मोदी सरकार सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को मिली कानूनी छूट को खत्म करने पर विचार कर रही है। केंद्र सरकार के भीतर एक बड़े तबके का यह मानना है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म अब सिर्फ जानकारी पहुंचाने के माध्यम नहीं रहे हैं। यह कंपनियां एल्गोरिदम से तय करती हैं कि यूजर्स को क्या दिखेगा क्या नहीं। यह एक संपादीक नियंत्रण जैसा भी है। इसलिए सरकार के भीतर एक तबके का मानना है कि क्या इन्हें अब भी पारंपरिक ‘मध्यस्थ’ (इंटरमीडियरी) जैसी कानूनी सुरक्षा मिलनी चाहिए।
सरकार के बदलते रुख के पीछे की वजहें क्या हैं?
सरकार के बदलते रुख के पीछे की वजह जुलाई के छात्र आंदोलन में इंस्टाग्राम की भूमिका मानी जा रही है। केंद्रीय सरकार को लगता है कि एल्गोरिदम कई बार विपक्ष-समर्थित या सरकार-विरोधी नैरेटिव को सरकारी संवाद की तुलना में ज्यादा बढ़ावा देते हैं। जुलाई में हुए नीट पेपर लीक आंदोलन में इंस्टाग्राम पर सरकार विरोधी रील्स की बाढ़ आ गई थी।
यही नहीं, उस दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा अपलोड किए गए वीडियो को फेसबुक ने भारत में कुछ समय के लिए रोक दिया था। इस मामले में केंद्रीय सूचना प्रोद्योगिकरण मंत्रालय ने मेटा के वैश्विक नीति अधिकारियों, जिनमें ग्लोबल अफेयर्स प्रमुख जोएल कैपलान भी शामिल थे, उन्हें तलब किया था। सरकार ने मेटा से डीपफेक को लेकर भारतीय कानूनों के पालन पर भी चिंता जताई थी।
एक्स ने भी भारत सरकार के ऑनलाइन कंटेंट ब्लॉकिंग व टेकडाउन ढांचे को चुनौती दी
एलन मस्क की कंपनी एक्स ने भी भारत सरकार के ऑनलाइन कंटेंट ब्लॉकिंग व टेकडाउन ढांचे को चुनौती दी है। इसमें सरकार का सहयोग पोर्टल भी शामिल है। सितंबर 2025 में कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक्स की याचिका खारिज कर दी। इसके बाद कंपनी ने अपील दायर की। यह विवाद ऑनलाइन अभिव्यक्ति की सीमाओं और राज्य के नियमन के अधिकार को लेकर बढ़ते मतभेद का प्रतीक बन गया है।
सुप्रीम कोर्ट ने भी जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रन अलायंस बनाम एस हरीश” मामले में सुनवाई के दौरान बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी सामग्री पर तत्काल प्रभाव से रोक लगाने पर सोशल मीडिया कंपनियों की विफलता पर चिंता जताई। कोर्ट ने कहा कि सेफ हार्बर खोना सामान्य उल्लंघनों के लिए बहुत कठोर नतीजा है, लेकिन उल्लंघनों को रोकने के लिए पर्याप्त भी नहीं।



















