना जाता है, इसलिए भी इस अमावस्या को मौनी अमावस्या कहा जाता है। मकर राशि, सूर्य तथा चंद्रमा का योग इसी दिन होता है अत: इस अमावस्या का महत्व और बढ़ जाता है। इस दिन पवित्र नदियों व तीर्थ स्थलों में स्नान करने से पुण्य फलों की प्राप्ति होती है। गुरुजी ने बताया कि मौनी अमावस्या के दिन व्यक्ति विशेष को मौन व्रत रखने का भी विधान रहा है। इस व्रत का अर्थ है, व्यक्ति को अपनी इंद्रियों को अपने वश में रखना चाहिए। धीरे-धीरे अपनी वाणी को संयत करकेे अपने वश में करना ही मौन व्रत है। कई लोग इस दिन से मौन व्रत रखने का प्रण करते हैं। वह व्यक्ति विशेष पर निर्भर करता है कि कितने समय के लिए वह मौन व्रत रखना चाहता है। कई व्यक्ति एक दिन, कोई एक महीना और कोई व्यक्ति एक वर्ष तक मौन व्रत धारण करने का संकल्प कर सकता है। इस दिन मौन व्रत धारण करके ही स्नान करना चाहिए। वाणी को नियंत्रित करने के लिए यह शुभ दिन होता है। मौनी अमावस्या को स्नान आदि करने के बाद मौन व्रत रखकर एकांत स्थल पर जाप आदि करना चाहिये। इससे चित्त की शुद्धि होती है। आत्मा का परमात्मा से मिलन होता है। मौनी अमावस्या के दिन व्यक्ति स्नान तथा जप आदि के बाद हवन, दान आदि कर सकता है। ऐसा करने से पापों का नाश होता है। इसदिन गंगा स्नान करने से अश्वमेघ यज्ञ करने के समान फल मिलता है। माघ मास की अमावस्या तिथि और पूर्णिमा तिथि दोनों का ही महत्व इस मास में होता है। इस मास में यह दो तिथियां पर्व के समान मानी जाती है। समुद्र मंथन के समय देवताओं और असुरों के मध्य संघर्ष में जहां-जहां अमृत गिरा था उन स्थानों पर स्नान करना पुण्य कर्म माना जाता है। गुरुजी ने बताया कि मौनी अमावस्या के दिन व्यक्ति को अपनी सामथ्र्य के अनुसार दान, पुण्य तथा जाप करना चाहिये। यदि किसी व्यक्ति की सामथ्र्य त्रिवेणी के संगम अथवा अन्य किसी तीर्थ स्थान पर जाने की नहीं है, तब उसे अपने घर में ही प्रात:काल उठकर दैनिक कर्मों से निवृत्त होकर स्नान आदि करना चाहिये अथवा घर के समीप किसी भी नदी या नहर में स्नान कर सकते हैं। पुराणों के अनुसार इस दिन सभी नदियोंं का जल गंगाजल के समान हो जाता हैं। स्नान करते हुए मौन धारण करें और जाप करने तक मौन व्रत का पालन करें। आपको बता दें कि सम्मानित श्री गुरुजी हिंदू संस्कृति एवं वैदिक सनातन धर्म के व्यापक प्रचार-प्रसार हेतु पूरे देश में भागवत कथा ज्ञान यज्ञ का प्रसाद बांट चुके है।

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