छग और मप्र के बीच आपसी सहमति की लटकी तलवार से पेंशनर्स लाचार
छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश के बीच मध्यप्रदेश राज्य पुनर्गठन अधिनियम 2000 की धारा 49(6)में दिये गए प्रावधानों के नियमों को संवैधानिक बाध्यता बताकर दोनों राज्य सरकारों ने आपसी सहमति के बिना पेंशनरों को केन्द्र समान 34 प्रतिशत महंगाई राहत देने में आनाकानी कर रहे हैं। जिसके कारण दोनों राज्य के पेन्शनर अभी केवल 17 प्रतिशत महंगाई राहत प्राप्त कर रहे हैं बकाया 17 प्रतिशत महंगाई राहत की राशि लेने के मामले में अलग अलग राजनीतिक दल के सरकार में होने का खामियाजा पेन्शनर भुगतने के लिये मजबूर और लाचार हैं। मध्यप्रदेश शासन के प्रमुख सचिव श्री मनोज गोहिल ने पेंशनरों महंगाई राहत का लाभ देने 23 मार्च को पत्र भेजकर पेंशनरों को महंगाई राहत देने के लिये छत्तीसगढ़ शासन से सहमति मांगा है। परन्तु छत्तीसगढ़ राज्य में कर्मचारियों को भी 17 प्रतिशत महंगाई भत्ता देने का मामला लटका है। इसलिए पेंशनरों को महंगाई राहत देने हेतु सहमति देने का सवाल ही पैदा नही होता। उल्लेखनीय है कि धारा 49 के प्रावधान अनुसार मध्यप्रदेश के लगभग 5 लाख और छत्तीसगढ़ के 1 लाख पेंशनरों को अर्थात कुल 6 लाख पेंशनरों मध्यप्रदेश सरकार 74 प्रतिशत और छत्तीसगढ़ 26 प्रतिशत बजट राशि का भुगतान करती है, इसी बजट को लेकर आपसी सहमति की अनिवार्यता है। छत्तीसगढ़ राज्य पेंशनर्स फेडरेशन के अध्यक्ष वीरेन्द्र नामदेव तथा फेडरेशन से जुड़े विभिन्न पेंशनर संघों के नेता क्रमश: डॉ डीपी मनहर, कृपाशंकर मिश्रा, गंगाप्रसाद साहू, यशवन्त देवान, आरपी शर्मा, श्यामलाल चौधरी, जेपी मिश्रा, अनिल गोल्हानी आदि ने भूपेश बघेल से पेंशनरों और कर्मचारियों को बकाया 17 प्रतिशत महंगाई राहत/भत्ता देने और मध्यप्रदेश सरकार को भी पेंशनरों को महंगाई राहत देने उनके प्रस्ताव पर सहमति देने की मांग की है।



















