आमतौर पर यह माना जाता है कि बड़े चुनाव के पहले जो चुनाव होता है और उसके जो नतीजे होते हैं, वे एक तरह से आने वाले दिनों का आईना होते हैं। लेकिन क्या यह बात उत्तर प्रदेश को लेकर भी कही जा सकती है? यू.पी. में विधानसभा के चुनाव अगले वर्ष शुरुआती महीनों में होने हैं और 29 अक्तूबर को जब विधान परिषद की कुछ सीटों (उत्तर प्रदेश की सिर्फ 11 सीटों के चुनाव हुए थे जबकि कुल सीटें 100 हैं) के चुनाव हुए और उसमें भारतीय जनता पार्टी ने 6 सीटें जीतीं, जबकि समाजवादी पार्टी ने आखिरकार 5 सीटें जीतने में सफलता पा ली। भाजपा के पास पहले भी 6 सीटें थीं लेकिन समाजवादी पार्टी के पास 3 ही सीटें थीं। बाकी 2 सीटें निर्दलीयों के पास थीं, जो इस बार समाजवादी पार्टी ने छीन लीं। इस चुनाव में भाजपा ने भी इन निर्दलीयों की सीटों पर कब्जा जमाने की कोशिश की ही थी लेकिन सफलता मिली समाजवादी पार्टी को।
इस सफलता को कैसे देखा जाए? पहले तो समझते हैं, विधान परिषद के चुनावों को। देश में पहले कई राज्यों में विधान परिषदें थीं। विधानपरिषदों का गठन वैसे ही किया गया था जैसे लोकसभा के साथ राज्यसभा का गठन हुआ था। विधान परिषद को राज्यों का उच्च सदन भी कहा जाता है। संविधान के अनुच्छेद 169 के तहत किसी राज्य में विधान परिषद का सृजन या फिर गठन तभी हो सकता है जब राज्य की विधानसभा अपने विशेष बहुमत से ऐसा करने का प्रस्ताव दे। बीते 5 दशकों में राज्यों की सरकारों ने खर्च कम करने के नाम पर विधान परिषदों को खत्म करने का सिलसिला किया। अब सिर्फ उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में विधान परिषद बची हैं, जबकि 2021 में पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की सरकार ने इसे फिर से बनाने का प्रस्ताव पारित किया था लेकिन संसद से इसे अंतिम मंजूरी लंबित है। पंजाब में भी पहले विधान परिषद थी, जिसे 1970 में समाप्त कर दिया था। विधान परिषद के लिए एक-तिहाई लोगों का चयन विधायक और इतने ही लोगों का चयन स्थानीय निकाय करते हैं, जबकि 1/12 सीटों का चुनाव स्नातक-शिक्षक करते हैं और बाकी लोगों को राज्यपाल मनोनीत करते हैं। हालिया चुनाव यू.पी., बिहार, कर्नाटक और महाराष्ट्र में शिक्षक और स्नातक क्षेत्र से हुआ था।
शिक्षकों-स्नातकों की अलग से मतदाता सूची बनती है। यूं तो यह दलों के आधार पर नहीं होते लेकिन राजनीतिक दल समॢथत होते हैं। अब तो राजनीतिक दल टिकट बांटते हैं। बाकायदा सूची जारी होती है। इस बार भी हुई। चुनाव बैलेट पैपर से होते हैं और प्रिफरेंशियल वोटिंग होती है (राज्यसभा चुनावों की तरह)। कर्नाटक में मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार को बड़ा झटका लगा और कांग्रेस एक भी सीट नहीं ले सकी। एन.डी.ए. को चारों सीटें मिलीं। बिहार में बड़ा उलटफेर दिखा। भाजपा को 3, राजद को 2 तथा जे.डी.यू., जनसुराज व निर्दलीय को 1-1 सीट मिली। महाराष्ट्र में 5 सीटों पर चुनाव हुए और महायुति ने कमाल किया लेकिन अंतिम एक नतीजा आखिरकार कांग्रेस के पक्ष में आ ही गया। नागपुर की यह सीट भाजपा के लिए झटका जरूर माना जा रहा है।
