जॉन्स हॉपकिन्स युनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने अपने हालिया प्रयास में एक एंटीवायरल दवा का परीक्षण किया है जिससे डेंगू वायरस को बेहतर तरीके से नियंत्रित किया जा सकता है। वर्तमान टीकों की सीमाओं के मद्देनज़र यह प्रयास काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यह एक विशेष किस्म का परीक्षण था जिसे मानव चुनौती परीक्षण कहते हैं। इसमें चंद स्वस्थ व्यक्तियों को पहले जानबूझकर वायरस से संक्रमित किया जाता है और फिर इलाज किया जाता है।जेएनजे-1802 नामक इस दवा ने शुरुआती परीक्षणों में डेंगू संक्रमण को रोकने में काफी अच्छे परिणाम दिए हैं। 31 प्रतिभागियों पर इस दवा की उच्च खुराक वायरस के खिलाफ एक मज़बूत ढाल साबित हुई। इसमें से कुछ प्रतिभागी तो संक्रमण से पूरी तरह सुरक्षित रहे जबकि अन्य में वायरस की प्रतिलिपियां बनाने की दर काफी कम देखी गई। यह परिणाम अमेरिकन सोसायटी ऑफ ट्रॉपिकल मेडिसिन एंड हाइजीन की वार्षिक बैठक में प्रस्तुत किए गए हैं। गौरतलब है कि जेएनजे-1802 वायरस के दो प्रोटीनों के बीच एक ज़रूरी अंतर्क्रिया को रोकने का काम करती है। डेंगू वायरस की प्रतिलिपियां बनने के लिए यह अंतर्क्रिया अनिवार्य होती है। वर्तमान डेंगू टीकों की तुलना में यह नया तरीका काफी प्रभावी है। पुराने टीकों के साथ समस्या थी कि महीनों तक इनकी कई खुराक लेना पड़ता था। और तो और, मनुष्यों को संक्रमित करने वाले चार अलग-अलग डेंगू सीरोटाइप के खिलाफ ये टीके समान रूप से प्रभावी भी नहीं थे। लेकिन जेएनजे-1802 प्रकोप के दौरान जल्द से जल्द सुरक्षा प्रदान करने में सक्षम है। वैज्ञानिकों के अनुसार भविष्य में यह डेंगू नियंत्रण का एक अमूल्य साधन बन सकता है।  फिलहाल इसका दूसरा चरण एक प्लेसिबो-तुलना चरण है जिसमें लैटिन अमेरिका और एशिया के लगभग 2000 वालंटियर्स शामिल हो रहे हैं। उम्मीद है कि इसके परिणाम 2025 तक मिल जाएंगेे। इस अध्ययन में उपयोग किए गए डेंगू वायरस संस्करण का चयन भी काफी दिलचस्प है। यह वही स्ट्रेन है जिसने 1970 के दशक में इंडोनेशिया में हल्के शारीरिक लक्षण उत्पन्न किए थे। 2000 के दशक की शुरुआत में, नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ ने इस संस्करण को कमज़ोर करके और इसमें विशिष्ट संशोधन करके इसे उम्मीदवार टीके के रूप में उपयोग किया था। लेकिन जब इसे गैर-मानव प्रायमेट्स को दिया गया, तो वायरस कमज़ोर साबित नहीं हुआ। इस कारणवश इस संस्करण को टीके के विकास में नहीं लिया गया। फिर भी, जॉन्स हॉपकिन्स युनिवर्सिटी की वैज्ञानिक एना डर्बिन और उनकी टीम ने इस संस्करण को एक चुनौती के रूप में देखा। इस संस्करण से पीड़ित लोगों में उन्होंने लगातार वायरस प्रतिलिपिकरण पाया जो प्राकृतिक वायरस के जितनी प्रतिलिपियां बनाता था। इसके संपर्क में आने वाले 90 से 100 प्रतिशत व्यक्तियों में एक विशिष्ट प्रकार की फुंसियां बनती हैं। इससे श्वेत रक्त कोशिका और प्लेटलेट की संख्या कम तो होती है लेकिन खतरनाक स्तर तक नहीं। यहां एक आश्चर्य की बात यह है कि शोधकर्ताओं ने संक्रमित मच्छरों का उपयोग करने की बजाय वायरस को सीधे इंजेक्शन से देने का विकल्प क्यों चुना। इस मामले में डर्बिन ने स्पष्ट किया कि चयनित संस्करण मच्छरों के शरीर में कुशलतापूर्व प्रतिलिपियां नहीं बनाता था। यह बाह्य रोगियों पर अध्ययनों के लिए एक आदर्श था। इसके चलते मच्छरों द्वारा वायरस फैलाए जाने की चिंता नहीं रही। दूसरी बात यह है मच्छर द्वारा प्रसारित हो तो वायरस की सटीक मात्रा निर्धारित करना मुश्किल है। इंजेक्शन ने यह सुनिश्चित किया कि सभी प्रतिभागी संक्रमित हो गए हैं। आने वाले समय में जेएनजे-1802 के विविध उपयोगों को समझने का प्रयास किया जा रहा है। यह यात्रियों, सैन्य कर्मियों, गर्भवती महिलाओं और कमज़ोर प्रतिरक्षा वाले व्यक्तियों के लिए रोकथाम के एक उपाय के रूप में काम कर सकता है। इसके अलावा, शोधकर्ता सक्रिय डेंगू संक्रमण के इलाज के लिए इस दवा की चिकित्सकीय क्षमता की खोज कर रहे हैं।  हालांकि अभी भी इस विषय में काफी काम बाकी है फिर भी इस अध्ययन के नतीजे एक ऐसे भविष्य की आशा प्रदान करते हैं जहां डेंगू का अधिक प्रभावी ढंग से प्रबंधन किया जा सकेगा। (स्रोत फीचर्स)

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