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कृषि उत्पादन आयुक्त डॉ. कमलप्रीत सिंह ने कहा है कि छत्तीसगढ़ से कृषि, बागवानी तथा लघु वनोपज उत्पादों के निर्यात की संभावनाओं को देखते हुए राज्य सरकार द्वारा इनके निर्यात को बढ़ावा देने हेतु कार्ययोजना तैयार की जा रही है। उन्होंने कहा कि निर्यात किये जाने वाल उत्पादों की गुणवत्ता सुनिश्चित करने तथा निर्यात के मापदण्ड़ांे को पूरा करने में राज्य सरकार यहां के निर्यातकों को हरसंभव मदद करेगी। डॉ. सिंह ने कहा कि इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय में फायटोसेनेटरी लैब की स्थापना से राज्य के किसानों, व्यापारियों एवं उत्पादक निर्यातकों को अपने कृषि उत्पादों के प्रमाणीकरण की सुविधा प्राप्त हो सकेगी। उन्हांेने इस लैब की स्थापना के लिए इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. गिरीश चंदेल तथा संबंधित वैज्ञानिकों को बधाई एवं शुभकामनाएं दी। कृषि उत्पादन आयुक्त आज यहां इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय की फायटोसेनेटरी लैब द्वारा हाईब्रिड मोड में आयोजित निर्यात जगरूकता मीट-2022 को संबोधित कर रहे थे। इस निर्यातक जागरूकता मीट में इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. गिरीश चंदेल तथा विश्वविद्यालय प्रशासन के अधिकारी वैज्ञानिक एवं बड़ी संख्या में निर्यातक शामिल हुए।
निर्यातक मीट को संबोधित करते हुए इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. गिरीश चंदेल ने कहा कि छत्तीसगढ़ में कृषि उत्पादों की जांच की सुविधा न होने के कारण यहां के निर्यातकों को निर्यात में कठिनाई होती थी। इसे देखते हुए इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय द्वारा राज्य सरकार के सहयोग से यहां फायटोसेनेटरी लैब की स्थापना की गई है, जहां कृषि एवं लघु वनोपज उत्पादों में पेस्टिसाईड अवशेष, हैवी मेटल, रोगाणुओं तथा जैनेटिक मॉडिफिकेशन की जांच की सुविधा उपलब्ध कराई गई है। उन्होंने कहा कि किसी भी कृषि उत्पाद के निर्यात हेतु यह जांच करवाया जाना आवश्यक है। निर्यातकांे को काफी कम दरों पर यह सुविधाएं मुहैया कराई जा रही है। डॉ. चंदेल ने कहा कि फायटोसेनेटरी लैब को परीक्षण एवं अंशांकन प्रयोगशालाओं हेतु राष्ट्रीय प्रत्यायन बोर्ड (एन.ए.बी.एल.) द्वारा मान्यता प्राप्त हो चुकी है। उन्होंने कहा कि कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यातक विकास प्राधिकरण (एपीडा) द्वारा भी इस लैब को मान्यता मिल चुकी है। उन्होंने कहा कि इस लैब की स्थापना एवं जांच की सुविधा उपलब्ध होने से यहां के निर्यातकों को अब अपने उत्पाद जांच हेतु छत्तीसगढ़ के बाहर भेजने की आवश्यकता नहीं होगी जिससे निर्यात को बढ़ावा मिलेगा। उन्होंने कहा इस लैब में चावल, सब्जियों, फलों तथा लघु वनोपजों के प्रमाणीकरण की सुविधा उपलब्ध है। उन्होंने कहा कि आने वाल समय में इस प्रयोगशाला में जांच सुविधाओं का दायरा बढ़ाया जाएगा।
निर्यातक मीट को संबोधित करते हुए संचालक कृषि श्री यशवंत कुमार ने कहा कि राज्य सरकार द्वारा कृषि उत्पाद के निर्यात को बढ़ावा देने के लिए यहां सुगंधित चावल लघु धान्य फसलों, लघु वनोपज, औषधीय फसलों आदि के उत्पादन को बढ़ावा दिया जा रहा है। इस वर्ष राज्य में एक लाख हैक्टेयर के क्षेत्र में कोदो, कुटकी, रागी आदि लघु धान्य फसलों की खेती की जा रही है। आने वाले पांच वर्षांे में इस बढ़ाकर 1.50 लाख हैक्टेयर करने का लक्ष्य रखा गया है। संचालक उद्यानिकी श्री एम. माथेस्वरन ने कहा कि छत्तीसगढ़ से बागवानी फसलों के निर्यात की काफी संभावनाएं हैं इस देखते हुए यहां बागवानी फसलों के उत्पादन को बढ़ावा दिया जा रहा है। बागवानी फसलों के विस्तार हेतु राज्य में उद्यानिकी विश्वविद्यालय और शाकंभरी बोर्ड का गठन किया गया है। उन्होंने बताया कि बाड़ी परियोजना के तहत राज्य में तीन लाख बाड़ियां स्थापित की गई है जिससे बागवानी फसलों का उत्पादन बढ़ा है।
निर्यातक मीट में एपीडा के प्रतिनिधि के रूप में श्री अशोक कुमार बोरा तथा छत्तीसगढ़ लघु वनोपज महासंघ (छत्तीसगढ़ हर्बल) के प्रतिनिधि के रूप में भरत राज पुरोहित ने निर्यातकों को कृषि, बागवानी एवं लघुवनोपज उत्पादों के निर्यात हेतु आवश्यक प्रक्रियाओं, प्रमाणिकरण आदि के बारे मंे जानकारी दी। निर्यात मीट में राज्य के अनेक निर्यातकों ने कृषि उत्पादों के निर्यात में आने वाली कठिनाईयों तथा समस्याओं के बारे में जानकारी दी तथा इनका विशेषज्ञों से निराकरण प्राप्त किया। इस मीट में इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के संचालक अनुसंधान डॉ. पी.के. चन्द्राकर, निदेशक विस्तार डॉ. आर.के. बाजपेयी, अधिष्ठाता कृषि महाविद्यालय, रायपुर डॉ. एम.पी ठाकुर, अधिष्ठाता कृषि अभियांत्रिकी महाविद्यालय डॉ. विनय पाण्डेय, अधिष्ठाता खाद्य प्रौद्योगिकी महाविद्यालय डॉ. एम.पी. त्रिपाठी, बायोटेक्नोलॉजी विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. एस.बी. वेलुरकर एवं परियोजना समन्वयक डॉ. अर्चना एस. प्रसाद उपस्थित थे।

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