मगर सबसे ज्यादा चर्चा उत्तर प्रदेश विधान परिषद के चुनावों की है। नतीजे बताते हैं कि यह समाजवादी पार्टी के लिए कई मायनों में महत्वपूर्ण और रणनीतिक रूप से बड़े बदलाव लेकर आए। फिलहाल सबसे बड़ी बात यह है कि विधान परिषद में सपा के पास पहले 10 सदस्य थे और यदि पार्टी 3 से कम सीटें जीतती, तो उससे नेता प्रतिपक्ष का पद छिन सकता था। लेकिन अब उसके सदस्यों की संख्या 12 हो जाएगी और उससे बड़ी बात यह है कि उसकी यह जीत ऐसे समय पर आई है, जब उत्तर प्रदेश में चुनाव सिर पर हैं। स्नातक और शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों में उसकी जीत शहरी और शिक्षित मतदाताओं के बीच बढ़ती पकड़ दिखा रही है। लखनऊ और वाराणसी की सीटों पर अखिलेश की पार्टी की जीत भाजपा के लिए खतरा भी है। लखनऊ राजनाथ सिंह का और वाराणसी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का क्षेत्र है। इस जीत पर समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव की पत्नी ङ्क्षडपल यादव का कथन महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश विधान परिषद चुनाव में समाजवादी पार्टी की इस ऐतिहासिक जीत ने परिवर्तन की नींव रख दी है। पी.डी.ए. (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) आधार बना है। डिम्पल कहती हैं कि चुनाव ने समाजवादी पार्टी की पूर्ण बहुमत की सरकार बनने का रास्ता भी साफ कर दिया है।
वैसे भी यह तब है, जब यह दावा किया जा रहा है कि अपनी सरकार की हैट्रिक बनाने के लिए योगी आदित्यनाथ को कोई बहुत दिक्कतें नहीं आने वाली। चुनाव में जीत के लिए 3 आधार होते हैं। परफॉर्मैंस और परसैप्शन, जातिगत गणित और अब वोटरों को लुभाने के लिए सीधे भुगतान। इस काम में भाजपा अपनी तरह से लगी है। परसैप्शन में भाजपा सचमुच बहुत आगे है। कानून-व्यवस्था में सुधार का दावा इस बार भी खूब काम कर रहा है। लुभाने के मामले में भी भाजपा के साथ अच्छाई यह है कि वह पैसों की सीधे डिलीवरी कर रही है। वायदे करने वाले से ज्यादा डिलीवरी करने वाले आगे रहते हैं। हां, पार्टी में एकजुट होकर चुनाव लडऩे और जातिगत समीकरणों को लेकर जरूर कानाफूसी हो रही है। ब्राह्मणों को लेकर भी सवाल हैं। पार्टी में भी कुछ सवाल उठते रहे हैं लेकिन एक बात भी सामने आती रही है-मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ अब लचीले दिखते हैं।
उससे अलग बात यह भी है कि सत्ता से 10 साल से महरूम सपा के सामने कैसे भाजपा संगठन को और अपनी कडिय़ों को मजबूत करती है। वैसे यह बात सही है कि पिछले लोकसभा चुनावों में भाजपा को मात्र 37 सीटें ही मिलीं थीं जबकि सपा को 33 सीटें। तब सपा की सहयोगी कांग्रेस को भी 6 सीटें मिल गई थीं। लेकिन यह सब तब हुआ था, जब संविधान खतरे में है, का नैरेटिव चल गया था। आज की फिजा में यह खतरा नदारद है। फिर भी सपा गद्गद है और होना भी चाहिए। चुनावों में अभी 4 महीने का समय है। देखना होगा कि इन 4 महीनों में कितना परिवर्तन कौन कर पाता है। विधान परिषद में एक खास वर्ग वोट करता है, जबकि विधानसभा चुनाव में सभी। सपा कैसे सबको लुभा पाएगी और भाजपा अपना चुनावी ‘गोंद’ कैसे मजबूत रख सकेगी, कुल गणित यही है। विधान परिषद का चुनाव तो सिर्फ माहौल बनाने का एक कारण हो सकता है। इससे आने वाले नतीजे नहीं पता लगते।-हम, देश के लोग अकु श्रीवास्तव



















