‘मैं तो खुद बच्ची हूं किसी बच्चे को जन्म कैसे दे सकती हूं. घर के आंगन में खेलने और स्कूल जाने की जगह गर्भ में आठ माह के शिशु को पाल रही हूं. क्या मेरी यह गलती है कि मैंने एक बेटी के रूप में जन्म लिया. मेरा बचपन छीनने वाले दोषियों को सजा देने की जगह पुलिस बचाने का प्रयास कर रही है. आठ माह की गर्भवती बच्ची की पीड़ा सुन बाल संरक्षण समिति के अधिकारी हैरत में पड़ गए. यह किसी कहानी का हिस्सा नहीं बल्कि उन्नाव के मौरावां क्षेत्र में रहने वाली उस बच्ची की व्यथा है जो 12 वर्ष की उम्र में आठ माह का गर्भ लेकर इंसाफ के लिए मां के साथ दर-दर की ठोकरे खा रही है. नाबालिग के हाथ पैर और चेहरे में सूजन इस तरह है कि वह चलने और बोलने में तक असमर्थ है. 24 मार्च 2022 की शाम पड़ोस की दुकान से शक्कर लेने गई थी. पीछे से आए तीन लोगों ने चेहरे पर गमछा डालकर अगवा कर लिया और कब्रिस्तान ले जाकर सामूहिक दुष्कर्म किया. आरोप है कि पुलिस ने मुख्य आरोपित को अभयदान देकर अन्य आरोपित अरुण, सतीश और उसके एक निर्दोष रिश्तेदार पर मुकदमा कर जेल भेज दिया. मां के साथ बाल संरक्षण समिति पहुंची बच्ची ने वहां की अध्यक्ष प्रीति सिंह को बताया कि पांच माह तक पुलिस उसके पेट में पल रहे बच्चे की बात को छिपाती रही. बच्ची की मां ने बाल संरक्षण समिति की अध्यक्ष प्रीति सिंह को बताया कि बेटी को जब भी दिखाने स्थानीय सीएचसी गए. वहां के डॉक्टरों ने मामला पुलिस का बता न्यायालय से आदेश लाने की बात कही. अब तक न एक भी टीका लगा न जांच हुई. बच्ची हालत बिगड़ रही हैं. आपबीती सुन अध्यक्ष ने तुरंत पुलिस को बच्ची का परीक्षण कराने का आदेश जारी किया है. एसपी दिनेश त्रिपाठी ने बताया कि घटना के बाद बच्ची किसी आरोपित का नाम नहीं जानती थी. अज्ञात में मुकदमा दर्ज कर न्यायालय में कलमबंद बयान कराए गए. जिसे मुख्य आरोपित बताया जा रहा है उसका नाम बच्ची ने अपने बयान में नहीं लिया था. जिनका नाम लिया उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेजा गया है.

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