रायपुर। बच्चे देश का भविष्य होते हैं। पूरी दुनिया बाल स्वास्थ्य के प्रति अत्यंत संवेदनशील है। बच्चों के स्वास्थ्य की सुरक्षा के लिए टीकाकरण सहित अनेक योजनाएं चलाई जा रही हैं। प्राचीन चिकित्सा पद्धति आयुर्वेद में नवजात शिशु से लेकर किशोरावस्था तक स्वास्थ्य सुरक्षा और रोगोपचार के व्यापक परामर्श मौजूद हैं। शासकीय आयुर्वेद कॉलेज रायपुर के सह-प्राध्यापक डॉ. संजय शुक्ला ने बताया कि आयुर्वेद के आठ अंग यानि अष्टांग आयुर्वेद में बाल रोग (कौमारभृत्य) विशिष्ट शाखा है जिसमें नवजात शिशु से लेकर बढ़ते बच्चों के खान-पान, स्वास्थ्य रक्षा, माता के स्वास्थ्य, स्तनपान, शारीरिक, मानसिक विकृति, संक्रमण जन्य रोगों से बचाव और उपचार की विशद व्यवस्था उपलब्ध है। डॉ. शुक्ला ने बताया कि शिशुओं और किशोरों के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के विकास व इम्यूनिटी बढ़ाने के लिए आयुर्वेद पद्धति में 2 वर्ष से 16 वर्ष के लोगों का “स्वर्ण प्राशन” संस्कार किया जाता है। शासकीय आयुर्वेद कॉलेज रायपुर में बाल रोग विभाग में स्नातकोत्तर अध्ययन एवं शोध कार्य हो रहे हैं। महाविद्यालय चिकित्सालय में बाल स्वास्थ्य और बाल रोगों के चिकित्सा परामर्श के लिए नियमित ओपीडी का भी संचालन किया जा रहा है जिससे सैकड़ों लोग लाभान्वित हो रहे हैं। रोग प्रतिरोधक क्षमता ही स्वास्थ्य का मूल आधार है, इसलिए आयुर्वेद पद्धति में मुख्य रूप से बच्चों की इम्यूनिटी को बढ़ाने और उनकी मेधाशक्ति को विकसित करने के लिए संतुलित और पौष्टिक आहार, औषधियों के साथ अंग मालिश व व्यायाम को प्रमुखता दी गई है। डॉ. शुक्ला ने बताया कि बच्चों में होने वाले सामान्य मौसमी रोग जैसे खांसी, सर्दी-जुकाम के लिए आयुर्वेद पद्धति में सितोपलादी चूर्ण, हरिद्राखंड, बालचतुर्भद्र चूर्ण, शुंठी चूर्ण इत्यादि का प्रयोग किया जाता है। इसी प्रकार चर्म रोगों में गंधक रसायन, आरोग्यवर्धनी वटी, रसमाणिक्य, मरिच्यादि तेल तथा मेधाशक्ति के विकास के लिए ब्राम्ही वटी, वचा चूर्ण, सारस्वतारिष्ट, कल्याणक घृत का प्रयोग किया जाता है। बच्चों को कुपोषण से बचाने के लिए विदारीकंद, अश्वगंधा, शतवारी चूर्ण, कुष्माण्ड रसायन एवं इम्यूनिटी बढ़ाने के लिए स्वर्ण प्राशन, च्यवनप्राश, गिलोय, दाल चीनी, मारिच का वर्णन है। इन आयुर्वेदिक औषधियों और रसायनों को आयुर्वेद चिकित्सा विशेषज्ञ के परामर्श से और उनकी निगरानी में ही लेना चाहिए, अन्यथा नुकसानदायक हो सकता है। डॉ. शुक्ला ने बताया कि कोविड लॉक-डाउन का सबसे ज्यादा प्रभाव बच्चों के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ा है। स्कूल इत्यादि लगातार बंद होने तथा लगातार घरों में रहने के कारण बच्चे जहाँ मोटापा जन्य रोगों का शिकार हुए हैं, वही चिड़चिड़ापन, भय, गुस्सा जैसे मानसिक विकारों से ग्रस्त हुए हैं। इन सभी विकारों को दूर करने का प्रभावी उपाय आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति में है। अभिभावक इस पद्धति में बताए गए उपायों को बच्चों की दिनचर्या में शामिल करते हैं तो बच्चे न केवल शारीरिक व मानसिक रोगों से दूर रहेंगे, वरन् उनकी बुद्धि भी कुशाग्र होगी।

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